History of Himachal

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This page is about the unknown thrilling facts of ancient town Chamba that would give you goosebumps...

Sharma Brothers of Kangra Valley (Himachal Pradesh)Sh. Amarnath Sharma was an Army Officer hailing from Kangra Valley ha...
10/08/2023

Sharma Brothers of Kangra Valley (Himachal Pradesh)

Sh. Amarnath Sharma was an Army Officer hailing from Kangra Valley having 2 sons Somnath Sharma & Vishwanath Sharma, who later achieved great heights in their respective military career.

Major Somnath Sharma served Indian Army in various campaigns throughout his military career. During Kashmir Operations, 1948, he died for India and received India's 1st Paramveer Chakra which is the highest gallantry award in India.

Following the footsteps of his elder brother, General Vishwanath Sharma also did commendable job in Indian Army and later rose to the position of Army Chief of India. He became 14th Chief of Army Staff of India. General Vishwanath Sharma was 1st Army Chief to begin career in post-independence India Army. For his services, he was also honored with PVSM (Param Vishishta Seva Medal).

Kangra Valley of Himachal Pradesh is also called Veer-Bhumi owing to the past history of producing great military leaders. Youngsters of Kangra Valley still hold Army as their 1st career preference. Many of them have done great service for India and continue to do so.

Bandralta-Ramnagar Princely State, Jammu & Kashmirक्या आप जानते हैं? बन्द्राल्टा रियासत जम्मू और कश्मीर की प्रसिद्ध रिया...
08/08/2023

Bandralta-Ramnagar Princely State, Jammu & Kashmir

क्या आप जानते हैं?

बन्द्राल्टा रियासत जम्मू और कश्मीर की प्रसिद्ध रियासतों में से एक थी। इसकी स्थापना चम्बा राज्य के 24वें राजा विचित्र वर्मन के छोटे भाई बहत्तर देव वर्मन ने 1020 AD में की। बन्द्राल्टा रियासत, वर्मन राजवंश द्वारा स्थापित दूसरी रियासत थी। यह वर्तमान में रामनगर शहर के नाम से विख्यात है और उधमपुर से 38 किलोमीटर की दुरी पर है।

राजा बहत्तर ने वर्मन उपाधि के स्थान पर बंद्राल उपाधि को धारण किया। बंद्राल राजवंश वर्मन राजवंश से निकला पहला राजवंश था। बन्द्राल्टा रियासत पर बंद्राल राजवंश के कई राजाओं ने शासन किया। राजा भुपेन्द्रदेव बंदराल बन्द्राल्टा रियासत के अंतिम राजा थे।

पंजाब के महाराजा रंजीत सिंह ने बन्द्राल्टा पर कब्ज़ा कर बंद्राल राजा को निष्काषित करके महाराजा गुलाब सिंह के छोटे भाई राजा सुचेत सिंह जम्वाल को बन्द्राल्टा राज्य का मुखिया नियुक्त किया। कालांतर में राजा सुचेत सिंह के वंशजो ने बन्द्राल्टा का नाम बदल कर रामनगर रख दिया।

वर्तमान में चम्बा के वर्मन राजवंश से निकले बंद्राल वंश के लोग जम्मू, रामनगर और उधमपुर में फैले हुए हैं।

चम्बा का विश्वप्रसिद्ध मिंजर मेला, चौगान में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। यह मेला प्रत्येक चम्बावासी के दिल में महत्वपूर्...
25/07/2023

चम्बा का विश्वप्रसिद्ध मिंजर मेला, चौगान में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। यह मेला प्रत्येक चम्बावासी के दिल में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और मिंजर के दौरान चम्बा में आनंद की लहर दौड़ जाती है। प्रत्येक व्यक्ति इस मेले का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।

मिंजर मेले की शुरुआत आज से लगभग 1000 वर्ष पहले, राजा साहिल वर्मन के शासनकाल में हुई थी। कहते हैं, राजा साहिल वर्मन ने त्रिगर्त (काँगड़ा) के राजा को युद्ध में परास्त किया था। इस उपलक्ष्य पर उन्होंने मेले का आयोजन किया था, जो तदनन्तर प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा और इस तरह मिंजर की शुरुआत हुई।

