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आईये जानते है गोविंद देव जी के मन्दिर के बारे में जो जयपुर (राजस्थान) में स्थित है। भगवान कृष्ण का जयपुर का सबसे प्रसिद्...
13/09/2024

आईये जानते है गोविंद देव जी के मन्दिर के बारे में जो जयपुर (राजस्थान) में स्थित है।

भगवान कृष्ण का जयपुर का सबसे प्रसिद्ध बिना शिखर का मंदिर। यह चन्द्र महल के पूर्व में बने जय निवास बगीचे के मध्य अहाते में स्थित है।संरक्षक देवता गोविंदजी की मुर्ति पहले वृंदावन के मंदिर में स्थापित थी जिसको सवाई जय सिंह द्वितीय ने अपने परिवार के देवता के रूप में यहाँ पुनः स्थापित किया था। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र एवं मथुरा के राजा वज्रनाभ ने अपनी माता से सुने गए भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप के आधार पर तीन विग्रहों का निर्माण करवाया इनमें से पहला विग्रह है गोविंद देव जी का है दूसरा विग्रह जयपुर के ही श्री गोपीनाथ जी का है तथा तीसरा विग्रह है श्री मदन मोहन जी करौली का है वजरनाभ के माता के अनुसार श्री गोविंद देव का मुख, श्री गोपीनाथ का वक्ष, श्री मदन मोहन के चरण श्री कृष्ण के स्वरूप से मेल खाते हैं पहले यह तीनों विग्रह मथुरा में स्थापित थे किंतु 11वीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में मोहम्मद गजनवी के आक्रमण के भय से इन्हें जंगल में छिपा दिया गया 16 वी शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर उनके शिष्यों ने इन विग्रहों को खोज निकाला और मथुरा वृंदावन में स्थापित कर दिया सन 1669 में जब औरंगजेब ने मथुरा के समस्त मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया तो गौड़ीय संप्रदाय के पुजारी इन विग्रहों को उठाकर जयपुर भाग आए इन तीनों विग्रहों को जयपुर में ही स्थापित कर दिया गया गोविंद देव जी को जयपुर का शासक माना गया और वहां शासकीय मर्यादा लागू हुई

आईये हम जानते हैं जयपुर के हवामहल के बारे में। हवा महल भारतीय राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक राजसी-महल है। इसे स...
12/09/2024

आईये हम जानते हैं जयपुर के हवामहल के बारे में।

हवा महल भारतीय राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक राजसी-महल है। इसे सन 1799 में राजस्थान जयपुर बड़ी चौपड़ पर मेट्रो स्टेशन के पास महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने बनवाया था और इसे किसी 'राजमुकुट' की तरह वास्तुकार लाल चंद उस्ताद द्वारा डिजाइन किया गया था। इसकी अद्वितीय पाँच-मंजिला इमारत जो ऊपर से तो केवल डेढ़ फुट चौड़ी है, बाहर से देखने पर मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखाई देती है, जिसमें 953 बेहद खूबसूरत और आकर्षक छोटी-छोटी जालीदार खिड़कियाँ हैं, जिन्हें झरोखा कहते हैं। इन खिडकियों को जालीदार बनाने के पीछे मूल भावना यह थी कि बिना किसी की निगाह पड़े "पर्दा प्रथा" का सख्ती से पालन करतीं राजघराने की महिलायें इन खिडकियों से महल के नीचे सडकों के समारोह व गलियारों में होने वाली रोजमर्रा की जिंदगी की गतिविधियों का अवलोकन कर सकें। इसके अतिरिक्त, "वेंचुरी प्रभाव" के कारण इन जटिल संरचना वाले जालीदार झरोखों से सदा ठण्डी हवा, महल के भीतर आती रहती है, जिसके कारण तेज गर्मी में भी महल सदा वातानुकूलित सा ही रहता है।
चूने, लाल और गुलाबी बलुआ पत्थर से निर्मित यह महल जयपुर के व्यापारिक केंद्र के हृदयस्थल में मुख्य मार्ग पर स्थित है। यह सिटी पैलेस का ही हिस्सा है और ज़नाना कक्ष या महिला कक्ष तक फैला हुआ है। सुबह-सुबह सूर्य की सुनहरी रोशनी में इसे दमकते हुए देखना एक अनूठा एहसास देता है।

