12/11/2025
किसान पिता के घर जन्मी जमुना उड़ीसा के रैरंगपुर कस्बे में पली-बढ़ी हैं। जमुना और उनके अन्य भाई-बहनों ने जंगलों के साये में ही अपना अधिकतर शुरुआती जीवन बिताया। इस दौरान वह किसानी में अपने पिता की भी मदद किया करती थीं।
शादी के बाद जमुना जब झारखंड आईं तो यहाँ पेड़ों की अवैध कटाई को देखकर व्यथित हो उठीं और इसे रोकने का फैसला लिया। इसी उद्देश्य से जमुना ने साल 2000 में एक मुहिम शुरू की और धीरे-धीरे उन्होंने अपने साथ जंगल बचाने की समान विचारधारा वाली अन्य महिलाओं को भी जोड़ना शुरू कर दिया।
2004 में उन्होंने अपने गाँव से बाहर निकलना शुरू किया और पंचायतों से लेकर दूसरे ब्लॉक आदि जाकर लोगों के बीच जंगलों की उपयोगिता को लेकर जागरूकता फैलाना शुरू कर दिया। जमुना के इन प्रयासों के चलते कई लकड़ी माफिया उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने लगे।
इसके चलते एक बार उनके घर में डकैती भी डलवाई गई। घर में घुसे उन डकैतों ने उनको और उनके परिवार को काफी डराया-धमकाया भी, लेकिन जमुना इन धमकियों से डरने वाली नहीं थीं।
इन सारी कठिनाइयों के बीच जमुना टुडू के साथ 10 हज़ार से अधिक महिलाओं की सेना तैयार हो गई। यह सेना अपनी सुरक्षा और जंगल काटने के उद्देश्य से घुसे घुसपैठियों को भगाने के लिए अपने हाथों में डंडे और तीर-कमान लेकर चलती हैं।
अपनी निडरता और हिम्मत से जमुना आज भी कई मुश्किलों को हराते हुए जंगलों को बचा रही हैं। जमुना टुडू को लोग आज झारखंड की लेडी टार्जन के नाम से जानते हैं।
जमुना टुडू को उनके इस सराहनीय काम के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द द्वारा पद्मश्री अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है। इससे पहले जमुना को साल 2013 में फिलिप्स बहादुरी अवार्ड से भी सम्मानित किया था। देश की हर बेटी अगर जमुना जैसी हो, तो उन्हें अपनी रक्षा के लिए किसी और ज़रूरत नहीं होगी!
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