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महाशिवरात्रि विशेष___◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆मधुबनी जिला अंतर्गत पंडौल प्रखंड के भवानीपुर मे स्थित छैथ बाबा उगना जिनकर इतिहास बहुत पुर...
28/02/2022

महाशिवरात्रि विशेष___
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मधुबनी जिला अंतर्गत पंडौल प्रखंड के भवानीपुर मे स्थित छैथ बाबा उगना जिनकर इतिहास बहुत पुराण अछि...

अहि मंदिरक निर्माण 1932 मे तत्कालीन महाराज आ ग्रामीणक सहयोग सँ काएल गेलैक प्राचीनताक ठेकान अहियो सँ लगायल जा सकैत अछि जे एतय सात फुट नीच्चा जा'क शिवलिंग के दर्शन हैत, अहि मंदिर के गर्भगृह मे प्रवेश करबाक लेल छह सीढ़ी उतैर क जाए परैत छै अहिना उज्जैन मे स्थित महाकाल मंदिर मे सेहो छह सीढ़ी निच्चा गेलाक बाद महादेवक दर्शन होएत छै, मंदिरक सत्यताक प्रमाण इहो अछि जे 1934 मे एल विध्वंसकारी भूकंप स सेहो अहि मंदिर पर कोनो फर्क नै देखबा मे आयल!

बाबा विद्यापति महादेवक भक्त रहैथ महादेव के खूब नचारी गाबि क सुनबथिन महादेव खुश भ उगनाक रूप मे धरतीलोक एलाह, बाबा विद्यापति के चाकरी करह लगलाह अहि क्रम मे विद्यापति उगना संगे राजा शिव शिंह के दरबार जा रहल छला एकटा घनघोर जंगलक बिच बाबा विद्यापति के खूब जोर प्यास लगलैन आ कहला "रे उगना जल्दी सँ पाइन ला रउ नै ता हम मइर जेबउ बर जोर स प्यास लागी गेलौ" कहैत प्यासे ओंघराय लगलाह, आब उगना परेशान भ एम्हर-उम्हर पाइन खोजैत फिरैथ कतौ दूर दूर तक नै देखला बाद उगना एकटा गाछक पिछु नुका क अप्पन असली रूप मे आबि क अपन जटा सँ गंगाजल निकाललाह आ बाबा विद्यापति के पाइन देलखिन, बाबा विद्यापति पाइन पिबैते देरी चौंक गेलाह आ उगना स पुछलैथ " रे उगना इ त गंगाजल छउ, हमरा कह एत गंगाजल कत भेटलौ" उगना नै चाहैत विवश भ अप्पन मूल स्वरुप देखा देलाह, बाबा विद्यापति उगना के चरण मे गिर आ माफी मँगैत कहला "प्रभु हमरा छमाँ करू हम अहाँ के चिन्ह नै सकलौं हमरा स पहुत पैघ अपराध भ गेल"

एक दिन उगना के बेलपत्र लाबै में कनेक देर भ गेलनि ताहि पर सुधीरा (बाबा विद्यापति के धर्मपत्नी) क्रोधित भ गेली ओ चुल्हा मे जरैत एकटा खोरनाठ निकाइल क उगना के मारबाक लेल उठेल्खिन "सर'धुआ आइ तोरा नै छोरबउ तों बड् शैतान भ गेलहै हमर बच्चा सब भुखले बिलाय्प रहल अछि आ तों एतेक देर मे बेलपत्र ल' क' एलै है" कहैत हुनका दिश गेलैथ, तखन बाबा विद्यापति स देखल नै गेलन्हि और ओ बजला "हे हे इ की करैत छि इ त साक्षात महादेव थिकाह" एतबे सुनैत उगना बिला गेलखिन, बाबा विद्यापति हुनका रोने-बोने खोजने फिरैथ आ खोजैत-खोजैत बाबा विद्यापति ओहि बोन मे पहुँच गेलैथ जाहि ठाम उगना अप्पन मूल स्वरुप देखने रहथिन, खूब जोर-जोर स गबैथ 'उगना रे मोर कतय गेलाह' महादेव के देख क दया एलैन आ महादेव दर्शन देलखिन कहलखिन "हम आब तोरा संग त नै रहबउ धैर एतह आब शिवलिंग के रूप मे हम रहबउ" बाबा विद्यापति अप्पन रचना मे लिखने छैथ "नंदन वन में भेटला महेश, गौरी मन हर्षित मेटल कलेश"