राजा साहिल वर्मन की मृत्यु के लगभग 500 साल बाद राजा प्रताप सिंह वर्मन, चम्बा के राजा बने। कहते हैं जब चम्बा के राजा प्रताप सिंह वर्मन, युद्ध अभियान में सफल होकर चम्बा लौटे, तब चम्बा के लोगों ने उनका धूम-धाम से स्वागत किया और उपहार में मक्की दी, चूँकि उस समय मक्की की फसल तैयार थी। मक्की के बालों के गुच्छे को भी मिंजर कहा जाता है। इससे मेले का मिंजर नामकरण हुआ।

राजा पृथ्वी सिंह वर्मन, राजा प्रताप सिंह वर्मन के परपोते थे। उन्होंने अपने शासनकाल में दिल्ली के बादशाह शाहजहाँ द्वारा आयोजित तीरंदाजी की प्रतियोगिता में भारत के सभी राजाओं को हराया और प्रतियोगिता जीत ली। उन्होंने शाहजहां से भेंटस्वरूप भगवन रघुनाथ की प्रतिमा ली।

राजा पृथ्वी सिंह को दिल्ली के ज़री गोटे के एक मुस्लिम कारीगर का काम बहुत पसंद आया और वह उसे भी आपने साथ चम्बा के आये। उसके द्वारा बनाई गयी मिंजर को सर्वप्रथम भगवान् लक्ष्मीनाथ को अर्पित किया गया। तब से लेकर आजतक भगवान लक्ष्मीनाथ को सर्वप्रथम उसी मिर्ज़ा परिवार को मिंजर अर्पित की जाती है। यह चम्बा के सांप्रदायिक सद्भावना और सहिष्णुता का जीता-जगाता उदाहरण है।

प्राचीन समय के इस मेले के दौरान वरुण देव की पूजा की जाती थी और उनसे अच्छी बारिश की कामना की जाती थी। चम्बा के राजा हाथी पर चढ़ कर इस मेले में हिस्सा लिया करते थे। मिंजर के अंतिम दिन में मिंजर को रावी नदी में प्रवाहित किया जाता था और एक भैंसे की बलि भी दी जाती थी। राजशाही की खत्म होने के बाद, अब मिंजर को प्रवाहित, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री करते हैं।

मिंजर मेला, हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत उदाहरण है। यह मेला सभी लोगों के दिलों में महत्वपूर्ण स्थान रखा है। हर चम्बावासी इस मेले के लिए लालायित रहते हैं। एक हफ्ते की हर शाम को देश के मुख्य कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं और स्थानीय लोग बढ़-चढ़ कर इसमें भाग लेते हैं। आप सभी को मिंजर मेले की हार्दिक शुभकामनाएं।

13/07/2023

आजकल मंडी का भगवान शिव को समर्पित पंचवक्त्र मंदिर चारों और चर्चा का विषय बना हुआ है। भारी वर्षा से जनित भीषण बाढ़ में सैंकड़ों साल पुराना यह मंदिर अडिग खड़ा रहा। जहाँ सीमेंट, बजरी आदि से बानी इमारते नष्ट हो गयीं, वहीं इतना पानी इस मंदिर को हिला भी नहीं पाया।

स्थानीय लोगों की इस मंदिर के प्रति बहुत आस्था है और पंचवक्त्र महादेव की कृपा ही है, जो इस मंदिर को लाखों क्यूबिक पानी भी टस से मस नहीं कर पाया।

इस मंदिर का निर्माण राजा चैत्र सेन ने सोलहवीं शताब्दी में करवाया। इसके निर्माण के लगभग सौ वर्ष बाद मंडी के राजा सिद्ध सेन ने इसका जीर्णोद्धार कराया। मंडी और सुकेत के सेन राजाओं और मंडी की स्थानीय जनता की इस मंदिर के प्रति बहुत आस्था है। मंडी के राजाओं का अंतिम संस्कार पूर्वकाल से लेकर आजतक इस मंदिर के गर्भगृह के सामने होता है।

