23/03/2025
शहीदी दिवस २३ मार्च
एक साल बाद चलने वाली ट्रेन को देखकर बड़े बूढ़ों और बच्चों में एक अलग ही उत्साह था, जंग लगी पटरी पर ट्रैन चल रही थी। काफी घास फूस भी पटरियों पर उगी हुई थी इसे रोंदती हुई ट्रेन हुसैनी वाला की तरफ चलती जा रही थी।
रास्ते में एक स्थान पर ट्रेन रुकी, हालाँकि आज शहीदी दिवस था इसलिए यहाँ शरबत वितरण हो रहा था। इसके बाद हुसैनीवाला पहुँच गए। सतलज नदी के किनारे एक छोटा सा टिकटघर बना था, यही हुसैनी वाला का स्टेशन है, यहाँ कोई प्लेटफॉर्म नहीं है।
यहाँ आकर ही मैंने जाना कि मैं पाकिस्तान के बॉर्डर पर आ चुका हूँ। अंग्रेजों के समय में जब पाकिस्तान नहीं बना था उस समय रेलवे लाइन फ़िरोज़पुर से लाहौर होते हुए पेशावर तक जाती थी, इसी रूट पर पंजाब मेल मुंबई से पेशावर के बीच चलती थी और सिर्फ पंजाब मेल ही नहीं, फ्रंटियर मेल भी जिसे अब स्वर्ण मंदिर मेल कहते है अमृतसर होते हुए लाहौर के रास्ते पेशावर जाती थी।
इसके अलावा ग्रैंड ट्रक एक्सप्रेस जो जी टी एक्सप्रेस भी कहलाती है मद्रास से चलकर फ़िरोज़पुर होते हुए पेशावर तक जाती थी। उस समय यह एक मीटर गेज की लाइन थी।
हुसैनीवाला उस समय काफी बड़ा स्टेशन था, सतलज के दोनों छोरों पर केसर 'ए' हिन्द नामक एक विशाल पुल के अवशेष अब भी यहाँ देखे जा सकते हैं और नदी के बीच में खड़े वो पिलर आज भी हमें उस ज़माने की याद दिलाते है जब यहाँ से ट्रेन सीधे लाहौर और पेशावर तक जाती थी।
आजादी के बाद हुसैनीवाला और केसर ए हिन्द रेलवे पुल पाकिस्तान की सीमा में चला गया और पाकिस्तान ने बिना देर किये इस ब्रिज को तोड़ दिया। हमारे तीनों महान क्रांतिकारियों समाधि स्थल भी पाकिस्तान की सीमा में चला गया जो हिंदुस्तानी लोगों को नागवार लगा इसलिए हिंदुस्तानी लोगों की श्रद्धा को देखते हुए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी के आग्रह पर पाकिस्तान से यह जगह हिंदुस्तान में आई और इससे दुगनी जगह भारत को पाकिस्तान को देनी पड़ी, इसके पीछे मुख्य कारण था सतलज के पार स्थित भगत सिंह जी की समाधी।
जब लाहौर जेल में बंद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव् को फांसी की सजा सुनाई गई तो 24 मार्च की तारीख निश्चित की गई। किन्तु हिन्दुस्तानियों के बढ़ते क्रोध और उपद्रव को देखकर अंग्रेज डर गए और उन्होंने इन तीनों महान क्रांतिकारियों को सजा की तारीख के एक दिन पहले यानि 23 मार्च शाम को सवा सात बजे ही फांसी दे दी और लाहौर जेल की पिछली दीवार को तोड़कर रात के अँधेरे में तीनो के शवों को यहाँ सतलज के पास रेल लाइन के किनारे लाकर जला दिया।
जब गांव वालों ने आधी रात को जंगल में आग लगती देखी तो उन्हें कुछ संदेह हुआ, ग्रामीणों को आते देख अंग्रेज अधजली लाशो को छोड़कर भाग खड़े हुए। ग्रामीणों ने जब इनकी पहचान की तो विधिवत रूप से उनका अंतिम संस्कार किया, और आज उसी स्थान पर उन महान क्रांतिकारियों की समाधियाँ बनी हुईं हैं। पंजाब का वो वीर पुत्तर तो हमेशा के लिए सो गया परन्तु अपने पीछे छोड़ गया भारतीयों के दिलों में बलिदान की वो गाथा जिसे हिंदुस्तान कभी नहीं भुला पायेगा।
आज के दिन यहाँ काफी बड़े बड़े लोग भी देखने को मिल जाते हैं मुझे भी मिले, पंजाब के आदरणीय मुख्यमंत्री जी प्रकाश सिंह बादल। काफी बड़ा काफिला था, आते ही तीनो क्रांतिकारियों की अमर ज्योति पर श्रद्धांजलि दी और उसके बाद मूर्तियों पर माल्यार्पण कर पास में लगे विशाल मंच पर भाषण दिया।
मैं भी कुछ समय के लिए उनका भाषण सुनने लगा परन्तु जब कुछ समझ में नहीं आया तो उठ कर चल दिया , पंजाबी भाषा थी तो कुछ समझ में नहीं आया। वापस स्टेशन पर आकर देखा तो ट्रेन में आने में अभी काफी वक़्त था तो केसर ए हिन्द पुल के पूर्वी सिरे को देखने को चला गया। इसे ईस्टर्न पीयर्स भी कहते हैं। यहाँ किसी ज़माने में पुराना हुसैनीवाला स्टेशन हुआ करता था।
विस्तृत विवरण 👇
https://upadhyaytrips.blogspot.com/2018/03/husainiwala-border.html?m=1