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Manali
17/01/2020

Manali

बाबा बालकनाथ जी हिन्दू आराध्य हैं, जिनको उत्तर-भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश , पंजाब , दिल्ली में बहुत श्रद्धा से पूजा जाता...
17/01/2020

बाबा बालकनाथ जी हिन्दू आराध्य हैं, जिनको उत्तर-भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश , पंजाब , दिल्ली में बहुत श्रद्धा से पूजा जाता है, इनके पूजनीय स्थल को “दयोटसिद्ध” के नाम से जाना जाता है, यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के चकमोह गाँव की पहाड़ी के उच्च शिखर में स्थित है। मंदिर में पहाडी के बीच एक प्राकॄतिक गुफा है, ऐसी मान्यता है, कि यही स्थान बाबाजी का आवास स्थान था। मंदिर में बाबाजी की एक मूर्ति स्थित है, भक्तगण बाबाजी की वेदी में “ रोट” चढाते हैं, “ रोट ” को आटे और चीनी/गुड को घी में मिलाकर बनाया जाता है। यहाँ पर बाबाजी को बकरा भी चढ़ाया जाता है, जो कि उनके प्रेम का प्रतीक है, यहाँ पर बकरे की बलि नहीं चढ़ाई जाती बल्कि उनका पालन पोषण करा जाता है। बाबाजी की गुफा में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबन्ध है, लेकिन उनके दर्शन के लिए गुफा के बिलकुल सामने एक ऊँचा चबूतरा बनाया गया है, जहाँ से महिलाएँ उनके दूर से दर्शन कर सकती हैं। मंदिर से करीब छहः कि॰मी॰ आगे एक स्थान “शाहतलाई” स्थित है, ऐसी मान्यता है, कि इसी जगह बाबाजी “ध्यानयोग” किया करते थे।

बाबा बालकनाथ
जन्म
गुजरात, काठियाबाद
राष्ट्रीयता
भारतीय
प्रसिद्धि कारण
संत
धार्मिक मान्यता
हिन्दू
कहानी संपादित करें
बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में “ स्कन्द ”, “ त्रेता युग” में “ कौल” और “ द्वापर युग” में “महाकौल” के नाम से जाने गये। अपने हर अवतार में उन्होंने गरीबों एवं निस्सहायों की सहायता करके उनके दुख दर्द और तकलीफों का नाश किया। हर एक जन्म में यह शिव के बड़े भक्त कहलाए। द्वापर युग में, ”महाकौल” जिस समय “कैलाश पर्वत” जा रहे थे, जाते हुए रास्ते में उनकी मुलाकात एक वृद्ध स्त्री से हुई, उसने बाबा जी से गन्तव्य में जाने का अभिप्राय पूछा, वृद्ध स्त्री को जब बाबाजी की इच्छा का पता चला कि वह भगवान शिव से मिलने जा रहे हैं तो उसने उन्हें मानसरोवर नदी के किनारे तपस्या करने की सलाह दी और माता पार्वती, (जो कि मानसरोवर नदी में अक्सर स्नान के लिए आया करती थीं) से उन तक पहुँचने का उपाय पूछने के लिए कहा। बाबाजी ने बिलकुल वैसा ही किया और अपने उद्देश्य, भगवान शिव से मिलने में सफल हुए। बालयोगी महाकौल को देखकर शिवजी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बाबाजी को कलयुग तक भक्तों के बीच सिद्ध प्रतीक के तौर से पूजे जाने का आशिर्वाद प्रदान किया और चिर आयु तक उनकी छवि को बालक की छवि के तौर पर बने रहने का भी आशिर्वाद दिया।