चाहे उत्तराखंड का केदारनाथ हो या मंडी का पंचवक्त्र मंदिर. हर बार आस्था, विज्ञान पर भारी पड़ी है। इसलिए उत्तराखंड और हिमाचल को देवभूमि कहा जाता है।

Saint Andrew's Church, Chambaचम्बा शहर में स्थापित यह चर्च, चम्बा के विभिन्न भव्य और ऐतिहासिक संरचनाओं में से एक है। इसक...
10/07/2023

Saint Andrew's Church, Chamba

चम्बा शहर में स्थापित यह चर्च, चम्बा के विभिन्न भव्य और ऐतिहासिक संरचनाओं में से एक है। इसके निर्माण के पीछे का इतिहास डॉक्टर जॉन हचिसन से शुरू होता है। डॉ. जॉन हचिसन एक चिकित्सक और मिशनरी थे, जो बीसवीं सदी के अंतिम दशक के दौरान चम्बा आये।

उस काल में कोढ़ का रोग उत्तर और मध्य भारत में फैला था। डॉ. जॉन हचिसन, कोढ़ के रोग के विशेषज्ञ थे, जिनको चम्बा में कोढ़ के रोग से ग्रसित मरीज़ों का इलाज करने के लिए बुलाया गया था। इन्होनें उत्कृष्ट सेवाएं दी और चम्बा के राजा की मदद से सरोल के में लेप्रोसी हॉस्पिटल की शुरुआत की जो भारत के नवीनतम कोढ़ अस्पतालों में से एक था।

डॉ. हचिसन, डॉक्टर होने के साथ-साथ एक मिशनरी भी थे. इनके प्रभाव में आकर, कई लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया। डॉ. हचिसन का चम्बा की एक चर्च खोलने का सपना था। लेकिन सत्ता और धन के अभाव में वे ऐसा नहीं कर सकते थे। डॉ. हचिसन से पहले विलियम फर्गुसन भी चम्बा में चर्च निर्माण की इच्छा व्यक्त कर चुके थे।

उनके इस सपने को पूरा किया चम्बा के राजा शाम सिंह वर्मन ने। राजा शाम सिंह वर्मन ने चर्च के लिए भूमि दान की और चर्च निर्माण का सारा खर्चा राजकीय कोष से दिया। राजमिस्त्री गोपाल दास ने राजा शाम सिंह के आदेशानुसार चर्च का निर्माण किया। इसकी आधारशिला 17 फरवरी 1899 को रखी गयी को डॉ. क्लीमेंट की उपस्थिति में रखी गयी, जोकि स्कॉटलैंड से इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आये थे।

यह चर्च 7 मई 1905 को बन कर तैयार हुई और तत्कालीन शासक राजा भूरी सिंह वर्मन ने इस चर्च को चम्बा के ईसाई समुदाय को भेंट किया। इस चर्च को चर्च ऑफ़ स्कॉटलैंड भी कहा जाता है और यह चर्च चम्बा के समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतों के प्रतीकों में से एक है। यह चम्बा के शासकों और लोगों की धार्मिक सहिष्णुता और सद्भावना का जीता-जागता उदाहरण है।

Extremely rare photo of last Rajah of Chamba, Raja Lakshman Singh Varman at his Residential Palace, Chamba House at Laho...
30/06/2023

Extremely rare photo of last Rajah of Chamba, Raja Lakshman Singh Varman at his Residential Palace, Chamba House at Lahore during his childhood.

