23/08/2023
#पता_नही_मुझे_ऐसा_क्यो_लगता_है?
मैं बाड़मेर को 2002 से बेहतर जानता आ रहा हु।
एक बाड़मेर जिसमे तिलक बस स्टैंड,हॉस्पिटल ओर रेलवे स्टेशन के अलावा फेमस होने में शिव आइसक्रीम,लवली होटल की चाय,दल्लू जी की कचोरी और कुछ मिष्ठान भण्डार।
समय बदला और समय की आबोह हवा बदली,विकास ने रप्तार पकड़ी,तो ऐसी की रुकने का नाम ही नही ले रही है।
एक शांत और आपसी भाईचारे के भाव वाला बाड़मेर अब नजर नही आता है।
रिफाइनरी ने बाड़मेर को बहुत कुछ दिया,एक उच्च जीवनशैली का तरीका दिया,मशीनरी दी,और यंहा की भूमि में छिपे खनिज लवणों ने बहुत कुछ अवसर दिये।
बस हम लोगो मे ही कमी रही हम अवसरों को ताड़ नही पाए।
इसकी एक वजह ये भी है,कि चीजे बहुत जल्दी-जल्दी हुई और हम थार के वाशिन्दे बहुत सयंम ओर धैर्यवान ठहरे। हमे जो चीज पकड़नी थी,हम वो तो नही पकड़ पाये, लेकिन उसकी पुछड़ी पकड़ ली। और जिसने भी पूंछ पकड़ी उनकी लंका में लाय/आग ही लगी है।
हमे पेट्रोकेमिकल में ज्ञान लेना था,हम पेट्रोल बेचने में लग गए,हमे किलोवाट में बिजली बनाना सीखना था,हम गाड़ियों के किलोमीटर कैसे बढ़ाएं के जुगाड़ में लग गए।
धीरे-धीरे हम थार के शांत वाशिन्दे अब उग्र होने लगे,अब हमारे ऊंठ गाड़े की जगह गाटर लगी बोलोरो केम्पर,गेटवे ले रही थी, ऊँट को हाँकने के लिए पतली कोम्भ/छड़ी की जगह आगे डोसबोर्ड में पोलो चढ़ी डॉग/लाठी/लगियो ने जगह लेनी शुरू की।
जो केम्पर गाड़िया नागाणा,राजेश्वरी,लीलाणा की तरफ जाते-जाते कब चितौड़ की ओर मुड़ गई पता ही नही चला।
जंहा शादी विवाह में आमने-सामने के धड़े वाले तन-गिनायतो में फुंचिया देकर की जाने वाली मजाक,कब गैंगवार में बदल गई पता ही नही चला।
यानी सबकूछ कितना जल्दी बिता।
हरीश जाखड़,खरथाराम गोदारा, कमलेश प्रजापत ओर कुछ जीवते भी है,जिन्होंने जीते जी अपने परिजनों को कर्ज तले डुबो के मार दिया जैसे मामले सामने आने लगे।
नशे की तस्करी आजादी के पहले भी होती आई, लेकिन एक मर्यादिय तरीका था,तस्कर गले मे सोने की 10 तालो की चेन हाथ मे सारी अंगूठियों से अंगुलिया लबालब नही होती थी,मेले कुलचे कपडे में रहता था, ओर अफीम ओर डोडा लोग हाड़तोड़ मेहनत के बदले लेते थे, शौक से नशा नही था।
लेकिन अब तस्करों ने डेमो देने में ही अपना स्टेटस समझा।
मतलब साफ था,इस धंधे में किसी भी घर के पुरूष ही लिप्त थे, महिलाओं की इस दलदल से बहुत दूरी थी।
लेकिन समय कितना जल्दी बदला,इंटरनेट में जब एक GB महीना था तब भी बहुत होता था और आज अनलिमिटेड भी कम पड़ रहा है,ने सब मामला उल्टा-सुल्टा कर दिया।
विज्ञान की तकनीकी अपने साथ दो आंधी लेकर आती है,किसको किस आंधी के साथ जाना है,अवसर खुले प्रदान करती है।
हमारे बाड़मेर में 2018 आते आते इस आंधी ने पुरुषो के बजाय महिलाओं को अपनी ओर आकर्षित किया,जिसका नतीजा निकला,तलाक,प्रेम विवाह,भगा के ले जाना और आत्महत्याये।
एकदम से मोबाइल ने क्रांति कर दी।
KEYPED से एंड्रॉइड फोन की चमचमाती स्क्रीन पर फिसलती अंगुलियों ने जीवन को किस सागर के ओर फिसला दिया पता ही नही चला।