जाहि ठाम महादेव अप्पन असल रूप देखेलैथ ओहि ठाम अखनो अँकुरित शिवलिंग छै आ जाहि ठाम महादेव अपन जटा स गंगाजल निकलने रहैथ ओ इनारक रूप मे अखनो अछि जेकरा "चन्द्रकुप" के नाम स जानल जैत छै, ओहि चन्द्रकुप मे गंगा जल के प्रमाण आखनो अछि प्रमाणित करबाक लेल देशक कएटा जल वैज्ञानिक सब केने छैथ आ ओकर प्रमाण एखनो दरभंगा मे राखल छैक,
लोक अहि स्थान के उगना महादेव, उग्रनाथ महादेव आदि नाम स जनैत छैथ!
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~ पल्लवी झा

मिथिलान्चल की बहुत सारी ऐसी जगहें हैं जो की भगवान राम के मिथिला आने के बाद से महत्वपूर्ण हुई  हैं लेकिन ऐसी बहुत सारी जग...
10/06/2021

मिथिलान्चल की बहुत सारी ऐसी जगहें हैं जो की भगवान राम के मिथिला आने के बाद से महत्वपूर्ण हुई हैं लेकिन ऐसी बहुत सारी जगहें हैं जिनका महत्त्व उससे पहले से ही विद्यमान हैं । इस क्रम में आज हम चर्चा करेंगे मधुबनी ज़िला के हरलाखी प्रखंड अंतर्गत कलना स्थित कल्यानेश्वर नाथ महादेव मंदिर की ।

भौगोलिक दृष्टिकोण से ऐसा देखा गया है कि प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी वर्तमान नेपाल स्थित जनकपुरधाम में चारों दिशाओ से प्रवेश के चार द्वार बनाये गये थे एवं प्रत्येक द्वार पर एक एक शिव मंदिर की स्थापना हुई थी । जिसके तहत पूरब में मिथिलेश्वर् , पश्छिम में जलेश्वर् , उत्तर में क्षिरेश्वर् एवं दक्षिण में कल्यानेश्वर् मंदिर था । वर्तमान में कल्यानेश्वर् एवं जलेश्वर् नाथ महादेव मंदिर ही अब तक विद्यमान् है और इस बात की गवाही देता है ।

इस धाम के बारे में जानकारी ये भी है कि मिथिला राज के संस्थापक राजा मिति को महादेव - पार्वती स्वयम् दर्शन दिए थे और राजा के आग्रह पर सम्पूर्ण मिथिला राज की रक्षा के लिए यहीं रह गये थे । साथ ही राजा मिति ने उन्हें अपने कुल देवता के रूप में स्वीकार किया था । ऐसा माना जाता है कि अभी भी वो इसी मंदिर में रह कर हमारी रक्षा करते हैं ।

प्रत्येक वर्ष मिथिलान्चल की 15 दिवसीय (128 KM) मिथिला परिक्रमा की शुरुआत भी यहीं से होती है । यह परिक्रमा भारत - नेपाल के विभिन्न जगहों से होते हुए वापस से यहीं आ कर अंतिम पूजा के बाद समाप्त होती है।

यूं तो ये मंदिर बहुत ही प्राचीन् है परंतु २०वी सदी के बाद से इसके बारे में और अधिक लोग जानने लगे हैं । कारण है एक संत जिनका नाम था बाबा परमहंसजी महाराज । इनके बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि अपने पास आने वाले प्रत्येक भक्त के मन की व्यथा , उनकी परेशानियों को वह उसके अपने पास आने से पहले ही जान लेते थे । ये उनकी चमत्कारिक शक्ति कही जा सकती है । उन्होंने अपने जीवन भर में केवल कंद - मूल है खाया था । उनका शांतिप्रिय , पवित्र व ईश्वरीय व्यवहार वहां जाने वाले भक्तों को अनायास ही अपनी ओर खींच लेता था । उन्होंने दैहिक रूप से वर्ष 1992 तक यहाँ निवास किया है । इस मंदिर में आज भी वो कुटिया मौजूद है जहाँ बाबा जी रहा करते थे । मंदिर में आने वाला
प्रत्येक भक्त पूरी श्रद्धा के साथ कुटिया में भी पूजा पाठ करता है ।ऐसी मान्यता है कि बाबा परमहंसजी आज भी उस कुटिया में ही निवास करते हैं ।

