01/09/2026
मक्का और मदीना तो ख़ैर शुरू से ही आम मुसमानों के लिए मुक़द्दस जगह हैं, लेकिन जैसे जैसे इस्लाम में फिरके बने, वैसे वैसे अलग-अलग फ़िरक़ों ने भी अपने नए नए मुक़द्दस जगह बना लिए।
शिया समुदाय ने नजफ़ और करबला को 'ज़ियारत' के नाम पर अक़ीदत का केंद्र बना लिया, इस तरह धार्मिक पर्यटन से ज़ाकिरों की लॉटरी लग गई।
बरेल्वियों ने बग़दाद को अपना केंद्र बना लिया, अब्दुल क़ादिर जीलानी नाम के एक हंबली विद्वान को अपनी तरफ़ से एक निकनेम 'ग़ौस पाक' रखकर, उनके नाम से अजीब अजीब किस्से कहानियां गढ़ कर मुकद्दस बना लिया।
लाहौर में दफ़्न एक बुज़ुर्ग का निकनेम 'दाता साहब' रख दिया। यहाँ भी अच्छा-ख़ासा कारोबार चल रहा है। फिर 'उस्मानी साम्राज्य/अरतग़रुल' ड्रामा आ गया और इस तरह तुर्की को भी आध्यात्मिकता और पवित्रता से जोड़ दी गई। लोग धड़ाधड़ अरतग़रुल का मज़ार वगैरह देखने पहुँचने लगे।
अभी तुर्की का क्रेज़ कुछ कम हुआ ही था कि उज़्बेकिस्तान नया आध्यात्मिक केंद्र बन गया...इमाम बुखारी का मज़ार समरकंद के पास, बहाउद्दीन नक़्शबंद का मज़ार बुखारा में।
इमाम तिर्मिज़ी, इमाम मातुरीदी, इमाम मरग़ीनानी आदि के मज़ार और यादगारों की वजह से मुकद्दस हो गया।
अब मौलवी वहाँ की ज़ियारतों के लिए लोगों को फँसा रहे हैं और इन पवित्र स्थलों में उज़्बेकिस्तान के रेगिस्तान और पहाड़ भी शामिल हैं।
धार्मिक तबक़ा कारोबार निकालने में उस्ताद है। जब एक जगह से बोरियत होने लगती है, तो ये कोई नई पवित्र ज़ियारत, मोए-मुबारक या तलवार मुबारक वगैरह निकालकर नया सुपरस्टोर खोल लेते हैं।
बचपन में परियों और जिन्नों की कहानियां हम अक्सर सुनते थे, विश्वास भी करते थे...जब हम बड़े हुए, तो हमारे सामने अफ़साने और हक़ीक़त की दुनिया का फ़र्क साफ़ हो गया...
अगर बड़े होकर हमारे सामने कोई काल्पनिक क़िस्सा या मिथक आए, चाहे वह पवित्रता के आवरण में ही क्यों न लपेटा गया हो...तो हममें इतनी मानसिक क्षमता होनी चाहिए कि हम पहचान सकें कि किस बात को महज़ एक कहानी या अफ़साने के तौर पर लेना है और किसे हक़ीक़त के तौर पर।