उस बाड़मेर के शांत अबोह हवा में होटल में ठहरना VVIP लोगो का काम माना जाता था,अब वहां देर रात रंगीन पार्टीयो का DJ पर आयोजन होने लगा,बुफर से DJ की धड़कती फ्लोर से दिल पता नही कैसे ही धड़कने लगे की किसी के काबू में नही आये।
युवा लड़कियों ने शहर की ओर पढ़ाई के मार्फ़त रुख किया लेकिन 2018-19आते-आते ये लड़कियां,क्लबो,पबो,OYO ओर फिर नाईट पार्टीयो में कैसे पहुची पता ही नही चला।
ओर समय क्या तेजी से चला,की इनको गाव से शहर आने वाले रास्ते ने चितौड़,मध्यप्रदेश बिहार हरियाणा की ओर चमचमाती गाड़ियों पर कभी पैरों में पायल की छम छम करने वाले पैरों ने एक्सीलेटर को दबा दिया था।
2020 कोरोना ने आपदा में अवसर दिया,ओर साथ मे ताल मिलाया टिक टोक ने।
आभासी दुनिया मे लाखो की वाहवाही ने वाकई पूरे थार मरुस्थल को बदल के रख दिया है।
शहर में बढ़ते सैलून,स्पा सेंटरों ने इस बात को ओर तेज हवा दी,दुनिया मे सबसे ज्यादा कुछ है तो वो है,ग्लेमर।
गली-गली में खुल रहे है बिना अनुमति के स्पा सेंटर,ओर इन सेंटर के बाहर के छपरी छोकरो के साथ सेलूनों ने बाड़मेर के युवाओं को ओर भटकाव की ओर रास्ता दिया।
लड़कियों ने ब्लैकमेल करके पैसे कमाने के लिए अपने जिस्म को हवस के हवाले करने में अब कोई संकोच नही रखा।
बड़े धनाढ्य सेठों से होती हुई ये सौदेबाजीया नोकरी पेशा लोगो की जेबो पर भी छुरी चला रही थी।
इंस्टाग्राम, फेसबुक और सोशल प्लेटफार्म पर अब ग्लेमर का ही चस्का था,2020 के पूरे साल घरों में घुसे लोगो मे कोरोना के ढील के बाद विपरीत जेंडर के प्रति बढ़ा आकर्षक देखने लायक था।
कोई खड्डा भरकर आ रहा है,फिर भी दूसरा इन खड़ड़ो में कूदे जा रहा था।
लड़कियों ने अपनी गैंग बना ली थी,साधु संतों से होते हुवे उधोगपतियो सहित सबको इस मायाजाल में उलझा दिया था।
पैसे कमाने के ओर शौक मौज पूरे करने के लिए 2021 में अनैतिक कार्यो में जबरदस्त इजाफा हुआ।
अफीम,डोडा जो गावो तंक था,अब उस धंधे ने शहरों में नए तरीके से अपने पैर पसारने शुरू किए।
टी-स्टाल।
ये एक नशे के अड्डे के रूप में नया ओर बेहतरीन तरीका इजाद किया गया।
शहर में गली-गली में अलग अलग ब्रेड के टी-स्टाल खुलने लगें।
इन टी-स्टालों के अंदर धुंआ-धौर सिगरेट,गंजा ओर MD जैसे नशे बड़े शानो शौकत से केबिन जैसी व्यवस्था के साथ बहुत ही माकूल ओर सुरक्षित स्थान के रूप में पाव पसारने लगा है।
आज भी शहर में अनेक टी-स्टाल खुल रहे है,क्या बाड़मेर में अचानक इतने लोग चाय पीने लग गए है,क्या इनके पास कोई FSSIL के लाइसेंस है,कुछ नही है।
दुकान में फर्नीचर करवाके किसी छुटमूईये नेता के 50-60फ्लॉवरो को बुलाकर के फीता काटा जाता है,ओर कुछ दिनों तक व्हाट्सएप्प स्टेट्यूस पर तली तपाने के साथ प्रचार की औपचारिकता पूरी होती है।
इन चाय की दुकानों और स्पा,सेलूनों के बारे में बाड़मेर जिला प्रशासन और पुलिस विभाग को गहन पड़ताल करनी ही चाहिए।
आधी आंधी यंही से ही रुक जाएगी।
इसकी साथ पढ़ाई का दूसरा पैटर्न बना लाइबेरिया!