वज़ीर राम सिंह पठानियावज़ीर राम सिंह पठानिया, हिमाचल प्रदेश के प्रथम स्वतंत्र सैनानी थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्...
26/06/2023

वज़ीर राम सिंह पठानिया

वज़ीर राम सिंह पठानिया, हिमाचल प्रदेश के प्रथम स्वतंत्र सैनानी थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध शस्त्र उठाये थे और ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया था।

इनका जन्म नूरपुर में शाम सिंह पठानिया के घर में हुआ जो नूरपुर-पठानकोट के राजा, राजा बीर सिंह पठानिया के वज़ीर थे। जिस समय राम सिंह पठानिया, नूरपुर-पठानकोट राज्य के वज़ीर बने, उस समय अँगरेज़ मध्य भारत को जीतते हुए उत्तर की तरफ बढ़ रहे थे। अंग्रेज़ों ने 1845 में सिखों को युद्ध में हरा दिया और पंजाब को अपने अधीन कर लिए। अब अंग्रेज़ों का मंसूबा पहाड़ी रियासतों पर कब्ज़ा करना था।

उस समय, नूरपुर-पठानकोट के राजा जसवंत सिंह पठानिया, अभी बालक थे। इसका फायदा उठा कर अंग्रेज़ों ने नूरपुर को अंग्रेज़ों के अधीन घोषित कर दिया। यह बात वज़ीर राम सिंह पठानिया को बिलकुल भी रास न आयी और उन्होंने अंग्रेज़ों को विरुद्ध विद्रोह और युद्ध करने का निश्चय किया।

राम सिंह पठानिया ने 18 अगस्त 1848 को अपने कुछ सैनिकों के साथ मिल कर शाहपुर किले पर हमला किया। यह हमला इतना भयंकर था कि इसमें अधितकर यूरोपियन सैनिक मारे गए और जो बच गए वो भाग गए। इससे अँगरेज़ अफसर बौखला गए और सर हेनरी लॉरेंस ने भारी मात्रा में सेना और गोला-बारूद लेकर शाहपुर किले को घेर लिया। हथियारों की कमी होने के कारण राम सिंह पठानिया ने किले से पलायन किया और उन्होंने मऊ के जंगलों में छुप कर अंग्रेज़ों से गुरिल्ला युद्ध किया।

राम सिंह पठानिया ने इस दौरान अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाया और उन्होंने जसरोटिया और मिन्हास राजपूत सैनकों को अपने साथ मिला लिया और डल्ले कि धार पर सैन्य अड्डा लगाया। इस बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रोबर्ट पील का भतीजा जॉन पील भारी सेना सहित डल्ले कि धार पर पहुंचा। राम सिंह पठानिया और जॉन पील कि सेनाओ के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमे राम सिंह पठानिया ने जॉन पील को अपने तलवार 'चंडी' से मार दिया और युद्ध जीत लिया।

इसके कुछ समय बाद अंग्रेज़ों ने राम सिंह पठानिया को छल से मरने कि साजिश रची और उनके मित्र पहाड़ चंद को पैसे का लालच दिया। पहाड़ चंद ने राम सिंह कि जानकारी अंग्रेज़ों को दे दी। राम सिंह ब्रम्हा मुहूर्त में उठ कर नदी-किनारे जा कर पूजा-पाठ करते थे। जैसे कि वे पूजा पाठ करके लौटे, तब लगभग 20 से 25 अंग्रेज़ों ने उन पर हमला कर दिया। राम सिंह पठानिया ने पूजा के कमंडल के वार से 4 अंग्रेज़ों को मार दिया पर दुर्भाग्यवश उन्हें बंदी बना लिया. बंदी बनाने के पश्चात् उन्हें कालापानी कि सजा हुई और 11 नवंबर 1849 को महज़ 24 वर्ष का भारत माता का यह वीर सपूत देश के लिए वीर गति को प्राप्त हो गया।

कहा जाता है कि वज़ीर राम सिंह पठानिया निडर, साहसी और योद्धा होने के अलावा शक्ति-भक्त भी थे। उनकी तलवार का नाम चंडी था जिसका वज़न बयालीस सेर था। वे अपने जीवनकाल में दुश्मनो से वीरों की भांति अकेले ही लड़ते रहे।अपने जीवन के अंतिम वर्ष में भी कई दुश्मनो से घिर जाने के बावजूद भी लड़े और महज कमंडल से ही चार दुश्मनो को मौत के घाट उतार दिया।