कलयुग में बाबा बालकनाथ जी ने गुजरात, काठियाबाद में “देव” के नाम से जन्म लिया। उनकी माता का नाम लक्ष्मी और पिता का नाम वैष्णो वैश था, बचपन से ही बाबाजी ‘आध्यात्म’ में लीन रहते थे। यह देखकर उनके माता पिता ने उनका विवाह करने का निश्चय किया, परन्तु बाबाजी उनके प्रस्ताव को अस्विकार करके और घर परिवार को छोड़ कर ‘ परम सिद्धी ’ की राह पर निकल पड़े। और एक दिन जूनागढ़ की गिरनार पहाडी में उनका सामना “स्वामी दत्तात्रेय” से हुआ और यहीं पर बाबाजी ने स्वामी दत्तात्रेय से “ सिद्ध” की बुनियादी शिक्षा ग्रहण करी और “सिद्ध” बने। तभी से उन्हें “ बाबा बालकनाथ जी” कहा जाने लगा।

बाबाजी के दो पृथ्क साक्ष्य अभी भी उप्लब्ध हैं जो कि उनकी उपस्तिथि के अभी भी प्रमाण हैं जिन में से एक है “ गरुन का पेड़” यह पेड़ अभी भी शाहतलाई में मौजूद है, इसी पेड़ के नीचे बाबाजी तपस्या किया करते थे। दूसरा प्रमाण एक पुराना पोलिस स्टेशन है, जो कि “बड़सर” में स्थित है जहाँ पर उन गायों को रखा गया था जिन्होंने सभी खेतों की फसल खराब कर दी थी, जिसकी कहानी इस तरह से है कि, एक महिला जिसका नाम ’ रत्नो ’ था, ने बाबाजी को अपनी गायों की रखवाली के लिए रखा था जिसके बदले में रत्नो बाबाजी को रोटी और लस्सी खाने को देती थी, ऐसी मान्यता है कि बाबाजी अपनी तपस्या में इतने लीन रहते थे कि रत्नो द्वारा दी गयी रोटी और लस्सी खाना याद ही नहीं रहता था। एक बार जब रत्नो बाबाजी की आलोचना कर रही थी कि वह गायों का ठीक से ख्याल नहीं रखते जबकि रत्नो बाबाजी के खाने पीने का खूब ध्यान रखतीं हैं। रत्नो का इतना ही कहना था कि बाबाजी ने पेड़ के तने से रोटी और ज़मीन से लस्सी को उत्त्पन्न कर दिया। बाबाजी ने सारी उम्र ब्रह्मचर्य का पालन किया और इसी बात को ध्यान में रखते हुए उनकी महिला भक्त ‘गर्भगुफा’ में प्रवेश नहीं करती जो कि प्राकृतिक गुफा में स्थित है जहाँ पर बाबाजी तपस्या करते हुए अंतर्ध्यान हो गए थे।

26/05/2018
...................... #हनुमान_चालीसा :--हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं,,,,,क्या हमे हनुमान चालीसा पढते समय पता भी होता है...
05/04/2018

...................... #हनुमान_चालीसा :--

हम सब हनुमान चालीसा पढते हैं,,,,,

क्या हमे हनुमान चालीसा पढते समय पता भी होता है कि हम हनुमानजी से क्या कह रहे हैं या क्या मांग रहे हैं?

बस रटा रटाया बोलते जाते हैं। आनंद और फल शायद तभी मिलेगा जब हमें इसका मतलब भी पता हो।

तो लीजिए पेश है श्री हनुमान चालीसा अर्थ सहित!!

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श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।
📯《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।★
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बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।★
📯《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।★
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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥★
📯《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।★
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राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥★
📯《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।★
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महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥★
📯《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।★
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कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥★
📯《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।★
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हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥★
📯《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।★
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शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥★
📯《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।★
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विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥★
📯《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।★
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प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥★
📯《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।★
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सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥★
📯《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।★
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भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥★
📯《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।★
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लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥★
📯《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।★
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रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।★
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सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥★
📯《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।★
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सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥★
📯《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।★
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जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥★
📯《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।★
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तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥★
📯《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।★
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तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥★
📯《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।★
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जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥★
📯《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।★
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प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥★
📯《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।★
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दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥★
📯《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।★
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राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥★
📯《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।★
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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥★
📯《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।★
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आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥★
📯《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।★
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भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥★
📯《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।★
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नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥★
📯《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।★
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सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥★
📯《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।★
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और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥★
📯《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।★
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चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥★
📯《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।★
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साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥★
📯《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।★
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अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥★
📯《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।★

