Dandak Tribe's Home Stay ,Bastar Art And Tourism Group

Dandak Tribe's Home Stay ,Bastar Art And Tourism Group Dantewada Kumharrash
Tribe's Home Stay Art Culture, Nature, Tribes life Style and Tourism. We provide bed n food, Tour guide, Transport etc for tourism

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02/01/2026

Maa danteswari ki Dharti.

18/10/2025

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16/10/2025

जय मां दंतेश्वरी मां मानिकेश्वरी, दंतेवाड़ा, छत्तीसगढ़

Dantewada MAA DANTESWARI HOMESTAY now open for all tourist.Location:- Danteswari TempleDantewada Tourism and Entrepreneu...
06/10/2025

Dantewada MAA DANTESWARI HOMESTAY now open for all tourist.
Location:- Danteswari Temple
Dantewada Tourism and Entrepreneurship
Dantewada District, Chhattisgarh
Dantewada City
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06/10/2025

जय मां दंतेश्वरी
28/09/2025

जय मां दंतेश्वरी

मावली ही दंतेश्वरी माई है।

दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी इन दो नदियों का संगम है। यह संगम सिर्फ दो नदियों का ही नहीं, वरन् बस्तर के इतिहास, लोक विश्वास, संस्कृति और परम्पराओं का संगम है। इस संगम पर सदियों से स्थापित है मां दंतेश्वरी का देवालय। देवी दंतेश्वरी माई का यह मंदिर, बस्तर के साथ साथ छत्तीसगढ़ और देश दुनिया के लाखों जन सामान्य के आस्था का मुख्य केंद्र है। देवी दंतेश्वरी का यह धाम ऐसा प्रकाश पुंज है जिसने बस्तर के अतीत के अंधकार को मिटाया है, वर्तमान को आस्था की रोशनी से आलोकित किया है और भविष्य की राह को प्रकाशवान किया है। बस्तर के निवासियों में मां दंतेश्वरी के प्रति आस्था उनके रक्त में अनादि काल से है। माई दंतेश्वरी ही बस्तर के इतिहास, संस्कृति और लोक विश्वास की केंद्र है। बस्तर का आधार बिंदु देवी दंतेश्वरी माई है जिनसे ही संपूर्ण बस्तर का अस्तित्व जुड़ता है।

दंतेश्वरी माई के प्रति लोक विश्वास
दंडकारण्य की अधिष्ठात्री मां दंतेश्वरी का लोक इतिहास सदियों प्राचीन है। देवी दंतेश्वरी माई के पुजारी, बारह लंकवार और सेवादार बड़े विश्वास से कहते हैं कि हजारों साल पूर्व दंतेश्वरी माई बालिका के रूप में दंतेवाड़ा के भंडारी परिवार में उनके घर आती थी और एक दिन एक चूड़ी वाले ने उस बालिका को चूड़ी पहनाई, चूड़ियां टूटती गई और इस तरह टूटी हुई चूड़ियों का ढेर लग गया । चूड़ी वाला सिर्फ चार चूड़ी उस बालिका को पहना पाया। तब चूड़ी वाले ने बालिका से चूड़ियों के पैसे मांगे। बालिका ने चूड़ी वाले को सारी टूटी हुई चूड़ियों के बदले स्वर्ण देकर मूल्य चुकाया। इस प्रकार चूड़ी वाले और अपने भंडारी परिवार की दरिद्रता दूर की। उस घटना का साक्षी वह स्थान आज भी दंतेवाड़ा में चूड़ी टिकरा के नाम से प्रसिद्ध है।

देवी दंतेश्वरी ने छह साल की बालिका के रूप में अपनी बाल लीलाओं से यहां के निवासियों को मंत्र मुग्ध कर रखा था। देवी ने अपनी दैवीय शक्तियों से जनसमुदाय का सदा कल्याण किया। जन आस्था में देवी को भैरम बाबा की अर्धांगिनी माना गया है। बस्तर के सम्राट भैरम बाबा और साम्राज्ञी देवी दंतेश्वरी ऐसा विश्वास यहां आज भी कायम है। क्षेत्रीय लोक गीतों में भैरम बाबा की अर्धांगिनी देवी दंतेश्वरी वाणी सिद्धी, तंत्र मंत्र की साधिका, दैवीय शक्तियों से युक्त असाधारण देवी कहा गया है। वह इस क्षेत्र में अनादि काल से लोक देवी के रूप पूजित रही है। दंतेश्वरी माई से संबंधित ऐसे कई दैवीय कृपा का लोक विश्वास बस्तर के निवासियों में पीढ़ियों से संरक्षित है।

