Tour in Uttarakhand

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16/07/2021

टिम्बर रेखा (यानी पेडों की पंक्तियाँ) समाप्त हो जाती हैं, वहाँ से हरे मखमली घास के मैदान आरम्भ होने लगते हैं। आमतौर पर ये ८ से १० हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित होते हैं। गढ़वाल हिमालय में इन मैदानों को बुग्याल कहा जाता है।
इनकी सुन्दरता यही है कि हर मौसम में इन पर नया रंग दिखता है। बरसात के बाद इन ढ़लुआ मैदानों पर जगह-जगह रंग-बिरंगे फूल खिल आते हैं। बुग्यालों में पौधे एक निश्चित ऊँचाई तक ही बढ़ते हैं। जलवायु के अनुसार ये अधिक ऊँचाई वाले नहीं होते। यही कारण है कि इन पर चलना बिल्कुल गद्दे पर चलना जैसे लगता है।

मतलबी लोग हैं खुदगर्ज जमाना है!!मोह माया छोडनी हैं! वसुधारा जाना  है!!
21/12/2020

मतलबी लोग हैं खुदगर्ज जमाना है!!मोह माया छोडनी हैं! वसुधारा जाना है!!

TUNGESWER MAHADEV
21/12/2020

TUNGESWER MAHADEV

Everyone is a moon, and has a dark side which he never shows to anybody.
23/10/2020

Everyone is a moon, and has a dark side which he never shows to anybody.

Both the eyes are one-sided. To get the perfect balance, you need Shiv Ji’s third eye.Bholenath 🙏 Kedarnath Uttarakhand
13/10/2020

Both the eyes are one-sided. To get the perfect balance, you need Shiv Ji’s third eye.
Bholenath 🙏 Kedarnath Uttarakhand

09/10/2020

Vasudhara Falls is a waterfall situated near Badrinath, in Uttarakhand, India. It joins river Alaknanda. As it heads towards Bhadrinath Temple, it bypasses the region. The distance from Badrinath to Vasudhara is 9 km. The first 3 kilometers of badrinath to mana village is drivable road. Next 6 km is walkable trek from Mana village to Vasudhara waterfall. The log inheight of this waterfall is 400 ft(122 mt)[1] This is the place where Lord Hyagriva first appeared to the world.This is also the place where Sage VedaVyasa divided the vedas into four Rig Yajur Sama and atharvana

देवभूमि उत्तराखंड यहाँ के रीति-रिवाज और लोकपर्व जो भी इनके बारे में जाने या समझे वो ही उसका दीवाना हो जाता है। इस पर्वती...
18/03/2020

देवभूमि उत्तराखंड यहाँ के रीति-रिवाज और लोकपर्व जो भी इनके बारे में जाने या समझे वो ही उसका दीवाना हो जाता है। इस पर्वतीय राज्य के लोगों की भी एक खासियत है कि यहां के निवासी बहुत ही त्यौहार प्रेमी होते हैं, हर महीने में एक त्यौहार तो जरुर ही मना लिया जाता है और इनकी एक और विशेषता होती है कि यहाँ ज्यादातर त्यौहार किसी न किसी रुप में प्रकृति से जुड़े होते हैं। आज यानी 14 मार्च को बसंत ऋतु के आगमन पर ऐसा ही एक और लोकपर्व मनाया जाता है जिसका नाम है फूलदेई त्यौहार और इसका भी प्रकृति से ख़ास जुड़ाव रहता है। क्यूंकि बसंत ऋतु के आगमन पर पूरे पहाड़ों के शोभा देखते ही बनती है चारों ओर फूल खिले होते हैं, खेतों में भी सरसों की फसल लहरा रही होती है तो जो भी इसे देखे वो इसका दीवाना हो जाए।

इस बसंत ऋतु के आगमन को घर घर तक पहुंचाने के लिए छोटे बच्चे सुबह से ही जंगलों और खेतों से अनेक प्रकार के फूल चुनकर लाते हैं जिनमें फ्यूंली, बुरांस, आडू, खुबानी, पुलम आदि के नाम प्रमुख हैं, और इन फूलों को चुनकर अपनी रिंगाल से बनी टोकरी में सजा कर रख देते हैं, उसके बाद ये सारे बच्चे हर किसी के घर में जाते हुए देहरी का पूजन करते हुए लोकगीतों को गाते हैं—

फूल देई, छम्मा देई,

देणी द्वार, भर भकार,

ये देली स बारम्बार नमस्कार,

फूले द्वार……फूल देई-छ्म्मा देई।

इस पूरी प्रर्किया के दौरान दो छोटे बच्चे घोगा माता को भी अपने कंधे पर साथ में ले जा रहे होते हैं जो फूलदेई त्यौहार की ईष्ट देव होती है, और घोगा माता की डोली को इधर से उधर घुमा रहे होते हैं, और इस सब प्रक्रिया के बाद घर का मुखिया उन्हें आटा, चांवल, गुड़ दक्षिणा के रूप में देकर विदा करता है। ये पूरा फूलदेई त्यौहार एक सप्ताह तक चलता है उसके बाद आठवें दिन आटा, चांवल, गुड़ के रूप में उन्हें जो भी दक्षिणा मिलती है उससे सभी छोटे बड़े मिलकर उस दिन सामुहिक भोज का आयोजन करते हैं।

Copy Paste:- Jan Tak

Betals  ashram  in risikesh
22/12/2019

Betals ashram in risikesh

  kedarnath   # Madmheswer Baba ke   # Rawal  Mharaj
16/12/2019

kedarnath # Madmheswer Baba ke
# Rawal Mharaj

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