SHÀñshêr -Sâîñj Válléý Héávéñ ôñ ťhe Ëàrťh

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SHÀñshêr -Sâîñj Válléý Héávéñ  ôñ ťhe Ëàrťh This page respresnt,s local culture, activities & beautiful destinations ( Temple, lake, sightseeing, tourism place, ) of sainj valley & GHNP.

16/04/2026


08/07/2025
25/06/2025

प्री मानसून में ही सैंज नदी ने दिखा दिया अपना रुद्र रूप।

30/03/2025

आप सभी को हिंदू नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

यह नववर्ष आपके जीवन में नई खुशियाँ, समृद्धि और सफलता लेकर आए। परम पिता मनु महाराज जी आपको और आपके परिवार को सुख, शांति और स्वास्थ्य प्रदान करे।

Thanks  news
27/01/2025

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देहुरी धार की सिहन में युवा साथी स्व. सुनील ठाकुर की याद में आयोजित मेमोरियल वॉलीबॉल कप के समापन समारोह में उनके पिता श्...
26/01/2025

देहुरी धार की सिहन में युवा साथी स्व. सुनील ठाकुर की याद में आयोजित मेमोरियल वॉलीबॉल कप के समापन समारोह में उनके पिता श्री निमत राम ठाकुर जी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की, मेमोरियल कप पर देउठा
टीम ने कब्ज़ा किया तथा मझान उपविजेता रहा।

