उखीमठ केदारनाथ के निकट समुद्रतल से 4300 फुट ऊँचा एक छोटा नगर है। स्थानीय किंवदंती है कि उषा अनिरुद्ध की प्रसिद्ध पौराणिक प्रणयकथा की घटना स्थली यही है। एक विशाल मंदिर में अनिरुद्ध और उषा की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठापित हैं। इनके साथ ही मान्धाता की भी मूर्ति है। कहा जाता है कि केशव मंदिर में जो समुख शिवलिंग है वह कत्यूरी शासन के समय का है। मंदिर का वर्तमान भवन अधिक प्राचीन नहीं है। कहा जाता है कि स्थान क
ा मूल नाम उषा या उषा मठ था जो बिगड़ कर उखी मठ हो गया। उषा वाणासुर की कन्या थी। उषा-अनिरुद्ध की सुंदर कथा का श्रीमद्भागवत 10,62 में सविस्तार वर्णन है जिसमें वाणासुर की राजधानी शोणितपुर में कही गई है। उखीमठ में पहले लकुलीश शैवों की प्रधानता थी। यहाँ शैव संप्रदाय के लोग वीर शैव रहते हैं जो अपने शिव भक्ति के लिए जाने जाते हैं. यह भूमि मान्धाता की तपस्थली भी है. स्कन्द पूरण, लिंग पुराण और शिव पुराण में इसका वर्णन है. यह हिमालय का एक प्रसिद्द स्थान है. मंदिर की वास्तुकला पर दक्षिणी स्थापत्य का प्रभाव है जो इस ओर शंकराचार्य तथा उनके अनुवर्ती दक्षिणात्यों के साथ आया था।