11/06/2023
सम्राट परमानंद चंद्र कटोच (पोरस)
सम्राट परमानंद चंद्र कटोच, त्रिगर्त साम्रज्य के शक्तिशाली और कटोच राजवंश के 280 सम्राट थे। इन्होने ग्रीक सम्राट सिकंदर के साथ 326 ई.पु. को झेलम नदी के किनारे भीषण युद्ध किया था। आज हम आपको कटोच कुलभूषण सम्राट परमानन्द चंद्र के इतिहास से अवगत करवाएंगे।
त्रिगर्त साम्रज्य तीसरी ईसापूर्व में उत्तर भारत का एक शक्तिशाली साम्रज्य था, जिसमे वर्तमान हिमाचल, पंजाब, मुल्तान और हरियाणा के कुछ भाग शामिल थे। इस पर कटोच राजवंश का शासन था जिसके सम्राट थे परमानंद चंद्र कटोच।
उस समय भारत कई राज्यों में बंटा था, जिसमे प्रमुख था नन्द साम्राज्य जिस पर धनानंद का शासन था। उत्तरपश्चिमी भारत में तक्षिला और त्रिगर्त साम्रज्य प्रमुख थे। इस काल में मैसेडोनिया का राजा सिकंदर पारसी साम्राज्य के राजा डारियस को हरा कर भारत की तरफ कूच कर रहा था। उसने आपने मार्ग में आने वाले सभी राजाओं को जीत लिए था और जो भी उसका विरोध करता, सिकंदर उसे मौत के घाट उतार देता।
भारत में सिकंदर का सबसे पहले सामना तक्षिला के राजा अम्भी से हुआ, जिसने सिकंदर के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद सिकंदर ने वर्तमान कश्मीर के राजा अभिसार पर हमला करके उसे युद्ध में हराया। अब बारी त्रिगर्त राज्य की थी। सम्राट परमानंद चंद्र कटोच ने सिकंदर के आगे झुकने से मन कर दिया और उसकी विशालकाय सेना से युद्ध में संग्राम करने का निश्चय किया।
सम्राट परमानंद चंद्र कटोच और सिकंदर की सेनाओं का सामना झेलम नदी के किनारे पर हुआ। परमानंद चंद्र कटोच का नेतृत्व उनके दो पुत्र कर रहे थे। राजा अम्भी की सेना सिकंदर के साथ थी। युद्ध वर्षाऋतु के दौरान हुआ, झेलम नदी उफान पर थी, जिससे ग्रीक घुड़सवार सम्राट परमानंद की हाथियों को टक्कर नहीं दे सकते थे। सिकंदर ने तब नदी को घूम कर पार किया और दक्षिण से परमानंद चंद्र की सेना पर हमला किया जिसमें उनके बड़े पुत्र वीरगति को प्राप्त हो गए।
इसके बाद सिकंदर के सेना और कटोच राजपूतों में भीषण संग्राम हुआ जिसमें सिकंदर की सेना संख्या में अत्यधिक होने के कारण अंततः युद्ध में विजयी हुई।इस युद्ध में सम्राट परमानंद चंद्र कटोच को नौ घाव लगे और उन्होंने बहुत वीरता से युद्ध किया जिससे प्रभावित को कर सिकंदर ने राजा परमानन्द चंद्र कटोच सिंधु और ब्यास नदी के बीच के सेतरप का शासक घोषित किया, जो की पर्वतीय क्षेत्र था।
सिकंदर ने परमानंद चंद्र कटोच को फेगस की उपाधि दी जिसका अर्थ है पर्वतीय शेर, जो कालांतर में पोरस हो गयी और आज पुरे विश्व में सम्राट परमानंद चंद्र कटोच, पोरस के नाम से विख्यात हैं।
सम्राट परमानंद चंद्र कटोच के वीरता का उल्लेख ग्रीक सेनानायक और इतिहासकार टॉलेमी ने अपने लेखों में किया है। डिओडोरस, सिकंदर के सेनानायक ने लिखा है की परमानंद चंद्र के हाथियों ने ग्रीक सिपाहों को कुचल कर उनकी हड्डियों का चूरमा बना दिया। कयनेस ने इस युद्ध में दिखाई गई वीरता से आक्रांत हो कर सिकंदर हो वापस ग्रीस लौटने की सलाह दी।
इसके पश्चात सिकंदर ब्यास नदी के तट तक बढ़ा और उसने 12 स्तम्भों का निर्माण करवाया, जो आज लुप्त हो चुके हैं, पर जीक्ने अवशेष आज भी मौजूद हैं। हिमाचल प्रदेश के इंदोरा से सिकंदर भारत से वापस मुड़ा था. उस स्थान पर आज भी महादेव का मंदिर हैं। काँगड़ा के आज भी ग्रीक सिपाहियों की कब्रे मौजूद हैं और उनसे जुडी पुरातात्विक वस्तुएं वर्तमान में भी मिलती रहती हैं।
यह इतिहास ग्रीक और अँगरेज़ इतिहासकारों द्वारा वर्णित हैं। भारतीय इतिहासकार यह मानते हैं कि राजा परमानंद चंद्र कटोच ने युद्ध में सिकंदर को हराया और भारत से खदेड़ा था, जिसपर वे कई तथ्य और तर्क प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि कई इतिहासकार, ग्रीक इतिहास से सहमति रखते हैं।
सिकंदर की मृत्यु 28 जून 323 ई.पु. को बेबीलोन में हुई और उसकी मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य उसके सेनानायकों ने आपस में बाँट लिया। सम्राट परमानन्द चंद्र कटोच का शासनक्षेत्र कालांतर में चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा बनाये गए अखंड भारत का हिस्सा बन गया।
कटोच राजवंश, त्रिगर्त पर राज करने वाला क्षत्रिय राजवंश है जो राजा सुशर्मा चंद्र, राजा परमानंद चंद्र से लेकर आज तक चला आ रहा है। कटोच राजा तब से लेकर मध्यकालीन युग के आक्रांतों जैसे महमूद गज़नी, तैमूर, मुहम्मद बिन तुग़लक़, दिल्ली के सुल्तानों और मुगलों से लोहा लेते रहे। कटोच कुलमाता माँ अम्बिका की कृपा से यह राजवंश अभी भी चला रहा है और वर्तमान में राजा ऐश्वर्य चंद्र कटोच, कटोच राजवंश के 489 महाराजा हैं।