जय हो बाँके बिहारी जी कीआईये हम बिहारी जी के बारे में जाने कुछ ऐसे तथ्य जिनके बारे में हमे पता ही नही है और हमने बहुत बा...
10/09/2024

जय हो बाँके बिहारी जी की
आईये हम बिहारी जी के बारे में जाने कुछ ऐसे तथ्य जिनके बारे में हमे पता ही नही है और हमने बहुत बार इनके दर्शन किये है।

बाँके बिहारी मंदिर भारत में मथुरा जिले के वृंदावन धाम में बिहारीपुरा में स्थित है। यह भारत के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बाँके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है जो इसमें प्रदर्शित किया गया है। इसका निर्माण 1535 में स्वामी हरिदास ने करवाया था।

वृंदावन में बांके बिहारी जी का विशाल मंदिर है, जहां देश-विदेश से भक्त सिर्फ उनकी एक झलक पाने के लिए यहां आते हैं। किंवदंतियों के अनुसार, मार्गशीर्ष माह की पंचम तिथि को बांके बिहारी यहां प्रकट हुए थे। यह मंदिर पुराने शहर में स्थित है। श्री बांके बिहारी मंदिर का निर्माण स्वामी हरिदास के वंशजों के सामूहिक के प्रयासों से हुआ था। मंदिर में बांके बिहारी की काले रंग की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में कृष्ण और राधा का मिलाजुला रूप समाया हुआ है। इसके पीछे प्रचलित लोक कथा के अनुसार स्वामी हरिदास भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य मानते थे।
उन्होंने अपना संगीत कन्हैया को ही समर्पित कर रखा था। वह अकसर वृंदावन स्थित श्री कृष्ण की रास लीला स्थली में बैठकर संगीत से कन्हैया की आराधना करते थे। माना जाता है कि जब भी स्वामी हरिदास श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन होते तो श्रीकृष्ण उन्हें दर्शन देते थे। एक दिन स्वामी हरिदास के शिष्य ने कहा कि बाकी लोग भी राधे कृष्ण के दर्शन करना चाहते हैं। उनकी भावनाओं का ध्यान रखकर स्वामी हरिदास भजन गाने लगे। जब श्रीकृष्ण और राधा ने उन्हें दर्शन दिए।

तो उन्होंने भक्तों की इच्छा उनसे जाहिर की। तब राधा-कृष्ण ने उसी रूप में उनके पास ठहरने की बात कही। इस पर हरिदास ने कहा कि कान्हा मैं तो संत हूं, तुम्हें तो कैसे भी रख लूंगा, लेकिन राधा रानी के लिए रोज नए आभूषण और वस्त्र कहां से लाऊंगा। भक्त की बात सुनकर श्री कृष्ण मुस्कुराए और इसके बाद राधा व कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह रूप में प्रकट हुई। कृष्ण-राधा के इस रूप को स्वामी हरिदास ने बांके बिहारी नाम दिया। ध्रुपद के जनक स्वामी हरिदास का जन्म विक्रम संवत 1535 में भाद्रपक्ष शुक्ल पक्ष की अष्टमी को हुआ था।

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07/05/2024

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Hello bachchon , welcome back to my channel sarkari naukri , my self akshay vashishta and i hope you all are doing well So students today i m here with one ...

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04/05/2024

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राजस्थान सरकार में मंत्री बनने पर सभी को हार्दिक बधाई और बहुत बहुत शुभकामनायें
30/12/2023

राजस्थान सरकार में मंत्री बनने पर सभी को हार्दिक बधाई और बहुत बहुत शुभकामनायें

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