इतिहास के पृष्ठों में देवी दंतेश्वरी माई का वर्णन
देवी दंतेश्वरी माई के अंतर्ध्यान होने के उपरान्त स्थानीय नागकुल के शासकों ने लोक देवी दंतेश्वरी की भव्य प्रतिमा बनवाकर देव गुड़ी में प्रतिष्ठापित की। यह प्रतिमा आज देवी दंतेश्वरी की स्मृतियों पर आधारित पुरातन और दिव्य तेज युक्त प्रतिमा है। प्रतिमा लक्षणों के अनुरूप देवी दंतेश्वरी माई की प्रतिमा षष्ठभुजा महिषमर्दिनी स्वरूप की है। यह प्रतिमा ऐतिहासिक दृष्टि से सातवीं आठवीं सदी से भी पूर्व कालखंड में निर्मित अनुमानित है। नागवंशी राजाओं ने अपने अभिलेखों में देवी दंतेश्वरी माई को उनके मूल नाम माणिक्येश्वरी देवी अथवा माणिक्य देवी कहकर संबोधित किया है। दत्तवाड़ा नगर में जब सातवीं आठवीं सदी में माणिक्य देवी की प्रतिमा स्थापित हुई तब जनसमुदाय ने माणिक्य देवी को दत्तवाड़ा की दत्तवाड़ीन और दंतेसरी का संबोधन दिया। बस्तर में गांव के नाम का संबोधन आज घर की मातृ शक्ति को भी दिया जाता है। इसी लोक परम्परा से दत्तवाड़ा की माणिक्यदेवी दंतेसरी कहलाई। नागवंशी राजाओं ने अपनी भाषा हल्बी में देवी दंतेश्वरी माई को मावली कह कर अपनी आस्था प्रकट की। मावली मां का पर्याय है और आज भी बस्तर के गांव गांव में देवी दंतेश्वरी मावली के नाम से प्रतिष्ठापित है। स्थानीय निवासी देवी दंतेश्वरी माई को सिर्फ मावली कहकर संबोधित करते हैं।

ग्यारहवीं सदी में स्थानीय नागवंशी राजा जगदेकभूषण प्रथम (1023 ईस्वी से 1063 ईस्वी) ने वर्तमान दंतेश्वरी मंदिर बनवाकर देवी दंतेश्वरी (माणिक्येश्वरी)की प्राचीन प्रतिमा को पुनर्प्रतिष्ठित किया। दंतेवाड़ा में विशाल शाक्त मठ का निर्माण कराया जिसमें देवी माणिक्येश्वरी की कई प्रतिमाएं अलग अलग मंदिरों में स्थापित की गई। दंतेवाड़ा शाक्त मठ में में दंतेश्वरी माई के तीन देवालय आज भी शेष है। सातवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक पूरे चक्रकोट राज्य में प्रत्येक परगना या मुख्य नगरों में मंदिर बनवाकर माणिक्येश्वरी देवी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित की गई। कहीं देवी दंतेश्वरी के नाम से तो कहीं ग्राम के नाम से यथा केसरपाल की केसरपालीन, छिंदनार की छिंदनारिन, नेतानार की नेतानारिन आदि नामों से देवी स्थानीय लोक में स्थापित हुई और दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी की बहनों के रूप में मान्य हुई।

नाग कुल के सभी शासकों ने माणिक्य (दंतेश्वरी )देवी के नाम से बस्तर (चक्रकोट) पर शासन चलाया। देवी दरबार में राजकीय आदेशों की स्वीकृति उपरांत ही राज कार्य किए जाते थे। नाग राजाओं के बाद यह परम्परा वारंगल के काकतीय चालुक्य राजाओं ने भी कायम रखी। नाग नरेश जगदेकभूषण प्रथम के समय तत्कालीन दत्तवाड़ा का यह शाक्त मठ नरबलि, पशुबलि, शवसाधना, आत्मबलिदान, कापालिकों की तांत्रिक सिद्धियों का बहुत बड़ा केंद्र बन गया था। लंबे समय तक यह परंपराएं देवी दंतेश्वरी के मंदिर में अनवरत चलती रही।

