Etawah इटावा

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इटावा का इतिहास
कल-कल निनादिनी, पतित पावनी यमुना के तट पर बसे जनपद इटावा का यद्यपि क्रमबद्ध इतिहास उपलब्ध नहीं है पर फिर भी विद्वानों का अनुमान है कि इटावा की ऐतिहासिक आयु साढ़े पांच हजार वर्ष से भी अधिक है। महाभारत काल में बटेश्वर से लेकर जगम्मनपुर तक का क्षेत्र इष्टपथ कहा जाता था। इसी भूभाग में स्थित होने के कारण उस काल में इटावा को इष्टिकापुरी कहा जाता था। कहा जाता है कि इटावा में ईंटों का बहुत बड़ा कारोबार था और देवस्थान के निर्माण में इटावा की ईंटों का प्रयोग शुभ माना जाता था इसी कारण इसका नाम इष्टिकापुरी पड़ा था। एक किंवदन्ती यह भी है कि यहां पर बड़े-बड़े संत महात्माओं ओर तपस्वियों का वास था जहां आकर लोग अपना इष्ट प्राप्त कर लेते थे इस कारण भी यह इष्टिकापुरी कहलाया। इटावा में पुरबिया टोला मुहल्ले का बड़ा भाग मुहल्ला पजाबा कहलाता है जो इस तथ्य को प्रमाणित करता है। उस काल खण्ड में यह भूभाग प्रसिद्ध पांचाल राज्य के अन्तर्गत था। इतिहास से ऐसा प्रमाण मिलता है कि पाण्डवों ने 14 वर्षों का बनवास, यमुना-चम्बल के मध्य स्थित द्वैतबल में और एक वर्ष का अज्ञातवास तत्कालीन विराट राज्य में स्थित चक्र नगरी में किया। वर्तमान चकरनगर में ही व्यतीत किया था। इसी क्षेत्र में महाबली भीम ने बकेवर के बकासुर नामक शक्तिशाली असुर सामन्त का वध करके इस क्षेत्र को आतंक मुक्त किया था। उस काल में इसी भूमि खण्ड में महाभारत की योजना रची गई थी।
इसके पश्चात इतिहास लुप्त प्राय है। सन् 836 से लेकर 1194 ई. तक इटावा का यह भूभाग कन्नौज के राठौर नृपों के अधिकार में रहा। कन्नौज के अंतिम नरेश महाराज जयचन्द्र का मुहम्मद गौरी के साथ यहीं इकदिल के पास युद्ध हुआ था। इस युद्ध में महाराजा जयचन्द्र के प्रसिद्ध सामान्त राजा सुमेरशाह मारे गये। इटावा में यमुना तट पर स्थित उनका दुर्ग ध्वस्त कर दिया गया था। इस भीषण युद्ध में गौरी के 22 सेना अधिकारी और हजारों सैनिक भी मारे गये थे। इन लुटेरे आक्रमणकारियों की कब्रें, बाइस ख्वाजा के नाम से प्रदर्शनी के पास ही बनी हुई हैं।
इसके पश्चात लगभग 6 सौ वर्षों तक, इटावा जनपद विभिन्न मुस्लिम राज्यों के अधीन रहा, पर वहां की जुझारू जनता न कभी चैन से बैइी और उसने कभी मुस्लिम आक्रमणकारियों को चैन से बैठने ही दिया। सन् 1252 से लेकर 1389 तक उसके कई बार भंयकर विद्रोह किया और दिल्ली साम्राज्य से भी जूझने का साहस दिखाया। सन् 1421 से लेकर 1424 तक इटावा की जनता ने पुनः युद्ध लड़ा परन्तु 1487 में हुसैन शाह ने विद्रोह शांत करने में सफलता पाई और इटावा पर पूरी तरह अधिकार कर लिया।
सन् 1528 में इटावा मुगल शासन का अंग बन गया। सन् 1540 से लेकर 1556 तक शेरशाह सूरी का आधिपत्य रहा, पर इसी वर्ष अकबर ने विजय प्राप्त की और अफगान शासन का अन्त हो गया। सन् 1751 से लेकर 1766 तक इटावा ने मराठा राज्य के अन्तर्गत स्वतन्त्रता का सुख भोगा इसी काल खण्ड में प्रसिद्ध मराठा सेनापति सदाशिव रावभाऊ ने दिल्ली विजय के उपलक्ष्य में यमुना के तट पर प्रसिद्ध टिक्सी महादेव मन्दिर का निर्माण कराया जो आज भी हिन्दू समाज के लिए गौरव चिन्ह के रूप में गर्व से सिर उठाए स्थित है।