वज़ीर राम सिंह पठानिया के अदम्य शौर्य के बारे में आज भी कहावत है - "अकेला पठानिया खूब लड़ैया, बल्ले पठानिया खूब लड़ैया, डल्ले दियां धारां डफली को बजदी, वह पठानिया खूब लड़ैया"

15/06/2023

Chandrasekhar Temple, Saho, Chamba

Chandrasekhar Temple is situated in Saho area of Chamba. Saho is a fertile plateau located a few kilometers away from Chamba Town. Its scenic beauty attracts the visitors. It was ruled by Ranas before the foundation of Chamba town by Raja Sahil Varman of Chamba. Later, Saho was administered by Rajah of Chamba with help of feudal Lords who belonged to Bijalwan branch of Varman dynasty.

Chandrasekhar Temple is very old and the origin of Shivlinga has been ascribed to mythological story of Ghumbhar Rishi during Pauranic Times. However, the temple was constructed by Satyaki Rana, on request of his wife Somprabha. Later, this temple was renovated and enlarged by Varman Rulers of Chamba.

Here is a short clip on Chandrashekhar Temple and is a part of an old documentary made by DD on majestic temples of Chamba.

सम्राट परमानंद चंद्र कटोच (पोरस)सम्राट परमानंद चंद्र कटोच, त्रिगर्त साम्रज्य के शक्तिशाली और कटोच राजवंश के 280 सम्राट थ...
11/06/2023

सम्राट परमानंद चंद्र कटोच (पोरस)

सम्राट परमानंद चंद्र कटोच, त्रिगर्त साम्रज्य के शक्तिशाली और कटोच राजवंश के 280 सम्राट थे। इन्होने ग्रीक सम्राट सिकंदर के साथ 326 ई.पु. को झेलम नदी के किनारे भीषण युद्ध किया था। आज हम आपको कटोच कुलभूषण सम्राट परमानन्द चंद्र के इतिहास से अवगत करवाएंगे।

त्रिगर्त साम्रज्य तीसरी ईसापूर्व में उत्तर भारत का एक शक्तिशाली साम्रज्य था, जिसमे वर्तमान हिमाचल, पंजाब, मुल्तान और हरियाणा के कुछ भाग शामिल थे। इस पर कटोच राजवंश का शासन था जिसके सम्राट थे परमानंद चंद्र कटोच।
उस समय भारत कई राज्यों में बंटा था, जिसमे प्रमुख था नन्द साम्राज्य जिस पर धनानंद का शासन था। उत्तरपश्चिमी भारत में तक्षिला और त्रिगर्त साम्रज्य प्रमुख थे। इस काल में मैसेडोनिया का राजा सिकंदर पारसी साम्राज्य के राजा डारियस को हरा कर भारत की तरफ कूच कर रहा था। उसने आपने मार्ग में आने वाले सभी राजाओं को जीत लिए था और जो भी उसका विरोध करता, सिकंदर उसे मौत के घाट उतार देता।

भारत में सिकंदर का सबसे पहले सामना तक्षिला के राजा अम्भी से हुआ, जिसने सिकंदर के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद सिकंदर ने वर्तमान कश्मीर के राजा अभिसार पर हमला करके उसे युद्ध में हराया। अब बारी त्रिगर्त राज्य की थी। सम्राट परमानंद चंद्र कटोच ने सिकंदर के आगे झुकने से मन कर दिया और उसकी विशालकाय सेना से युद्ध में संग्राम करने का निश्चय किया।

सम्राट परमानंद चंद्र कटोच और सिकंदर की सेनाओं का सामना झेलम नदी के किनारे पर हुआ। परमानंद चंद्र कटोच का नेतृत्व उनके दो पुत्र कर रहे थे। राजा अम्भी की सेना सिकंदर के साथ थी। युद्ध वर्षाऋतु के दौरान हुआ, झेलम नदी उफान पर थी, जिससे ग्रीक घुड़सवार सम्राट परमानंद की हाथियों को टक्कर नहीं दे सकते थे। सिकंदर ने तब नदी को घूम कर पार किया और दक्षिण से परमानंद चंद्र की सेना पर हमला किया जिसमें उनके बड़े पुत्र वीरगति को प्राप्त हो गए।