कल्यानेश्वर् मंदिर में कुल 6 मंदिर एवं एक कुटिया बनी है । मंदिरों में एक मुख्य महादेव मंदिर के साथ - साथ आनंद भैरव मंदिर , काल भैरव मंदिर , हनुमान जी मंदिर , बाबा परमहंस मंदिर व मुख्य द्वार पर एक विश्वकर्मा मंदिर स्थित है । मंदिर के पूरब दिशा में चन्द्र - कूप खुदा हुआ है जिसका जल शिवलिंग को अर्पित किया जाता है । मंदिर के शिवलिंग का प्रत्येक रात श्रृंगार एवं पूजन किया जाता है । प्रांगण में एक प्राचीन तालाब है , मंदिर में आने वाला व्यक्ति वहाँ स्नान कर सकते हैं । यहाँ पुरुष और महिलाओं के लिए अलग अलग घाट की व्यवस्था है जिससे की किसी को भी परेशानी का सामना न करना पड़े तथा महिलाओं के लिए विशेष रूप से चेन्ज रूम भी बनाया गया है ।

यहाँ यातायात की भी कोई खास परेशानी नहीं है । मधुबनी से आने वाली प्रत्येक बस जो बासोपट्टी होते हुए भारत - नेपाल सीमा ( मधवापुर या जटही ) तक जाती है कलना होकर ही गुजरती है । नजदीकी रेलवे स्टेशन मधुबनी तथा जयनगर है जो यहाँ से क्रमशः 30.9 KM व 25.7 KM है । नजदीकी हवाईअड्डा दरभंगा 58.3 KM है । साथ ही यहाँ टैक्सी की सुविधा भी उपलब्ध है । यहाँ पूजा की सभी सामग्री भी मिल जाती है एवं बाहर हर तरह की जरुरत की दुकानें है ।

कुल मिला कर मिथिला भ्रमण के अंतर्गत यह स्थान दर्शन के लिए हर तरह से उपयुक्त है ।

✍️ अंशु कर्ण , सिसौनी

श्रृंगी ऋषि आश्रम - सिंघिया ( जिला मधुबनी , बिस्फी प्रखंड) ------------------------------------ऋषि श्रृंगी आश्रम रामायणक...
28/05/2021

श्रृंगी ऋषि आश्रम - सिंघिया ( जिला मधुबनी , बिस्फी प्रखंड)
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ऋषि श्रृंगी आश्रम रामायणकालीन मिथिला की ऐतिहासिक धरोहर है। यह मंदिर मधुबनी जिला के बिस्फी प्रखंड के अंतर्गत आता है।
दरभंगा रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग 17 किलोमीटर है , और नजदीकी रेलवे स्टेशन टेकटार है । दो तरफ से नदियों से घिरा यह जगह बहुत ही खूबसूरत और रमणीय है ।
इस जगह का अपन एक अलग धार्मिक ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक महत्व है। पुरातत्वविदों के अनुसार इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस तरह की शिवलिंग पुरे मिथिला में शायद २-३ जगह ही अवस्थित है।
श्री श्रृंगी ऋषि की शादी राजा दशरथ की एकलौती पुत्री शांता से हुआ था। इस तरह श्रृंगी ऋषि भगवान श्री राम चंद्र के बहनोई थे। श्रृंगी ऋषि के पिता का नाम विभाण्डक था। और विभाण्डक ऋषि के पिता यानी की श्रृंगी ऋषि के दादा जी कश्यप ऋषि थे जो की ब्रह्मा के मानस पुत्र भी हैं

