29/03/2026
|| ऊँ श्री परमात्मने नमः ||
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{गीता दर्पण}
{श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज}
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“अठारहवाँ अध्याय का तात्पर्य”
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*मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये उनकी रुचि,योग्यता और श्रद्धाके अनुसार तीन साधन बताये गये हैं---कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग {शरणागति} | इनमेंसे किसी भी एक साधनमें मनुष्य लग जाय तो उस का उद्धार हो जाता है |
* जो मनुष्य यज्ञ, तप और दान तथा नियत कर्तव्य-कर्मोंको आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके करता है एवं जो कुशल-अकुशल कर्मोंमें राग-द्वेष नहीं करता, वही वास्तवमें त्यागी है |
नियत कर्मोंको करते हुए भी उसको पाप नहीं लगता और उसको कहीं भी कर्म-फल प्राप्त नहीं होता | उसके सम्पूर्ण संशय-सन्देह मिट जाते हैं और वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है | यह कर्मयोग है |
* जो मनुष्य सात्त्विक ज्ञान, कर्म, बुद्धि, धृति और सुखको धारण करके कर्तृत्व-भोक्तृत्वसे रहित हो जाता है, वह अगर सम्पूर्ण प्राणियोंको मार दे, तो भी उसको पाप नहीं लगता |
अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर उसको पराभक्तिकी प्राप्ति हो जाती है और उससे वह परमात्म-तत्त्वको यथार्थ जानकर उसमें प्रविष्ट हो जाता है | यह ज्ञानयोग है |
* मनुष्य भगवान् का आश्रय लेकर सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मोंको सदा साङ्गोपाङ्ग करता हुआ भी भगवत्कृपासे अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है |
जो मनुष्य भगवान्के परायण होकर सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् के अर्पण करता है, वह भगवत्कृपासे सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंसे तर जाता है |
जो अपनेसहित शरीर-मन-इन्द्रियोंको भगवान् में ही लगा देता है, वह भगवान्को ही प्राप्त होता है | जो सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करके अनन्यभावसे केवल भगवान्के शरण हो जाता है,उसको भगवान् सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर देते हैं | यह भक्तियोग है |
नारायण! नारायण! नारायण! नारायण!
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{गीता प्रेस गोरखपुरसे प्रकाशित पुस्तक ‘’गीता दर्पण” से}
Sabhar