27/01/2026
UGC के आँकड़ों के अनुसार 2019-20 में 173 और 2023-24 में 378 असमानता/जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें दर्ज हुईं। इसी आधार पर कहा गया कि मामलों में लगभग 118% बढ़ोतरी हुई। यह सुनकर लगता है कि समस्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है।
अब दूसरा आंकड़ा देखिए।
AISHE के अनुसार भारत में उच्च शिक्षा में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या लगभग 4 करोड़ 33 लाख है। जब 378 शिकायतों को इस संख्या से तुलना करते हैं, तो प्रतिशत निकलता है लगभग 0.00087%। यानी हर 10 लाख छात्रों में करीब 9 शिकायतें। पाँच वर्षों की कुल शिकायतें मिलाकर भी संख्या लगभग 1000 के आसपास बैठती है।
क्या केवल इतने ही सीमित आँकड़ों के आधार पर किसी एक पूरे समाज या व्यवस्था को संदेह की नजर से देखना सही है? यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि भेदभाव गलत है और उसके खिलाफ नियम होने चाहिए। लेकिन क्या नियम बनाते समय यह ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए कि उनका प्रभाव करोड़ों निर्दोष छात्रों, शिक्षकों और संस्थानों पर भी पड़ेगा?
मुद्दा यह नहीं है कि आँकड़े कम हैं इसलिए नियम नहीं बनने चाहिए। मुद्दा यह है कि नियम संतुलित हों, न्यायपूर्ण हों, और ऐसे हों जिनसे समस्या पर प्रहार हो — न कि अनजाने में पूरे तंत्र पर सामान्य संदेह का माहौल बन जाए।
कई लोगों की चिंता यही है कि कहीं ऐसा न हो कि कुछ घटनाओं के आधार पर व्यापक व्यवस्था को कठोर निगरानी और प्रक्रियात्मक बोझ के दायरे में ले लिया जाए, जिससे सामान्य शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो।
यानी सवाल भेदभाव के विरोध का नहीं है, बल्कि नियमों के स्वरूप, संतुलन और संभावित प्रभाव का है — जिसे समझना और उस पर खुलकर चर्चा करना जरूरी है।
डिस्क्लेमर: यह प्रस्तुति सार्वजनिक आँकड़ों पर आधारित विचारात्मक चर्चा है। उद्देश्य किसी वर्ग या समुदाय को दोषी ठहराना नहीं है।