िद्धियाँ:--

1.) अणिमा → जिससे साधक किसी को दिखाई नही पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ मे प्रवेश कर.जाता है।★
2.) महिमा → जिसमे योगी अपने को बहुत बड़ा बना देता है।★
3.) गरिमा → जिससे साधक अपने को चाहे जितना भारी बना लेता है।★
4.) लघिमा → जिससे जितना चाहे उतना हल्का बन जाता है।★
5.) प्राप्ति → जिससे इच्छित पदार्थ की प्राप्ति होती है।★
6.) प्राकाम्य → जिससे इच्छा करने पर वह पृथ्वी मे समा सकता है, आकाश मे उड़ सकता है।★
7.) ईशित्व → जिससे सब पर शासन का सामर्थय हो जाता है।★
8.)वशित्व → जिससे दूसरो को वश मे किया जाता है।★

#नौ_निधियां :--

हनुमान जी प्रसन्न होने पर जो नव निधियां भक्तों को देते है वो इस प्रकार हैं --

1. पद्म निधि : पद्मनिधि लक्षणो से संपन्न मनुष्य सात्विक होता है तथा स्वर्ण चांदी आदि का संग्रह करके दान करता है ।

2. महापद्म निधि : महाप निधि से लक्षित व्यक्ति अपने संग्रहित धन आदि का दान धार्मिक जनों में करता है ।

3. नील निधि : निल निधि से सुशोभित मनुष्य सात्विक तेजसे संयुक्त होता है। उसकी संपति तीन पीढीतक रहती है।

4. मुकुंद निधि : मुकुन्द निधि से लक्षित मनुष्य रजोगुण संपन्न होता है वह राज्यसंग्रह में लगा रहता है।

5. नन्द निधि : नन्दनिधि युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है वही कुल का आधार होता है ।

6. मकर निधि : मकर निधि संपन्न पुरुष अस्त्रों का संग्रह करनेवाला होता है ।

7. कच्छप निधि : कच्छप निधि लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाला होता है वह अपनी संपत्ति का स्वयं उपभोग करता है ।

8. शंख निधि : शंख निधि एक पीढी के लिए होती है।

9. खर्व निधि : खर्व निधिवाले व्यक्ति के स्वभाव में मिश्रीत फल दिखाई देते हैं ।
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राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥★
📯《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।★
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तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥★
📯《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।★
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अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥★
📯《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।★
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और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥★
📯《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।★
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संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥★
📯《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।★
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जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥★
📯《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।★
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जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥★
📯《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।★
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जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥★
📯《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।★
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तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥★
📯《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।★
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पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥★
📯《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।★

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
🌹सीता राम दूत श्री हनुमान जी को समर्पित🌹
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🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
कृपया आगे भी औरौं को भेजें🙏

ज्वालामुखी देवी – यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार – होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा :) यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग ...
19/03/2018

ज्वालामुखी देवी – यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार – होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा :)
यहाँ पर पृथ्वी के गर्भ से नौ अलग अलग जगह से ज्वाला निकल रही है जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया हैं। इन नौ ज्योतियां को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है।

26/02/2018

Good morning friend's
See the beautiful himachal with my eyes

शाली देवी मंदिर  शिमला हिमाचल प्रदेश माता शाली देवी मंदिर शिमला ऊंची पहाड़ी पर स्थित एक रमणीय स्थान है। माता शाली देवी को...
16/02/2018

शाली देवी मंदिर शिमला हिमाचल प्रदेश

माता शाली देवी मंदिर शिमला ऊंची पहाड़ी पर स्थित एक रमणीय स्थान है। माता शाली देवी को माता भीमा काली का स्वरूप कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए देवदार, मौरू, बान के पेड़ों से घिरा रास्ता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। माता के दर्शन करने के लिए प्रदेशभर से लोग यहां आते हैं व माता से मन्न...

