31/12/2017
साल तो नया आ गया , पश्चिमीकरण भी सर चढ़ के बोल रही है और फैशन का दौर भी आ गया | लेकिन क्या हमारे अन्दर कुछ नवीनीकरण हुआ है, क्या हमारी सोच में बदलाव हुआ है, क्या हमने लोगो के लिए कुछ अच्छा सोचा है, क्या हमारे अन्दर पुनर्जागरण हुआ है, क्या हमने इनके बारे में कुछ पल निकालकर सोचा है? नही इस नए साल के ऐताहासिक पर्व पर ऐसा कुछ भी नही हुआ है सिर्फ एक दीवार पर लगे पुराने कैलन्डर को उतार कर नया टांग दिया है सब कुछ वही है कुछ भी नहीं बदला है यहाँ तक की हमारी सोच भी नहीं बदली है बस एक पल भर का पागलपन और जूनून बदला है जो whatsapp और facebook तक घूम कर रह गया है |. बदलना ही है तो अपने को बदलिए और बधाई देनी है तो उसको बधाई दीजिये जिसकी वजह से आप की जिंदगी बदली है या फिर आपकी वजह से किसी और की जिंदगी बदली है | बदलना है तो इतिहास बदलिए जो कोई और पढ़े और आपके बारे में जाने, कैलेन्डर तो शायद ही कभी बदले |
“जमाना तुमसे है मेरे दोस्त, तुम ज़माने से नही
बदलना है तो खुद को बदलो अफसाने को नही”.
इसी के साथ मै शत्रुघन यादव आप सभी का शुक्रगुजार नये साल 2018 की पावन बेला पर आप सभी को बधाई देता हू और कुछ अच्छा करने की गुजारिश करता हू और अपने करीबियों से ये आशा करता हू कि इस नए साल में मुझे मेरी गलतियों पर अवगत कराएँगे और इस से भी अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित करेंगे !
आप का स्नेहाशीष
शत्रुघन यादव