उस समय राजा दशरथ के कोई भी पुत्र नहीं थे । दशरथ और उनकी रानियां इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि पुत्र नहीं होने पर राज-पाट कौन संभालेगा ।
उनके इस चिंता के निवारण के लिए ऋषि वशिष्ट ने एक उपाय बताया की वो अपने दामाद श्रृंगी ऋषि से पुत्र प्राप्ति यज्ञ करवाएं। लेकिन इस यज्ञ की एक समस्या ये भी थी की जो भी यह यज्ञ करवाएगा उसका पुरे जीवन भर का पुण्य इस यज्ञ के आहुति में नष्ट हो जायेगा।
पहले तो श्रृंगी मुनि ने साफ़ शब्द में राजा दशरथ को मना कर दिया की वो इस तरह का कोई भी यज्ञ नहीं करवाएंगे। लेकिन पत्नी शांता के कहने पर वह ये यज्ञ करवाने को तैयार हो गए।
यज्ञ संपन्न के बाद श्रृंगी ऋषि के पूरी जिंदगी के पुण्य के बदले राजा दशरथ के चारो पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ।
ऐसा माना जाता है कि ऋंग ऋषि और शांता का वंश ही आगे चलकर सेंगर राजपूत बना। सेंगर राजपूत को ऋंगवंशी राजपूत कहा जाता है।

श्रृंगी मुनि के जन्म को लेके दो अलग अलग तरह की कहानियां सुनने को मिलती है ।

पहली कहानी कुछ इस तरह है की :
श्रृंगी मुनि के पिता विभाण्डक नदी में स्नान कर रहे थे, तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया और उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था जिसके फलस्वरूप ऋंग ऋषि का जन्म हुआ था। क्यों की हिरणी से श्रृंगी मुनि का जन्म हुआ और उनके मस्तक पर एक छोटा सा सिंघ भी था इस लिए उनका नाम श्रृंगी रखा गया।

दूसरी कहानी ये है की :
दूसरी कहानी कुछ इस तरह है की एक बार विभाण्डक ऋषि के कठोर तपस्या से डर कर इंद्र ने अपनी अप्सरा उर्वशी को उनके तपस्या को भंग करने को भेजा । मुनि विभाण्डक उर्वशी में प्रेम जाल में पर गए। ऋषि विभाण्डक और उर्वशी के संयोग से ऋषि श्रृंगी का जन्म हुआ ।

अहिल्या स्थान एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर है। यह स्थान दरभंगा जिला अंतर्गत कमतौल रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी ...
27/05/2021

अहिल्या स्थान एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर है।
यह स्थान दरभंगा जिला अंतर्गत कमतौल रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर अहियारी गांव में स्थित है।
इस मंदिर की स्थापना महाराज छत्र सिंह और महाराजा रुद्र सिंह के राज्य के दौरान वर्ष 1662-1682 में हुई थी।

अहिल्या गौतम ऋषि की पत्नी थी और गौतम ऋषि ने एक बार गुस्से में अहिल्या को पत्थर बनने का श्राप दे दिया था । लेकिन बाद में जब उन्हें अपने गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने इस श्राप के निवारण के लिए ये उपाय बताया की जब स्वंय भगवान राम इस पत्थर को स्पर्श करेंगे तो वो पुनः पत्थर से नारी के स्वरूप में आ जायेगी।
रामायण के अनुसार जब भगवान राम जनकपुर जा रहे थे तो उनके पांव इस पत्थर को छू गया और वह पत्थर औरत में बदल गयी ।
यहाँ हर साल रामनवमी और विवाह पंचमी के अवसर पर बड़े मेले लगते हैं ।
इस मंदिर का धार्मिक के साथ साथ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व भी है।
यह मंदिर प्राचीन भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्टम नमूना है।

यह मंदिर हमें एहसास दिलाता है की वास्तव में हमारी संस्कृति कितनी ज्यादा समृद्ध है और हमारे पूर्वज कितने विद्वान और प्रतिभाशाली थे।
साथ ही इस मंदिर को भारत का पहला राम जानकी मंदिर होने का गौरव भी प्राप्त है।