नागवंशी राजाओं के पतन के बाद वारंगल से आए राजकुमार अन्नमराज ने चक्रकोट राज्य में अपना शासन स्थापित किया तब उन्होंने भी यहां की लोक देवी दंतेश्वरी (माणिक्य देवी) के प्रति अपनी आस्था प्रकट की, उन्हें अपनी कुल देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया। अन्नमदेव को देवी दंतेश्वरी से चक्रकोट (बस्तर)में चौदह पुस्त तक राज करने का आज्ञा पत्र दिया गया। विजयाभियान के लिए देवी दंतेश्वरी की तरफ वस्त्र, तलवार दी गई। शर्त यह थी कि देवी अर्थात देवी का सिरहा जिस पर देवी आरूढ़ हुई वह पीछे पीछे चलेगी और राजा अन्नमराज देवी (सिरहा) के पैरों में बंधे घुंघरू की आवाज सुन कर आगे बढ़ते जाएंगे और पीछे मुड़ कर नहीं देखेंगे। दंतेवाड़ा से आगे बढ़ते हुए राजा अन्नमराज राजिम के पास तक विजेता बनकर पहुंचे, राजिम के पास पैरी नदी में रेत के कारण राजा को देवी (सिरहा) के पैरों में बंधे घुंघरू की आवाज सुनाई नहीं दी। राजा ने कौतूहल वश पीछे मुड़कर देख लिया और देवी दंतेश्वरी की वह शर्त टूट गई तब अन्नमराज का विजयाभियान राजिम तक रुक गया। इस प्रकार सन 1830 ईस्वी तक बस्तर राज्य राजिम की पैरी नदी तक बना रहा। अन्नमराज के बाद के सभी काकतीय चालुक्य राजाओं ने देवी को अपने कुल देवी के रूप प्रतिष्ठित कर राज कार्य चलाया।

बस्तर को सांस्कृतिक विरासतों की देन
देवी दंतेश्वरी मंदिर बस्तर के पुरातन इतिहास, लोक विश्वास के साथ साथ संस्कृति और आस्था का केंद्र बिंदु भी है। बस्तर के सांस्कृतिक पर्व यथा फागुन मंडई और बस्तर दशहरा देवी दंतेश्वरी माईजी से जुड़े पर्व है। दंतेश्वरी माईजी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ पर्व आज फागुन मंडई के नाम से विख्यात है। विगत चौदह सौ साल से यह पर्व प्रत्येक वर्ष फागुन महीने में दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा में आयोजित किया जा रहा है। जिसमें बस्तर क्षेत्र के कोने कोने से हजारों देवी देवता अपने प्रतीकों के साथ सम्मिलित होते है। फागुन मंडई का यह विशाल पर्व अपने जनजातीय धार्मिक संस्कृति, आखेट नाट्य, नृत्य, गायन, परिक्रमा, पूजन, गायन आदि अनेक सदियों पुरानी परम्पराओं रस्मो का अनूठा संगम है। फाल्गुन शुक्ल षष्ठी तिथि से लेकर होली तक प्रत्येक संध्या देवी की पालकी निकाली जाती है। रात्रि को आखेट नाट्यों का मंचन किया जाता है। आखेट नाट्यों में लम्हा मार, कोडरी मार, चीतरमार, गंवरमार मुख्य आकर्षण का केंद्र है। अंतिम मंडई के दिन दंतेवाड़ा नगर बस्तर के देवी देवताओ का कुंभ मेला बन जाता है। दंतेवाड़ा के आकाश में बस्तर के समस्त देवी देवताओं के ध्वज लहराते रहते हैं। धर्म, आस्था, संस्कृति का ऐसा अद्भुत समागम सिर्फ शंखिनी डंकिनी नदियों के संगम दंतेवाड़ा में दिखता है।

जगन्नाथ पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व की आस्था की यात्रा है। इसी तरह से बस्तर में दंतेश्वरी माई की रथयात्रा दशहरा के अवसर पर आयोजित की जाती है। इस रथयात्रा को आज पूरा विश्व बस्तर दशहरा कहता है। राजा पुरुषोत्तम देव ने सन 1490 ईस्वी में जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा की तरह ही दंतेवाड़ा में देवी दंतेश्वरी के प्रतीक परम पवित्र छत्र को रथ पर आरूढ़ कर रथ यात्रा प्रारंभ करवाई। रथयात्रा का यह पर्व बस्तर दशहरा के नाम से विश्वविख्यात है। विगत ढाई सौ साल से राजधानी जगदलपुर में बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट परंपराओं के साथ आयोजित किया जा रहा है। विशाल सुंदर रथों पर देवी दंतेश्वरी माई के छत्र को आरूढ़ कराकर परिक्रमा संपन्न की जाती है। रथ निर्माण, काछिनगादी, देवियों का आगमन, रथ परिक्रमा, मुरिया दरबार आदि अनेक परम्पराओं का निर्वहन बस्तर दशहरा की अनूठी विशेषताएं है। देवी दंतेश्वरी के प्रति जनसमुदाय की आस्था का प्रवाह बस्तर दशहरा का पर्व है।