बाड़मेर शहर में 100 में से 90 लाइब्रेरी तो मौत का घर है।
बिना किसी सेफ्टी नॉर्म्स को पूरा करती हुई बिना किसी फायर सिस्टम ओर भूकंप जैसी अनहोनी से बचने के कोई तौर तरीके नही है।
एक बंद कमरे में 2 AC ओर टेबल कुर्सी की व्यवस्था लायब्रेरी कहलाती है।
इस विषय मे बाड़मेर प्रशासन को एक्शन लेना ही चाहिए। भगवान न करे कभी अनहोनी हो,वरना लाशों के ठेर लग जायेंगे, आपने कोटा या लखनऊ या दिल्ली की घटनाओं से फिर कुछ नही सीखा है।
खूब सारे कोचिंग सेंटर एक खुले बाड़े में टिन शैडो के नीचे चल रहे है,किसी दिन क्षणिक बन्तुलियो ने भी तांडव कर दिया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।
ये लाइब्रेरीया पढ़ाई कम और इश्क घर ज्यादा साबित हो रहे है।
ये सब मैं पिछले 4 महीनों में शहर के 28 लाइब्रेरी ओर 6 कोचिंग सेन्टर में बैठने के बाद के अनुभव के आधार पर लिख रहा हु।
1000 लोगो के बेच में अगली 5 पंक्ति के बाद के इंसान केवल प्यार की हवाई जहाजों को उड़ाते है और गति देते है।
लाइब्रेरी सबसे सेफ ओर सुरक्षित नयन सुख का स्थान है।
कोचिंग के बाद पानी पताशी वाले फारूक को पता है,छगनी के पैसे भोमा देगा,ओर हरियो के पैसे लुणा देगा।
वर्तमान समय मे बाड़मेर जैसे शहर में कम से कम 15 राज्यो के दिहाड़ी मजदूर,जिसमे UP, बिहार,झारखंड, मध्यप्रदेश,दिल्ली,हरियाणा,पंजाब,बंगाली सोने के गहने ओर मराठी लोग रहते है।
बाड़मेर में किरायानामा ओर पुलिस वेरिफिकेशन के नाम पर शून्य आंकड़े है,जो बेहद ही चिंताजनक हालात है।
बड़े बड़े काम्प्लेक्स ओर सोसायटी में सैकड़ो परिवार रहते है,लेकिन किसी को किसी के बारे में कोई जानकारी नही है।
मकान मालिक मुह मागे मिल रहे किराये के आंधी में अंधे हो रहे है,बिना किसी पुलिस वेरिफिकेशन/किरायानामा के मकान किराये पर दे रहे है,जो आने वाले समय मे सामूहिक हत्याकांड, बड़ी लूट,डकेती जैसी घटनाओं के अवसर पैदा कर रही है।
वाकई बाड़मेर बदला है,हम चंद लोगो के सरकारी सेवाओं में चयन या चंद लोगो के व्यवसाय में सफल होने पर तो छाती जरूर कूट रहे है,लेकिन 90%यंग/युवा जनरेशन जो दोनो लिंग पुरुष और महिला को बर्बाद होते देख रहे है।
कोई राजस्थानी है तो कोई मारवाड़ी, कोई बाबा है,तो कोई तस्कर तो कोई भरवाड़ी।
इन सब से परे जाना और पार पाना छोटी लाइन के पास बड़ी लाइन खिंचने जितना मुश्किल कार्य है।
40-50 लाख में होते मामूली सौदों को देखकर लगता है, बाड़मेर में पैसा तो खूब है,बस कमाने के लिए जिस्म ही चाहिए।
कड़वा है,लेकिन वर्तमान में ये ही शास्वत सत्य है।