Kumbh Mela 2019

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18/05/2021
Role of the Jhansi ki Rani by a talented girl
09/08/2020

Role of the Jhansi ki Rani by a talented girl

Video from Meera Singh

13/04/2019
13/12/2018

" कुंभ मेला 'एक इतिहास"

कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना माना जाता है माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी।खगोल घटनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारंभ होता है जब सूर्य और चंद्रमा वृश्चिक राशि में और बृहस्पति मेष राशि में प्रवेश करते हैं मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को कुंभ स्नान योग कहते हैं यहां स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है।

लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से हो गई थी समुद्र मंथन से निकले अमृत के कलश पाने के लिए देव दानव में युद्ध हुआ। जिसके फलस्वरूप अमृत कलश से अमृत की बूंद पृथ्वी पर चार स्थानों पर गिरा नासिक, उज्जैन, हरिद्वार एवं प्रयाग। नासिक में गोदावरी नदी के तट पर, हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर, उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर और प्रयागराज में गंगा नदी यमुना नदी और सरस्वती नदी का तट जहां तीनों का संगम होता है।

इन चारों स्थानों पर ही कुंभ मेला हर 3 वर्ष बाद लगाया जाता है इसके आयोजन का सही समय और तिथि धार्मिक और ज्योतिष शास्त्र के आधार पर होता है साथ ही यह ध्यान देने योग्य है कि प्रयागराज संगम में प्रत्येक वर्ष माघ के महीने में माघ मेला लगता है यही मेला 6 वर्ष में अर्धकुंभ और पूरा 12 वर्ष में कुंभ मेला के रूप में हमारे सामने आता है।

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08/12/2018

''कुंभ मेला एक आध्यात्मिक ज्ञान"

भारत, सनातन धर्म एवं विश्व का सबसे बड़ा एवं प्रसिद्ध धार्मिक मेला 'कुंभ मेला' देश की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक विविधताओं को पल्लवित एवं पोषित करता है साथ ही सामाजिक समसता, एकता और सद्भाव बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कुंभ विश्व के विभिन्न संस्कृतियों से लोगों के एक साथ आने का मानवता के सबसे बड़े समागम के दर्शन करने का और भागीदारी करने का महत्वपूर्ण पर्व है

कुंभ वैश्विक पटल पर शांति और एकता का एक प्रतीक है कुंभ को भारतीय संस्कृति का महापर्व कहा गया है कुंभ का बौद्धिक, पौराणिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक आधार भी है कुंभ स्नान और ज्ञान का अनूठा संगम भी है विभिन्न तरह के साधु, सिद्ध पुरुष, विद्वान और पंडित इस मेले में आकर पूजा पाठ यज्ञ आदि का आयोजन करते हैं। इस मेले में शामिल होकर आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया जा सकता है। दिसंबर 2017 में यूनेस्को ने भारत में आयोजित इस मेले को इंटेजिबल कल्चर हेरीटेज आफ ह्यूमैनिटी लिस्ट में शामिल किया है इस तरह यह मेला एक वैश्विक स्तर का आयोजन बन गया है।

दुनिया में पानी के बहुत से मेले लगते हैं लेकिन कुंभ जैसा कोई नहीं स्वीडन के स्टॉकहोम, ऑस्ट्रेलिया की बिसब्रेन, अमेरिका की हडसन, कनाडा की ओटावा जाने कितनी ही नदी उत्सव साल दर साल आयोजित होते हैं लेकिन कुंभ, कुंभ की बात कुछ और है जाति, धर्म, अमीरी, गरीबी यहां तक कि राष्ट्र की सरहदें भी कुंभ में कोई मायने नहीं रखती साधु संत समाज देशी-विदेशी इस आयोजन में आकर सभी जैसे खो जाते हैं कुंभ में आकर ऐसा लगता ही नहीं कि हम भिन्न हैं हालांकि पिछले 50 वर्षों में बहुत कुछ बदला है बावजूद इसके यह सिलसिला वर्ष 2 वर्ष नहीं हजारों वर्षों से जारी है 6 वर्ष में अर्धकुंभ 12 वर्ष में कुंभ और 144 वर्ष में महाकुंभ।

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29/11/2018

कुंभ : चार वेदों का संगम

कुंभ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है। कुंभ का पर्याय पवित्र कलश से होता है। इस कलश का भारतीय हिन्दू सभ्यता में विशेष महत्व है। कलश के मुख को भगवान विष्णु, गर्दन को रूद्र, आधार को ब्रम्हा, बीच के भाग को समस्त देवियों और अंदर के जल को संपूर्ण सागर का प्रतीक माना जाता है। यह चारों वेदों का संगम है। इस तरह कुंभ का अर्थ पूर्णतः औचित्य पूर्ण है।

वास्तव में कुंभ हमारी सभ्यता का संगम है। यह आत्म जाग्रति का प्रतीक है। यह मानवता का अनंत प्रवाह है। यह प्रकृति और मानवता का संगम है। कुम्भ ऊर्जा का स्त्रोत है। कुंभ मानव-जाति को पाप, पुण्य और प्रकाश, अंधकार का एहसास कराता है। नदी जीवन रूपी जल के अनंत प्रवाह को दर्शाती है। मानव शरीर पञ्चतत्वों से निर्मित है यह तत्व हैं-अग्नि, वायु, जल, प्रथ्वी और आकाश।

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