लोप हो चुकी परंपराएं
दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा अपनी ऐसी परम्पराओं के लिए भी जाना जाता था जिसकी कल्पना से भी रहस्य उत्पन्न होते है। छिंदक नाग राजाओं के काल में बस्तर में नरबलि जैसी प्रथाएं भी प्रचलित रही थी। ब्रिटिशकाल की विभिन्न दस्तावेजों में मंदिर में नरबलि की कई सूचनाएं मिलती हैं। राजा दृगपाल देव ने सन 1703 ईस्वी में नवरंगपुर जीतने की खुशी में दंतेश्वरी मंदिर में कुटुंब जात्रा की थी जिसमें बलि के कारण शंखिनी डंकिनी का संगम रक्त से लाल हो गया था। इसके द्विभाषी अभिलेख आज भी मंदिर में रखे हुए है। मराठा ब्रिटिश काल में देवी दंतेश्वरी मंदिर में नरबलि की कई रिपोर्ट तैयार कर इस बलि परम्परा को बंद करने का प्रयास किया गया जिसमें बाईस साल तक अरब सैनिकों ने दंतेश्वरी मंदिर को अपनी घेरे बंदी में रखा। मंदिर को अपवित्र किए जाने तथा नरबलि के नाम से स्थानीय लोगों पर अत्याचार के फलस्वरूप प्रसिद्ध मेरिया विद्रोह हुआ। यह घटना 1842 ईस्वी की है। मंदिर में आत्मबलिदान की परंपरा भी हुआ करती थी। अनेक आत्मबलिदानी योद्धाओं की मूर्तियां आज भी दंतेवाड़ा मंदिर में पूजित है।

परम्पराओं एवं संस्कृति के वाहक
देवी दंतेश्वरी मंदिर में पिछले तेरह सौ साल से भी भी अधिक समय से जिया परिवार प्रधान पुजारी मठपति के रूप कार्यरत हैं। बस्तर जैसे वनांचल में पुजारी परिवार की 30 पीढ़ियों की जानकारी दुर्लभ उपलब्धि है। देवी दंतेश्वरी मंदिर के विभिन्न पर्व कार्य परम्परा आदि के संचालन में सहयोग हेतु द्वादश पात्र अर्थात बारह लंकवार समिति कार्यरत है। यह समिति विगत कई सदियों से आज तक कार्यरत है जिसमें शामिल सदस्य विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मंदिर के सेवादार देवी की सेवा में पीढ़ियों से तत्पर कार्यरत है। बस्तर दशहरा में बस्तर राजपरिवार एवं रथ निर्माण तथा परम्पराओं में विभिन्न समुदायों की सहभागिता सदियों से आज पर्यंत तक कायम है। बस्तर राजा रुद्रप्रताप देव और बस्तर महारानी प्रफुल्ल कुमारी के समय दंतेश्वरी मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। आज मंदिर के सम्मुख काष्ठ प्रवेश मंडप का स्वरूप इसी जीर्णोद्धार के फलस्वरूप दिखलाई पड़ता है।

वर्तमान स्थिति में देवालय एक धार्मिक केंद्र
बीसवीं सदी तक दंतेवाड़ा का दंतेश्वरी मंदिर एक नरबलि, तंत्र मंत्र के केंद्र एक असामान्य रहस्यों से युक्त देवालय के रूप में गुमनाम था। नरबलि जैसी परम्पराओं के कारण यह क्षेत्र दूर दूर तक आबादी विहीन था। धीरे धीरे पुरानी परंपराएं लोप होती गई और दंतेश्वरी मंदिर जन आस्था का केंद्र बनता गया। आज दंतेश्वरी मंदिर पूरे विश्व में देवी आस्था का मुख्य धार्मिक स्थल बन गया है। नवरात्रि में लाखों श्रद्धालु दूर दराज से देवी दर्शन हेतु पैदल आते हैं। वर्तमान दिन प्रतिदिन देवी दर्शन हेतु आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती जा रही है।इसी तरह से वर्ष भर अनेक पर्व दंतेश्वरी मंदिर में सदियों से अपनी परंपरागत मान्यताओं और पूजन विधि के साथ आयोजित किए जाते हैं।

दंतेवाड़ा छत्तीसगढ़ राज्य के सुदूर दक्षिण में स्थित है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा, रेलवे स्टेशन और मुख्य केंद्र जगदलपुर है। जगदलपुर से अस्सी किलोमीटर की दूरी तय करके मां दंतेश्वरी माई जी के दर्शन हेतु आ सकते हैं।

ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास
शासकीय शहीद बापुराव स्नातकोत्तर महाविद्यालय सुकमा

Address

Kumharrash Sukma Road
Dantewada
494551

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