इस मंदिर की एक अनोखी परंपरा है जो अमतौर पर इसे दूसरे मंदिर से बिलकुल अलग करती है। यहां की मान्यता है जो लोग यहां बैगन चढ़ाते हैं उनकी सारी मनोकामना पूरी होती है।
यहां मन्नत के तौर पर भी बैगन माना जाता है।
रामनवमी के दिन तो यहाँ बैगन का पहाड़ जैसा बन जाता है लोग काफी दूर दूर से आते हैं और जिनकी मनोकामना पूर्ण हो गयी होती है वो बैगन चढ़ाते हैं।

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दरभंगा सुगर कंपनी के तहत वर्ष 1914 में मधुबनी जिला अंतर्गत लोहट में इस चीनी मिल की स्थापना हुई थी और 1997 में इसे बंद कर...
26/05/2021

दरभंगा सुगर कंपनी के तहत वर्ष 1914 में मधुबनी जिला अंतर्गत लोहट में इस चीनी मिल की स्थापना हुई थी और 1997 में इसे बंद कर दिया गया था.
अभी भी इसके कुछ कामगार इस मिल के संपत्ति की रखवाली करते हैं.

तस्वीर में आप ट्रेन के इंजन की फ़ोटो देख रहे हैं इससे इस मिल के भव्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है .

यह ट्रेन की इंजन दरभंगा महाराज के "तिरहुत स्टेट रेलवे" की धरोहर है जिसे इंग्लैंड से 1913 में मंगवाया गया था.
फिलहाल इस इंजन को पूरी तरह से ठीक करके दरभंगा रेलवे स्टेशन पर सरंक्षित कर दिया गया है .
यह इंजन हमें मिथिला के गौरवशाली अतीत का याद दिलाता है .

30/12/2020

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बिहार के मिथिला क्षेत्र के दरभंगा जिला के राज परिसर नरगौना महल के बगल में हनुमान जी का एक मंदिर है, यह मनोकामना मन्दिर क...
19/11/2020

बिहार के मिथिला क्षेत्र के दरभंगा जिला के राज परिसर नरगौना महल के बगल में हनुमान जी का एक मंदिर है, यह मनोकामना मन्दिर के नाम से जाना जाता है |यह मंदिर सफेद संगमरमर से बना हुआ है |इस मंदिर का निर्माण महाराज रामेश्वर ने अपने किसी रिश्तेदार के लिए करवाया था जिसका कद काफी छोटा था |मंदिर छोटा होने के कारण श्रद्धालुओं को घुटने पर बैठ कर हनुमानजी का दर्शन करना पड़ता है |पूजा करने के बाद लोग अपनी मन्नत मंदिर की दीवार पर कलम या पेंसिल से लिखकर मांगते हैं ऐसा विश्वास है कि इस मंदिर पर लिखकर मांगने वाला मनोकामना जरूर पूरा होता है |यह मंदिर भी मिथिला के दर्शनीय स्थलों में से एक है |वैसे तो हर दिन यहां पर लोग दूर दूर से आते हैं परन्तु मंगलवार और शनिवार के दिन काफी भीड़ रहती है |

20/06/2020
श्यामा मंदिर यह  बिहार के दरभंगा जिला, मिथिला में अवस्थित है | कहा जाता है कि श्यामा माई का मंदिर श्मशान घाट में महाराजा...
18/06/2020

श्यामा मंदिर यह बिहार के दरभंगा जिला, मिथिला में अवस्थित है | कहा जाता है कि श्यामा माई का मंदिर श्मशान घाट में महाराजा रामेश्वर सिंह के चिता के ऊपर बना है, महाराजा रामेश्वर सिंह दरभंगा राज परिवार के साधक राजाओं में एक थे। स्थानीय बताते हैं कि राजा के नाम के कारण इस मंदिर का नाम रामेश्वरी श्यामा माई पड़ा। दरभंगा के राजा कामेश्वर सिंह ने 1933 में इस मंदिर की स्थापान की थी।इस मंदिर में मां श्यामा की पूजा तांत्रिक और वैदिक दोनों ही रूपों में की जाती है।

12 km from the Khagariya Dist.( Maa katyayani asthan )
06/02/2015

12 km from the Khagariya Dist.
( Maa katyayani asthan )

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Mithila
Darbhanga
847308

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