शिमला [हिमाचल प्रदेश]। माता शाली देवी मंदिर शिमला ऊंची पहाड़ी पर स्थित एक रमणीय स्थान है। माता शाली देवी को माता भीमा काली का स्वरूप कहा जाता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए देवदार, मौरू, बान के पेड़ों से घिरा रास्ता श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। माता के दर्शन करने के लिए प्रदेशभर से लोग यहां आते हैं व माता से मन्नत मांगते हैं। माना जाता है कि मां शाली देवी के मंदिर में मांगी गई मुराद जल्द ही पूरी हो जाती है। कहते हैं कि वर्षो पहले जब स्वास्थ्य सेवाएं इतनी ज्यादा उपलब्ध नहीं थी तब यहां के लोग किसी बीमारी के ठीक होने की कामना मां शाली से करते थे और बिना किसी दवाई से ठीक हो जाते थे। मां शाली को समस्त रोगों की हर्ता माना जाता है व लोगों की इस स्थान के प्रति बड़ी आस्था है।

मंदिर का इतिहास

बताया जाता है कि वर्षो पहले दलाणा गांव के एक विद्वान बदरा पंडित सराहन से देवी को लाए थे तभी से माता की मूर्ति दलाणा में स्थापित की गई थी। इसके बाद देवी के आदेश से स्थानीय लोगों ने 9420 ऊंचाई वाली चोटी शाली में मंदिर बनाया। पहले इस स्थान पर देवी माता का एक छोटा सा मंदिर हुआ करता था, लेकिन अब मंदिर विकास सभा के प्रयासों से परिसर का विकास किया गया। अब यहां पर 200 से 250 श्रद्धालुओं के ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध करवाई गई है।

कैसे पहुंचे मंदिर तक

माता शाली देवी मंदिर शिमला से करीब 50 किलोमीटर दूर है। यहां पहुंचने के लिए शिमला से खटनोल ग्राम तक सड़क सुविधा उपलब्ध है। खटनोल पहुंचने के बाद मंदिर जाने के लिए तीन घंटे का पैदल रास्ता है। यह रास्ता कठिन है और चारों ओर पेड़ों से ढंके खूबसूरत पहाड़ हैं।

जीवनगाथा पीर सखी सरवर – लखदाता जीअरब देश के बग़दाद शहर में बहुत ही करनी वाले फ़क़ीर हुऐ हैं, उनमें से एक फ़क़ीर हुऐ हैं,...
15/02/2018

जीवनगाथा पीर सखी सरवर – लखदाता जी
अरब देश के बग़दाद शहर में बहुत ही करनी वाले फ़क़ीर हुऐ हैं, उनमें से एक फ़क़ीर हुऐ हैं, सय्यद उमरशाह जी । जिन्होंने 40 साल तक “रसूले करीम सल्लाह अल्ला वस्सलहम” जी के रोज़ा मुबारक पर सेवा की । उनके 4 बेटे थे – स य्यद जैनुल आबिदीन, सय्यद हस्सन, सय्यद अली और सय्यद जफ़र ।

एक दिन सय्यद उमरशाह जी अकाल चलाना कर गए, उन के बाद उनकी गद्दी पर उनके बड़े बेटे सय्यद जैनुल आबिदीन जी को बैठाया गया । सय्यद जैनुल आबिदीन जी ने बग़दाद शरीफ में गरीबो, मजबूरों और जरुरत मंदो की 22 साल तक सेवा की, और इसी दौरान उनकी शादी बग़दाद शरीफ की बीबी अमीना जी (जिन्हे लोग बीबी फातिमा जी के नाम से भी याद करते हैं) से हुई । इनके 3 बेटे हुए सय्यद दाऊद, सय्यद महमूद और सय्यद सहरा । 22 साल की सेवा निभाने के बाद एक दिन सय्यद जैनुल आबिदीन जी अपने रूहानी गुरु जी के हुकम से बग़दाद शरीफ छोड़ कर मुल्तान (अब पाकिस्तान) के पास पड़ते गॉव शाहकोट (अब पाकिस्तान) में परिवार समेत आकर अपना डेरा जमाया । यहाँ आये अभी थोड़ा समय ही बीता था की बीबी अमीना (फातिमा) जी स्वर्ग सिधार गईं । उनकी मौत के बाद वहाँ के नम्बरदार पीर अरहान ने अपनी बेटी आइशा जी की शादी सय्यद जैनुल आबिदीन जी से करदी । इस शादी से आप के 2 बेटे पैदा हुए बड़े बेटे का नाम सय्यद अहमद सुलतान (लखदाता जी) और छोटे बेटे का नाम सय्यद अब्दुल गनी खान ढोढा रखा गया ।

