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28/06/2026
14/04/2026

मात्र पचास साल पीछे भी झांक लीजिए तो गांव के सबसे सम्पन्न लोगों के यहां भी फसल की उपज तीन चार महीने में समाप्त हो जाती थी। अगहन(नवंबर) में धान की फसल कटती तो मार्च आते आते कोठिला से धान साफ... चैत्र में गेहूं की फसल कितनी भी मजबूत हुई हो, सावन आते आते गेहूं खत्म... थोड़ा सा धान का चावल बचा कर रखा जाता ताकि रिश्तेदारों के आने पर अपनी सम्पन्नता दिखाई जाय। नए लड़के कंफ्यूज हो जाएंगे कि ऐसे कैसे? लोग कम थे और जमीन अधिक, फिर भी इतना अभाव क्यों? तो बाबू! तब उपज आज की तरह नहीं होती थी। आज तो कट्ठा में एक क्विंटल धान होता है, तब दस किलो भी हो जाय तो ईश्वर की कृपा मानी जाती थी। सिंचाई के साधन नहीं के बराबर, उर्वरक का चलन था ही नहीं, फसल कैसे होती?
तो भाई साहब! तब भोजन भी आज की तरह एकरस नहीं होता था। शाम के भोजन में किसी दिन गेहूं की रोटी, किसी दिन रागी( मडुआ) की, किसी दिन मक्के की, किसी दिन मल्टांगुन, किसी दिन जौ की... कभी साग के साथ, कभी दूध के साथ, कभी तो केवल चटनी या नमक के साथ...
आम लग जाय तो महीने दिन तक केवल आम का गाद, और उसके बाद महीने दिन तक अमावट... दाल तरकारी का चक्कर ही नहीं था। तरकारी अपने यहां उपजी हो तो ठीक, वरना जरूरत ही नहीं। खेत में मक्के की बाली लग जाय तो भुट्टा खा कर ही बेरा पार... अपने खेत में न हो तो चोरी से ही सही। दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं था साहब।
ऐसे ही गर्मियों में सत्तू के बल पर बेला कटती थी। मार्च अप्रैल में मक्का, चना, जौ, मटर की फसल पकती थी। इसी को भूज पीस कर सत्तू बनता और फिर अक्टूबर तक की चिंता खत्म।
सत्तू का सुख यह है कि उसके साथ सिवाय नमक के और कुछ नहीं चाहिए। पेड़ों पर आम के टिकोले आ ही गए हैं, तो चटनी बन ही जाएगी। एक हरी मिर्च और प्याज का जुगाड़ हो जाय तो परम आनंद, वरना पेट तो यूं भी भर ही जाएगा। तो भाई साहब, हजारों वर्षों से इस क्षेत्र की दरिद्र प्रजा का गर्मी की दोपहर में सत्तू ही आहार रहा है।
ये चार दिन के लड़के जो हजार साल के शोषण और सामंतवाद का रोना रोते हैं, वे हवा हवाई में ही उड़ रहे हैं। सच तो यह है कि गांव देहात में सबकी दशा लगभग ऐसी ही रही है। भोजन में एक साथ दाल भात तरकारी मिलना दैव योग होता था। और भाई साहब, सबसे बुरी दशा ब्राह्मण परिवारों की रही है। खैर...
तो भाई साहब। अब हम ऐसे लोग तो हैं नहीं जो फसल उपजी और गप्प से खा लिए। ईश्वर को धन्यवाद देंगे, थोड़ा सा देव को अर्पण करेंगे, तनिक उत्सव सा माहौल बनाएंगे, तब न खायेंगे जी!
तो चैत्र- बैसाख में, जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं, वह होता है सतुआन। सौर वर्ष का पहला दिन... घर में नया अन्न आ गया है और पेड़ों पर आम के खट्टे टिकोरों की भरमार है। चटनी के लिए मोरी के पास पुदीना भी उपजा हुआ है। तो आज पहले दिन थोड़ा सा सत्तू देव को अर्पित किया जाय और सत्तू खाना शुरू....
आज सतुआन है। हर साल आज ही होता है, चौदह अप्रैल को। तो पुरुखों की प्राचीन परम्परा को याद करते हुए सत्तू का भोग लगे... है कि नहीं?

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

Celebrated birthday party with gouri enterprises team.
10/04/2026

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