18/12/2025
#ज़िंदादिली
यह कहानी है उस 16 दिसंबर की, जब ढाका के रेसकोर्स मैदान में सूरज कुछ अलग ही चमक के साथ ढल रहा था। एक तरफ भारत के निर्भीक जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा थे, और दूसरी तरफ आँखों में शर्म और शिकस्त लिए पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाजी। नियाजी के कांपते हाथों ने जब 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ सरेंडर' पर दस्तखत किए, तो इतिहास के पन्नों में एक नया देश 'बांग्लादेश' दर्ज हो गया और पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए।
✅रात के अंधेरे में कायराना #हमला:
कहानी शुरू हुई 3 दिसंबर 1971 की शाम को। जब पूरा देश शाम की चाय का लुत्फ उठा रहा था, तभी पाकिस्तान के विमानों ने भारत के पश्चिमी एयरबेस पर बमबारी कर दी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ को फोन किया। सैम का जवाब सीधा था— "I am ready." और फिर शुरू हुआ भारतीय वीरों का वो तांडव, जिसे दुनिया आज भी याद करती है।
#लोंगेवाला:
जहाँ 120 शेरों ने 2000 गीदड़ों को भगाया
रेगिस्तान की तपती रेत और कंपकंपाती रातों के बीच राजस्थान की लोंगेवाला पोस्ट पर मेजर कुलदीप सिंह चाँदपुरी अपने 120 जवानों के साथ तैनात थे। सामने से पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजिमेंट (2000 सैनिक) आ रही थी। मेजर के पास दो विकल्प थे— पीछे हट जाएं या शहादत चुनें। उन्होंने तीसरा रास्ता चुना— 'विजय'। रात भर वो मुट्ठी भर जवान लड़ते रहे और सुबह होते ही भारतीय वायुसेना के 'हंटर' विमानों ने पाकिस्तानी टैंकों का वो कब्रिस्तान बनाया जिसे आज भी देखा जा सकता है।
✅कराची में 'दीवाली' और समंदर में #रूस की ढाल
समंदर में भारतीय नौसेना ने वो कर दिखाया जिसकी कल्पना पाकिस्तान ने नहीं की थी। 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' के तहत कराची बंदरगाह को आग के दरिया में बदल दिया गया। इसी बीच खबर आई कि अमेरिका अपना '7वां बेड़ा' पाकिस्तान की मदद के लिए भेज रहा है। पूरी दुनिया सांसे थामे बैठी थी कि क्या तीसरा विश्व युद्ध शुरू होगा? लेकिन भारत के दोस्त रूस (सोवियत संघ) ने अपनी परमाणु पनडुब्बियां तैनात कर दीं। अमेरिका के पास पीछे हटने के सिवा कोई रास्ता न बचा।
✅93,000 बंदियों का वो ऐतिहासिक समर्पण:
16 दिसंबर तक भारतीय सेना ढाका के दरवाजे तोड़ चुकी थी। जनरल मानेकशॉ ने संदेश भेजा— "हथियार डाल दो, वरना खत्म कर दिए जाओगे।" शाम 4:31 बजे, जनरल नियाजी ने अपने 93,000 सैनिकों के साथ सरेंडर किया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी भी सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण था।
भारत का वो 'महानायक' जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता
इस जीत के पीछे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की रणनीति, इंदिरा गांधी की दृढ़ इच्छाशक्ति और सरहद पर खड़े हर उस जवान का लहू था, जिसने अपनी माँ की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। अरुणा खेत्रपाल जैसे 21 साल के युवाओं ने जलते टैंकों के बीच से दुश्मन को ललकारा और विजय श्री भारत की झोली में डाल दी।
आज भी जब 16 दिसंबर आता है, तो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। यह सिर्फ एक युद्ध की जीत नहीं थी, यह जीत थी सत्य की, न्याय की और भारतीय पराक्रम की।
— जय हिन्द, जय भारत! 🇮🇳