जब लखदाता जी का जन्म होने वाला था तो दाई नूरां को बुलाया गया जो कई सालों से आँखों से अंधी थी । जब लखदाता जी का जन्म हुआ उस वक़्त एक बहुत अजीबो गरीब करिश्मा हुआ, जैसे ही दाई नूरां ने आप को छुआ आप की छो प्राप्त होते ही अंधी दाई नूरां की आंखों की रोशनी आ गई और उसे सब दिखाई देने लग पड़ा और उसकी अँधेरी जिंदगी फिर से रोशन हो गई । दाई नूरां ने सय्यद जैनुल आबिदीन जी से कहा हज़ूर आप के घर खुद अल्ला ने जन्म लिया है । माता आईशा जी के कहने पर सय्यद जैनुल आबिदीन जी ने दाई नूरां को जुवार का भरा घड़ा बधाई के रूप में दिया । घड़ा सिर पर उठा दाई नूरां ख़ुशी – ख़ुशी घर की तरफ चल पड़ी, रास्ते में ख्याल आया क्यूँ ना जुवार बेच कर घर का राशन ले लूं । यही सोच कर दाई नूरां बनियें की दूकान पर गई और जैसे ही उसने घड़ा सिर से उतार कर जमीन पर रखा तो दाई नूरां और बनियां हैरानी से घड़े की तरफ देखते ही रह गए जो घड़ा जुवार से भरा हुआ था उस में से सतरंगी रौशनी निकल रही है और उनकी रोशनी से सारी दूकान जगमगा उठी यानि जुवार के दाने लाल (हीरे – ज्वाहरात) बन गए और उसी दिन से आपका नाम लालां वाला पीर पड़ गया ।

रूहानियत की शिक्षा आपने अपने पिता जी से हासिल की और आगे की शिक्षा आपने लाहौर के सय्यद मोहम्मद इसहाक जी से प्राप्त की । लखदाता जी ने फैज़ (रेहमत) की शिक्षा तस्वूफ की दुनिया के तीन बड़े सिलसिलों से यानि कादरीयों, चिश्तीयों और सुहरवर्दीयों से हासिल की ।

आप के सभी नामों में से सखी सरवर नाम ज्यादा प्रचलित है क्योंकि आप इतने जयादा दरिया दिल थे जो भी आप के पास आता कैसी भी मुराद ले के आता, चाहे वो धर्म के प्रति होती चाहे दुनियादारी की मुश्किल होती आप सभी मुश्किलों का हल एक ही पल में कर देते थे ।

लखदाता जी का एक किस्सा बहुत मशहूर है, जब लखदाता जी की शादी हुई और आप को जो भी दहेज़ में मिला वो सब आपने गरीबों और जरुरतमंदो में बाँट दिया आप बहुत ऊँचे खयालों और गरीबों का धयान रखने वाले पीर थे यां यूँ कहो की दानशीलता और रूहानियत आप में कूट – कूट कर भरी हुई थी । जो भी जरूरतमंद आप के पास आता आप उस की आस मुराद जरुर पूरी करते । इसी लिए आप का नाम सखी सरवर पड़ा । यह बात उस समय से लेकर आज तक अट्टल है कोई भी सवाली, चाहे किसी भी मजहब का हो अगर सच्चे दिल से कोई भी मुराद लेकर आप के दरबार में आता है तो उस की आस-मुराद जरुर पूरी होती है ।