Thanks  News👏
25/01/2025

Thanks News👏

27/11/2024

कुलूत देश की कहानी
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लेखक: लालचंद प्रार्थी
जीवन एक कल्पना है। इसी कल्पना के सहारे जीवन आगे बढ़ता है। कल्पना की ऊंची उड़ान और गहरी डुबकी कल्पना का हर मोड़ एक कहानी बनाता जाता है जिसे लोग इतिहास कहते हैं। ऐसी ही एक कहानी है कुलूत देश की।
कुलूत आज के कुल्लू का प्राचीनतम नाम है। ऋग्वेद में दस्युराज कौलितर शम्बर से सम्बन्धित ऐतिहासिक घटनाओं से उसका कोल जाति से होना सिद्ध होता है और इसी कोल शब्द के संदर्भ से कुलूत और कुल्लू शब्द व्यवहार में आए हैं। कोल जाति के राज्य विस्तार की अन्तिम सीमा कुलूत की गहन उपत्यकाओं तक ही थी और इस से आगे था किरात क्षेत्र।
यही कुलूत हिमवन्त, हिमवान...हिमालय...हिमाचल...का वह भू-भाग, जिसका सीधा सम्बन्ध है सृष्टि की रचना से..... जहां प्रकृति की उथल-पुथल में डोलते पर्वतों में से अन्तिम पर्वत को आर्यों के आदि देव वृत्रहन्ता इन्द्र ने कील कर स्थित किया और तब उसका नाम पड़ा इन्द्र कील पर्वत। जहां प्राकृतिक तत्वों के भयंकर संघर्ष, महा-शिव के ताण्डव, के फल स्वरुप उत्पन्न हुई विद्युत (बिजली) को पिया महादेव शंकर ने और अब भी पीता है हर बारह वर्ष के बाद और पी कर उसे शान्त कर देता है व्यास और पार्वती के संगम में तभी उसे कहते हैं विज्लेश्वर महादेव या बिजली महादेव।
बौद्ध शास्त्रों में जिसे स्थान मिला है एक महान तीर्थ का...इसी कुलूत में है। भूगु तुंग पर्वत श्रृंखला। जिसे अब रोहतांग (Rohtang) कहते हैं। जहां तप किया आदि भृगु ने और तब साक्षात उतारा अग्नि देवता को पृथ्वी पर पहली बार, फिर हुआ निर्माण ऋग्वेद की आदि ऋचा का 'ओं अग्नि मीले पुरोहितं यशस्य देवं ऋत्विजम् होतारम् रत्न घातमम्'...। आदि भूगु की यह तपः स्थलि आज भूगु तीर्थ के नाम से विख्यात है। यही पर्वत श्रृंखला है स्रोत सप्त सिन्धु की पावन पुनीत नदी अजिकीया का जो महा मुनि वशिष्ट को पाशमुक्त करने पर विपाश कहलाई और फिर कहा गया इसे व्यास व्यास उपत्यका की जन्मदाता।
यही कुलत है आदि मानव का देश जहां मनु ने अपना घर बनाया...मन्वालय। महान जल प्लावन (The Great Deluge) के बाद और जहां से मानव वंश का पुनः प्रसार हुआ.. यही ऐतिहासिक स्थली आज मनाली कहलाती है।
इसी कुलूत में तप किया भृगु, भारद्वाज, वामदेव, गौतम, कपिल, कण्व, कणाद, वशिष्ट, श्रृंगी, पराशर, व्यास, नारद, द्वैपायन, धौम्य, शांडिल्य, कात्यायन, कार्तिक आदि ऋषियों ने। जहां भूगु वंशज जमदग्नि ने स्थापित किया संतार का सबसे पुराना जन पद मलाणा (The oldest democratic system of the world) जो आज तक उन्हीं परम्पराओं के आधार पर चल रहा है। जहां भगवान् परशुराम ने किया सबसे पहला नरमेध यज्ञ और सफलता प्राप्त की मां अम्बा के निर्मुण्ड शव में सिर जोड़ने और शरीर में पुनः प्राणों का संचार करने में।
यह वही कुलूत है जहां बाशराज की पृष्ठ भूमि का एक प्रसिद्ध स्थल। चन्द्रभागा, विपाश और शतद्रू की कर्म भूमि। कोल जाति के दस्युराज कौलितर शम्बर का राज्य भाग। जहां विपाशा के किनारे आदि चार्यजनों ने आंख खोली...जहां महामुनि वशिष्ट को आत्म शान्ति प्राप्त हुई। जहां तप किया श्रृंगी जैसे बाल ब्रह्मचारी ने। जिनके पुत्रेष्टि यज्ञ के फलस्वरुप पैदा हुए भगवान राम। न होते श्रृंगी... न पैदा होते राम। न मरता रावण, न लिखी जाती रामायण।
यह वही कुलूत है जहां पराशर पुत्र द्व पाइन ने दरपौइण आश्रम में बाल्यावस्था में साधना की। जहां बैठ कर महामुनि वेद व्यास ने समय निकाला वेदों के संकलन और कुछ पुराणों की रचना के लिए। जहां ररोमांस लड़ा भीमसेन और हिडिम्बा का और जिसके फल- स्वरुप उत्पन्न हुए घटोत्कच्छ जैसे वीर योद्धा और स्वयं हिडिम्बा को प्राप्त हुआ देवत्व और फिर दादी बनी पाल वंशज कुल्लू के राजाओं की।
यह वही कुलूत है जहां इन्द्र कील पर्वत श्रृंखला में अर्जुन ने तप करके भगवान् शंकर को प्रसन्न किया और महाभारत युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए उनसे किरात के वेश में पाशुपत अस्त्र वरदान में पाया। तब कवि कालिदास को मिली पृष्ठ भूमि 'किरातार्जुनी' नाटक लिखने की।
यह वही कुलूत है जहां पाण्डवों की तीनों पर्वत यात्राओं का प्रसंग मिलता है और सम्भवतः महा प्रस्थान भी उसमें शामिल हैन जहां महात्मा विदुर के पुत्र मक्कड़ ने मकड़सा राज्य की नींव डाली और मकड़ान की पर्वत श्रृंखला तक विजय प्राप्त की।
यह वही कुलूत है जहां मानव और दानव का संघर्ष हुआ। कोल, किरात, नाग, खश, कनैत आदि जातियों के फैलाव और टकराव हुए।
यह वही कुलूत है जहां धार्मिक एवं सामाजिक परम्पराओं और रीति रिवाजों की मुठभीड़ के बाद एक नई संस्कृति का जन्म हुआ, परन्तु प्रत्येक समाज की प्राचीन आस्था किसी न किसी रूप में काइम रही दीप से दीप जलते रहे।
यह वही कुलूत है जहां भगवान बुद्ध के चरण पड़े जिसकी स्मृति में महाराज अशोक ने एक स्तम्भ खड़ा किया जो अब है नहीं... आवश्यक है जिसकी खोज।
-लाल चंद प्रार्थी

Glimpses of Sainj mela 2024
06/05/2024

Glimpses of Sainj mela 2024

👏🏻❤️
14/04/2024

👏🏻❤️

अर्थ है तू निरथ भी ज्ञान और अज्ञान भी,
एक तू ही सार है संसार तेरे चरण में,
नील लोहित तार देने आ गया तेरी शरण में,
तू ही दाता विशव विधाता
तेरी दुनिया सारी
कैसा यह इंसान बनाया
शान तेरी है न्यारी❤️🙏 सृष्टि के रचेता प्रभु मनु महाराज जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें 🔱🙏रक्षा करना प्रभु।। आपकी बनाई हुई सृष्टि बहुत बड़े संकट मे हैँ.। 🙏
अपना आशीर्वाद हमेशा बनाये रखना हम पर प्रभु 🙏

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