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23/12/2025

किसान दिवस विशेष 👇

23/12/2025

. #महाभारत और #श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार
​कुंदनपुर की राजकुमारी: यह क्षेत्र (अहार, बुलंदशहर) प्राचीन काल में कुंदनपुर राज्य का हिस्सा माना जाता था, जिसकी राजधानी राजा भीष्मक के अधीन थी। उनकी पुत्री रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण के गुणों पर मुग्ध थीं और उन्हें ही अपना पति मान चुकी थीं।
​रुक्मिणी की प्रार्थना: जब रुक्मिणी के भाई 'रुक्म' ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया, तब रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को संदेश भेजा। विवाह के दिन, वह कुलदेवी (अवंतिका देवी/अम्बिका) की पूजा करने के लिए महल से बाहर इसी मंदिर में आई थीं।
#रुक्मिणी #हरण: श्रीमद्भागवत पुराण के 10वें स्कंद में उल्लेख है कि जब राजकुमारी मंदिर से पूजा कर बाहर निकल रही थीं, तभी श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने रथ पर बैठा लिया और वहां से द्वारका के लिए प्रस्थान किया।
​✅स्थानीय मान्यता और भौगोलिक साक्ष्य:

#रुक्मिणीकुंड
मंदिर के पास गंगा किनारे आज भी 'रुक्मिणी कुंड' स्थित है। माना जाता है कि माता की पूजा से पहले रुक्मिणी ने यहीं स्नान किया था।

​गाँवों के नाम का #रहस्य: मंदिर के आसपास के गाँवों के नाम आज भी कृष्ण-रुक्मिणी विवाह की रस्मों से जुड़े बताए जाते हैं:

#मोहरसा

जहाँ श्रीकृष्ण का 'मोहर' (सेहरा) बंधा था।

#बामनपुर:
जहाँ बारात का 'ब्रह्मभोज' हुआ था।
#दराबर : जहाँ श्रीकृष्ण का दरबार लगा था।

#खंदोई
जहाँ मिट्टी के बर्तन (भोज के लिए) बनाए गए थे।

​✅मंदिर की विशेषता (मूर्तियाँ):


​एक मूर्ति माता भवानी (जगदम्बिका) की है और दूसरी देवी सती की। यह दुर्लभ संयोग इस स्थान को एक शक्तिशाली 'सिद्धपीठ' बनाता है।
#भगवन्तपुरसिद्ध #अवन्तिकादेवी #आहार #गंगामाँ #अनुपशहर #बुलन्दशहर

गोवा की मुक्ति - एक अधूरा सपना जो 1961 में पूरा हुआ 🇮🇳​"15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत आजादी का जश्न मना रहा था, गोवा की ...
19/12/2025

गोवा की मुक्ति - एक अधूरा सपना जो 1961 में पूरा हुआ 🇮🇳
​"15 अगस्त 1947 को जब पूरा भारत आजादी का जश्न मना रहा था, गोवा की गलियों में सन्नाटा था। भारत आजाद तो था, लेकिन पूर्ण नहीं..."
​क्या आप जानते हैं कि गोवा को भारत का हिस्सा बनने के लिए आजादी के बाद भी 14 साल, 4 महीने और 4 दिन का लंबा इंतजार करना पड़ा? आज 'गोवा मुक्ति दिवस' पर आइए जानते हैं इस संघर्ष की पूरी कहानी:
​📍 450 साल की गुलामी का बोझ
जहाँ अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 साल राज किया, वहीं पुर्तगालियों ने गोवा पर 451 वर्षों (1510-1961) तक शासन किया। वे इसे अपनी कॉलोनी नहीं, बल्कि पुर्तगाल का हिस्सा मानते थे और वहां की जनता पर अपनी संस्कृति और धर्म थोपने की कोशिश करते थे।
​📍 क्रांति की पहली चिंगारी
आजादी की असली लड़ाई तब तेज हुई जब 18 जून 1946 को डॉ. राम मनोहर लोहिया ने गोवा पहुंचकर नागरिक अधिकारों के लिए बिगुल फूँका। इसके बाद आजाद गोमंतक दल जैसे संगठनों ने सशस्त्र संघर्ष शुरू किया।
​📍 सत्याग्रहियों का बलिदान
1955 में भारत के कोने-कोने से आए हजारों निहत्थे सत्याग्रहियों ने गोवा की सीमा में प्रवेश करने की कोशिश की। क्रूर पुर्तगाली पुलिस ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिसमें कई भारतीय वीर शहीद हो गए। इस घटना ने पूरे देश के गुस्से को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया।
​📍 निर्णायक मोड़: 'ऑपरेशन विजय'
जब कूटनीति के सारे रास्ते बंद हो गए, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सेना को आदेश दिया।
​17 दिसंबर 1961: भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया।
​36 घंटे का युद्ध: भारतीय जांबाजों के सामने पुर्तगाली सेना टिक नहीं पाई।
​ऐतिहासिक आत्मसमर्पण: 19 दिसंबर 1961 को पुर्तगाली गवर्नर ने बिना शर्त सरेंडर कर दिया और गोवा की धरती पर तिरंगा शान से लहरा उठा।
​📍 आज का दिन क्यों खास है?
यह दिन हमें याद दिलाता है कि आजादी केवल अंग्रेजों से नहीं मिली थी, बल्कि इसे पूर्ण करने के लिए हमारे सैनिकों और क्रांतिकारियों ने पुर्तगाली साम्राज्यवाद से भी डटकर लोहा लिया था।
​आज गोवा भारत का गौरव है—अपनी संस्कृति, खूबसूरती और जज्बे के साथ! 🌊✨
​नमन है उन सभी ज्ञात-अज्ञात शहीदों को जिनके कारण आज गोवा आजाद है। 🙏🇮🇳