लखदाता जी ने अपने जीवन का काफी समय धौंकल में गुजारा और बाद में आप शाहकोट आ गए और यहीं पर आपने सय्यद अब्दुल रज़ाक जी की बेटी से शादी की और आप के एक बेटा भी हुआ जिस का नाम सय्यद सिराजुदीन रखा था । उसके बाद आपने दूसरी शादी मुल्तान के राजा घणो पठान जी की बेटी से की । लखदाता जी कई साल अपने पिता जी सय्यद जैनुल आबिदीन, माता आइशा जी और भाईओं के साथ शाहकोट में ही रहे और दीन-दुखियों की सेवा करते रहे । यहीं पर आप के पिता जी, माता जी और भाई अल्ला को प्यारे हो गए और उनके मजार शाहकोट में ही स्थित हैं ।

एक के बाद एक करके आप के सभी रिश्तेदार अल्ला को प्यारे हो गए तो आप ने शाहकोट को छोड़ने का मन बना लिया और एक दिन आप ने शाहकोट छोड़ दिया और गॉव निगाहा की तरफ रवाना हो गए, जो मुल्तान से लगभग 60 (साठ) कोह की दुरी पर है । जब आप निगाहे की तरफ रवाना हुए तो उस वक़्त आपके साथ आप की पत्नी बीबी बाई जी, आप का बेटा सय्यद सिराजुदीन जो सय्यद राज के नाम से भी प्रसिद्ध है वो और आप के छोटे भाई खान ढोढा जी भी आप के साथ थे । इनके इलावा आप के साथ आप के चार साथी भी थे, वही चार साथी जो चार यार – मियां नूर जी, मियां मुहमद इसहाक जी, मियां उस्मान जी और मियां अली जी – वो भी आप के साथ निगाहा चल दिए । लखदाता जी ने जब शाहकोट छोड़ा तो उन्होंने अपना सब कुछ वही छोड़ दिया था यहाँ तक की सारे खेत खलियान सब ऐसे ही छोड़ कर निगाहा आ गए थे ।

लखदाता जी ने गॉव निगाहा में आकर डेरा जमा लिया और यहीं पर एक झोंपड़ी बना कर बाकी की सारी जिंदगी खुदा की इबादत करते हुए गरीबों, मजलूमों और जरूरतमंदों की सेवा करते हुए अपना जीवन नौछावर कर दिया । एक बार लखदाता जी ने कुछ राहगीरों को अपने मुखारबिंद से वचन किया था की चाहे कोई फ़क़ीर हो यां चोर , राजा हो यां रंक एक दिन सब को यह दुनिया छोड़ कर जाना है बस फर्क सिर्फ इतना होता है की इंसान का जीना और मरना होता है पर जो पूर्ण पीर फ़क़ीर, संत, गुरु होते है उनका आना जाना होता है वो अपनी मर्ज़ी से आते है और अपनी मर्ज़ी से जाते है उन्हें कोई मार नहीं सकता वो अमर होते है । सखी सरवर जी, लखदाता जी, लालां वाली सरकार अपने मुरीदों में खैरातें बांटते हुए इस नाशवान दुनिया को अलविदा कह कर सचखंड में जा विराजे ।

लखदाता जी ने अपने मुरीदों से वचन किया की हमारे इस दुनिया छोड़ देने के बाद भी सब की मुरादें पूरी होंगी, अगर कोई भी इंसान, किसी भी मजहब का हो अगर उन्हें सच्चे दिल से याद करेगा तो लखदाता जी उसकी आस – मुराद जरुर पूरी करेंगे ।

समय के हुकुमरानों ने देश का बंटवारा तो कर दिया लेकिन वो लखदाता जी के मुरीदों की श्रद्धा का बंटवारा नहीं कर सके । इसी लिए आज भी दोनों देशो (हिंदुस्तान और पाकिस्तान ) में लखदाता जी के नाम के मेले लगते है और चिराग रोशन होते है ।

14/02/2018

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