सन् 1805 में इटावा, ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार में आ गया। सन् 1857 के स्वातंत्र्य युद्ध में इटावा भी कूद पड़ा। यहां के रणबांकुरों ने अंग्रेजों को मारकर जेल का फाटक तोड़ दिया, सरकार खजाना लूट लिया गया। तत्कालीन कलक्टर ह्यूय ने महिला के वेश में बाह मार्ग से आगरा भाग कर अपने प्राण बचाए। फरवरी 1858 में उसी ह्यूय ने अपनी सेना एकत्रित करके इटावा पर धावा बोला और अपना अधिकार कर लिया।
स्वातंत्र्य युद्ध के काल में इटावा निवासियों ने भंयकर यातनाएं झेलीं। चकरनगर और रूरू के राज्य नष्ट कर दिये गये। कुदरैल, राजपुर, सिकरौली, नीमरी, बिण्डवा खुर्द, बदरा ककहरा, सिण्डौस और बंसरी के सूबेदार आदि सभी की जमीदारियां जब्त करके ब्रिटिश राज्य में मिला ली गई। सैंकड़ों व्यक्ति मारे गये और सहóों घायल हुए। कटरा साहब खां फाटक पर अंग्रेजों की एक सैनिक टुकड़ी पर वहां के निवासियों ने आक्रमण कर 14 अंग्रेज मार डाले। प्रतिशोध की भावना से अंग्रेजों ने अनेक लोगों को गोलियों से भून दिया।
पर शौर्य की इन गाथाओं के ठीक विपरीत अने जमींदार और सरकारी अधिकारी अंग्रेजों से मिल गए और इस स्वातंत्र्य युद्ध की पीठ में छुरा भांेक कर स्वयं को कलंकित कर लिया। सन् 1860 और 1868 में इटावा को भंयकर अकाल के रूप में दैवी आपŸिायां भी झेलनी पड़ी। जनपद निवासी पेड़ों की छाल, पत्तियां और जड़े खाने को विवश हो गए। हजारों व्यक्ति इन भंयकर अकालों की भेंट चढ़ गये। अकाल से त्राण पाने के लिए अंग्रेजों ने पूरे जनपद में नहरों का जाल बिछा दिया। वितरण प्रणाली विकसित की गई। उद्योग धंधों को बढ़ावा देने के नाम पर परम्परा पुश्तैनी धंधे नष्ट होते गए।
सन् 1884 में इटावा में आर्य समाज का दौर प्रारंभ हुआ। सन् 1888 में वेद व्याख्याता पं. भीमसेन जी के इटावा आ जाने पर सनातन धर्म में नई चेतना प्रारंभ हुई। इसी समय गौरक्षा आन्दोलन का काम भी इटावा में जोर शोर से प्रारंभ हुआ। सन् 1885 में पूर्व जिलाधिकारी मि. ह्यूय ने कांग्रेस की स्थापना की। पर इटावा में कांग्रेस का प्रभाव 1919 से बढ़ सका। उस काल में पं. बालेश्वर प्रसाद मिश्र, बाबू जोरावर सिंह और पं. रूपनारायण वाजपेयी आदि कांग्रेस के स्तम्भ माने जाते थे। सन् 1920, 22, 30, 41 और 1942 में इटावा में स्वातंत्र्य आन्दोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। हजारों लोग जेल गये, अनेक लोग गोली के शिकार हुए और उन्हीं ज्ञात-अज्ञात बंधुओं के बलिदान के फलस्वरूप ही 1947 में भारत में स्वतंत्रता प्राप्त की।
राजनैतिक व सामाजिक तथा साहित्यिक क्षेत्र में इटावा का गौरवशाली इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के समय कमाण्डर अर्जुन सिंह भदौरिया, कृष्ण लाल जैन, होती लाल अग्रवाल,देवी दयाल दुबे आदि ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। स्वतंत्रता के बाद भी राजनैतिक क्षेत्र में कृष्ण लाल जैन साहब, कमाण्डर साहब, बद्री प्रसाद पालीवाल, होती लाल अग्रवाल का विशेष योगदान रहा और बाद में मुलायम सिंह यादव, बलराम सिंह यादव, भारत सिंह चैहान आदि नेताओं ने इटावा का गौरव बढ़ाया।
साहित्यिक क्षेत्र में देव, गंग से जो धारा बही उसे शिशु, बल्लभ, नीरज आदि साहित्यकारों ने आगे बढ़ाया और आज भी इटावा में रमन, रजनीश, राम प्रकाश शर्मा, ओम प्रकाश दीक्षित, कुश चतुर्वेदी आदि उसे आगे बढ़ा रहे हैं। हिन्दी के विकास प्रसार प्रचार में न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्त का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा and many more things.

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