 #ज़िंदादिलीयह कहानी है उस 16 दिसंबर की, जब ढाका के रेसकोर्स मैदान में सूरज कुछ अलग ही चमक के साथ ढल रहा था। एक तरफ भारत ...
18/12/2025

#ज़िंदादिली
यह कहानी है उस 16 दिसंबर की, जब ढाका के रेसकोर्स मैदान में सूरज कुछ अलग ही चमक के साथ ढल रहा था। एक तरफ भारत के निर्भीक जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा थे, और दूसरी तरफ आँखों में शर्म और शिकस्त लिए पाकिस्तानी जनरल ए.ए.के. नियाजी। नियाजी के कांपते हाथों ने जब 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ सरेंडर' पर दस्तखत किए, तो इतिहास के पन्नों में एक नया देश 'बांग्लादेश' दर्ज हो गया और पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए।

✅रात के अंधेरे में कायराना #हमला:

​कहानी शुरू हुई 3 दिसंबर 1971 की शाम को। जब पूरा देश शाम की चाय का लुत्फ उठा रहा था, तभी पाकिस्तान के विमानों ने भारत के पश्चिमी एयरबेस पर बमबारी कर दी। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ को फोन किया। सैम का जवाब सीधा था— "I am ready." और फिर शुरू हुआ भारतीय वीरों का वो तांडव, जिसे दुनिया आज भी याद करती है।

#लोंगेवाला:
जहाँ 120 शेरों ने 2000 गीदड़ों को भगाया
​रेगिस्तान की तपती रेत और कंपकंपाती रातों के बीच राजस्थान की लोंगेवाला पोस्ट पर मेजर कुलदीप सिंह चाँदपुरी अपने 120 जवानों के साथ तैनात थे। सामने से पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजिमेंट (2000 सैनिक) आ रही थी। मेजर के पास दो विकल्प थे— पीछे हट जाएं या शहादत चुनें। उन्होंने तीसरा रास्ता चुना— 'विजय'। रात भर वो मुट्ठी भर जवान लड़ते रहे और सुबह होते ही भारतीय वायुसेना के 'हंटर' विमानों ने पाकिस्तानी टैंकों का वो कब्रिस्तान बनाया जिसे आज भी देखा जा सकता है।

✅कराची में 'दीवाली' और समंदर में #रूस की ढाल

​समंदर में भारतीय नौसेना ने वो कर दिखाया जिसकी कल्पना पाकिस्तान ने नहीं की थी। 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' के तहत कराची बंदरगाह को आग के दरिया में बदल दिया गया। इसी बीच खबर आई कि अमेरिका अपना '7वां बेड़ा' पाकिस्तान की मदद के लिए भेज रहा है। पूरी दुनिया सांसे थामे बैठी थी कि क्या तीसरा विश्व युद्ध शुरू होगा? लेकिन भारत के दोस्त रूस (सोवियत संघ) ने अपनी परमाणु पनडुब्बियां तैनात कर दीं। अमेरिका के पास पीछे हटने के सिवा कोई रास्ता न बचा।

✅93,000 बंदियों का वो ऐतिहासिक समर्पण:

​16 दिसंबर तक भारतीय सेना ढाका के दरवाजे तोड़ चुकी थी। जनरल मानेकशॉ ने संदेश भेजा— "हथियार डाल दो, वरना खत्म कर दिए जाओगे।" शाम 4:31 बजे, जनरल नियाजी ने अपने 93,000 सैनिकों के साथ सरेंडर किया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद किसी भी सेना का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण था।
​भारत का वो 'महानायक' जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता
​इस जीत के पीछे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की रणनीति, इंदिरा गांधी की दृढ़ इच्छाशक्ति और सरहद पर खड़े हर उस जवान का लहू था, जिसने अपनी माँ की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान कर दिया। अरुणा खेत्रपाल जैसे 21 साल के युवाओं ने जलते टैंकों के बीच से दुश्मन को ललकारा और विजय श्री भारत की झोली में डाल दी।

​आज भी जब 16 दिसंबर आता है, तो हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। यह सिर्फ एक युद्ध की जीत नहीं थी, यह जीत थी सत्य की, न्याय की और भारतीय पराक्रम की।
​— जय हिन्द, जय भारत! 🇮🇳

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