22/03/2026
बाबा ___ ईद कब होगी
ख़्वाजा गुलाम फ़रीद सरकार से मंसूब एक मस्त (मजज़ूब) का क़िस्सा है कि ईद वाले दिन सारे लोग ईद पढ़कर वापस आ रहे थे।
उनमें बूढ़े, बच्चे—सभी थे। जब वह लोग उस मजज़ूब के क़रीब से गुज़रे, तो वह मजज़ूब उनमें से हर एक से पूछता:
“ओ काका, ईद कदाँ?”
(यानी अरे भाई, ईद कब है?)
वह सारे लोग उस मजज़ूब पर हँसते और कहते:
“ओ साहिब, तुझे नहीं पता? ईद तो आज है।”
इतने में सरकार ख़्वाजा गुलाम फ़रीद, मठनकोट वाले, उस जगह से गुज़रने लगे।
तो वह मजज़ूब उनके क़दमों से लिपट गया और तरसती आँखों से सरकार से सवाल किया:
“हज़ूर! ईद कदाँ?”
(यानी सरकार, ईद कब होगी?)
अब साहिब-ए-हाल, मर्द-ए-आरिफ़ ने बाकी लोगों की तरह यह नहीं कहा कि ईद तो आज है और हम अभी-अभी पढ़कर आए हैं,
बल्कि उन्होंने उस मजज़ूब को प्यार भरी नज़र से देखा और कहा:
“यार मिले जदाँ”
(यानी जब महबूब से विसाल होगा, वही दिन ईद का दिन होगा)
ये अल्फ़ाज़ सुनते ही मजज़ूब की आँखों से मोतियों की तरह आँसू बहने लगे।
वह और भी तरसती निगाहों से बोला:
“हज़ूर, यार मिले कदाँ?”
(सरकार, ये विसाल कब होगा?)
ख़्वाजा गुलाम फ़रीद सरकार ने फ़रमाया:
“इयोँ ‘मैं’ मरे जदाँ”
(यानी ‘मैं’—दुई, ग़ैरियत—के ख़त्म होने पर यार का विसाल होता है)
बस ये कलाम फ़रमाना था कि मजज़ूब ने काँपते और थरथराते होंठों से रोते हुए अर्ज़ किया:
“हज़ूर, इयोँ ‘मैं’ मरे कदाँ?”
(यानी सरकार, इस ‘मैं’ के वहम से कब निजात मिलेगी?)
सरकार फिर मुस्कुराए, उसे प्यार से थपकी दी और यह कहकर आगे बढ़ गए:
“यार चाहे जदाँ”
(जब महबूब चाहेगा, तुझे तेरी ‘मैं’ से निजात दे देगा—दिल मज़बूत रखो)
“जब तेरी दीद होगी, तभी मेरी ईद होगी।”
ईद मुबारक वही कह सकता है—बिल-एतिबार-ए-हक़—जो इस ईद की हक़ीक़त से आशना हो,
वरना सिर्फ़ ज़बानी, रिवायती मुबारकबादियों से क्या हासिल…?