इसके बाद सिकंदर के सेना और कटोच राजपूतों में भीषण संग्राम हुआ जिसमें सिकंदर की सेना संख्या में अत्यधिक होने के कारण अंततः युद्ध में विजयी हुई।इस युद्ध में सम्राट परमानंद चंद्र कटोच को नौ घाव लगे और उन्होंने बहुत वीरता से युद्ध किया जिससे प्रभावित को कर सिकंदर ने राजा परमानन्द चंद्र कटोच सिंधु और ब्यास नदी के बीच के सेतरप का शासक घोषित किया, जो की पर्वतीय क्षेत्र था।

सिकंदर ने परमानंद चंद्र कटोच को फेगस की उपाधि दी जिसका अर्थ है पर्वतीय शेर, जो कालांतर में पोरस हो गयी और आज पुरे विश्व में सम्राट परमानंद चंद्र कटोच, पोरस के नाम से विख्यात हैं।

सम्राट परमानंद चंद्र कटोच के वीरता का उल्लेख ग्रीक सेनानायक और इतिहासकार टॉलेमी ने अपने लेखों में किया है। डिओडोरस, सिकंदर के सेनानायक ने लिखा है की परमानंद चंद्र के हाथियों ने ग्रीक सिपाहों को कुचल कर उनकी हड्डियों का चूरमा बना दिया। कयनेस ने इस युद्ध में दिखाई गई वीरता से आक्रांत हो कर सिकंदर हो वापस ग्रीस लौटने की सलाह दी।

इसके पश्चात सिकंदर ब्यास नदी के तट तक बढ़ा और उसने 12 स्तम्भों का निर्माण करवाया, जो आज लुप्त हो चुके हैं, पर जीक्ने अवशेष आज भी मौजूद हैं। हिमाचल प्रदेश के इंदोरा से सिकंदर भारत से वापस मुड़ा था. उस स्थान पर आज भी महादेव का मंदिर हैं। काँगड़ा के आज भी ग्रीक सिपाहियों की कब्रे मौजूद हैं और उनसे जुडी पुरातात्विक वस्तुएं वर्तमान में भी मिलती रहती हैं।

यह इतिहास ग्रीक और अँगरेज़ इतिहासकारों द्वारा वर्णित हैं। भारतीय इतिहासकार यह मानते हैं कि राजा परमानंद चंद्र कटोच ने युद्ध में सिकंदर को हराया और भारत से खदेड़ा था, जिसपर वे कई तथ्य और तर्क प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि कई इतिहासकार, ग्रीक इतिहास से सहमति रखते हैं।

सिकंदर की मृत्यु 28 जून 323 ई.पु. को बेबीलोन में हुई और उसकी मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य उसके सेनानायकों ने आपस में बाँट लिया। सम्राट परमानन्द चंद्र कटोच का शासनक्षेत्र कालांतर में चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा बनाये गए अखंड भारत का हिस्सा बन गया।

कटोच राजवंश, त्रिगर्त पर राज करने वाला क्षत्रिय राजवंश है जो राजा सुशर्मा चंद्र, राजा परमानंद चंद्र से लेकर आज तक चला आ रहा है। कटोच राजा तब से लेकर मध्यकालीन युग के आक्रांतों जैसे महमूद गज़नी, तैमूर, मुहम्मद बिन तुग़लक़, दिल्ली के सुल्तानों और मुगलों से लोहा लेते रहे। कटोच कुलमाता माँ अम्बिका की कृपा से यह राजवंश अभी भी चला रहा है और वर्तमान में राजा ऐश्वर्य चंद्र कटोच, कटोच राजवंश के 489 महाराजा हैं।

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