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मिडिल ईस्ट युद्ध और तेल की राजनीति: रूस-अमेरिका की रणनीति के बीच खाड़ी का संकट, ऊर्जा बाजार में बढ़ी वैश्विक बेचैनीमिडिल...
14/03/2026

मिडिल ईस्ट युद्ध और तेल की राजनीति: रूस-अमेरिका की रणनीति के बीच खाड़ी का संकट, ऊर्जा बाजार में बढ़ी वैश्विक बेचैनी

मिडिल ईस्ट में चल रहा संघर्ष अब केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं रह गया है. यह धीरे-धीरे वैश्विक ऊर्जा राजनीति और महाशक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है. खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता ने तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करना शुरू कर दिया है.

दुनिया की लगभग आधी तेल और गैस जरूरतें खाड़ी क्षेत्र से पूरी होती हैं. ऐसे में ईरान और उसके आसपास के इलाकों में बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा कर दी है. तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने कई देशों को चिंता में डाल दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संघर्ष के पीछे सिर्फ सैन्य या क्षेत्रीय मुद्दे नहीं बल्कि ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की बड़ी रणनीति भी काम कर रही है. अमेरिका, रूस, यूरोप और खाड़ी देशों के बीच चल रही यह रणनीतिक प्रतिस्पर्धा वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित कर रही है.

रूस के लिए संकट में अवसर की स्थिति.
यूक्रेन युद्ध के बाद से ही रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. लेकिन मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को फिर से अस्थिर कर दिया है. इससे रूस के लिए नई संभावनाएं भी खुलती दिखाई दे रही हैं.

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि जब भी वैश्विक तेल बाजार में संकट पैदा होता है, तब बड़े ऊर्जा उत्पादक देशों की भूमिका बढ़ जाती है. रूस इसी स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश कर सकता है.

रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin ने हाल ही में कहा था कि अगर राजनीतिक बाधाएं हटती हैं तो रूस दुनिया को ऊर्जा आपूर्ति जारी रखने के लिए तैयार है. उनके अनुसार, “ऊर्जा बाजार को स्थिर रखना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है और रूस इसमें अपनी भूमिका निभा सकता है.”

क्रेमलिन के प्रवक्ता Dmitry Peskov ने भी एक बयान में कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में तेल बाजार को स्थिर रखना सभी देशों के हित में है. उन्होंने संकेत दिया कि कई मामलों में अमेरिका और रूस के हित ऊर्जा स्थिरता के मामले में समान हो सकते हैं.

अमेरिका की रणनीति और ऊर्जा सुरक्षा.
दूसरी ओर अमेरिका भी ऊर्जा बाजार को लेकर लगातार सक्रिय दिखाई दे रहा है. अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ता संघर्ष वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, इसलिए बाजार को संतुलित रखना जरूरी है.

अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने हाल ही में वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए रखने के लिए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी. इस फैसले के तहत कई देशों को सीमित अवधि के लिए रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी गई ताकि बाजार में अचानक आपूर्ति संकट न पैदा हो.

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह कदम पूरी तरह से वैश्विक ऊर्जा स्थिरता को ध्यान में रखकर उठाया गया है. अमेरिकी ट्रेजरी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि “ऊर्जा बाजार में अस्थिरता पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है, इसलिए आपूर्ति बनाए रखना जरूरी है.”

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी हाल ही में अपने एक बयान में कहा था कि यदि उनके कार्यकाल में वर्तमान जैसी स्थिति होती तो वह यूक्रेन-रूस युद्ध और मिडिल ईस्ट संकट को रोकने के लिए अलग रणनीति अपनाते. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा प्रतिस्पर्धा इतनी जटिल हो चुकी है कि किसी एक देश के प्रयास से इसे रोकना आसान नहीं है.

ईरान संघर्ष और खाड़ी की अस्थिरता.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे संकट का सबसे बड़ा केंद्र ईरान और उसके आसपास का क्षेत्र है. खाड़ी में स्थित तेल भंडार और समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.

मिडिल ईस्ट में संघर्ष बढ़ने से तेल के बुनियादी ढांचे और समुद्री परिवहन मार्गों पर खतरा बढ़ गया है. अगर यह स्थिति लंबी चली तो वैश्विक बाजार में तेल की कमी और कीमतों में तेज वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया की करीब 50 प्रतिशत तेल और गैस जरूरतें सीधे या परोक्ष रूप से खाड़ी क्षेत्र से जुड़ी हैं. ऐसे में यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ना स्वाभाविक है.

यूरोप की दुविधा.
यूरोपीय देशों की स्थिति इस पूरे संकट में सबसे जटिल मानी जा रही है. एक ओर वे रूस के खिलाफ प्रतिबंधों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा करना है.

यूरोपीय संघ के कई नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट में संघर्ष लंबा चलता है तो यूरोप को अपनी ऊर्जा नीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है. हालांकि रूस से जुड़े सुरक्षा जोखिमों के कारण यूरोप के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा.

भारत की संतुलित नीति.
इस पूरे संकट के बीच भारत ने अपेक्षाकृत संतुलित और तटस्थ नीति अपनाई है. भारत की प्राथमिकता अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखना है.

भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश ऊर्जा खरीद के मामले में व्यावहारिक नीति अपनाता है. जहां से भी उचित कीमत और स्थिर आपूर्ति मिलती है, वहां से ऊर्जा खरीदना भारत की रणनीति का हिस्सा है.

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की यह संतुलित नीति उसे वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में रख सकती है.

क्या दुनिया नए “गर्म युद्ध” की ओर बढ़ रही है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान स्थिति शीत युद्ध जैसी तो नहीं है, लेकिन महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के बजाय क्षेत्रीय युद्धों और आर्थिक रणनीतियों के जरिए दबाव बनाया जा रहा है.

ऊर्जा संसाधनों, समुद्री मार्गों और रणनीतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका और रूस के बीच प्रतिस्पर्धा जारी है. ऐसे में मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा बन चुका है.

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह संघर्ष जल्द समाप्त होगा या फिर दुनिया लंबे समय तक तेल और ऊर्जा की इस भू-राजनीतिक जंग में उलझी रहेगी. यदि समाधान जल्दी नहीं निकला तो इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा कीमतों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है.

  ने अमेरिकी बेस पर हमले शुरू किएमध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. Iraq में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर रॉके...
01/03/2026

ने अमेरिकी बेस पर हमले शुरू किए

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है. Iraq में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर रॉकेट और ड्रोन हमलों की खबर सामने आई है. हमलों के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं.

हमले की जानकारी

रिपोर्ट्स के अनुसार इराक के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया गया. शुरुआती जानकारी में बताया गया कि रॉकेट और ड्रोन के जरिए हमला किया गया. कुछ हमलों को एयर डिफेंस सिस्टम ने हवा में ही नष्ट कर दिया, जबकि कुछ से मामूली नुकसान की खबर है.

किसने ली जिम्मेदारी

स्थानीय मीडिया के मुताबिक कुछ ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली है. हालांकि आधिकारिक तौर पर इराक सरकार ने किसी विशेष संगठन का नाम नहीं लिया है. सुरक्षा एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं.

अमेरिका की प्रतिक्रिया

United States ने हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि वह अपने सैनिकों और ठिकानों की सुरक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा. अमेरिकी रक्षा विभाग ने बयान जारी कर स्थिति पर नजर बनाए रखने की बात कही है.

इराक सरकार का बयान

इराकी सरकार ने कहा है कि देश की जमीन का इस्तेमाल किसी भी विदेशी ताकत के खिलाफ हमले के लिए नहीं होने दिया जाएगा. साथ ही दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है.

क्षेत्रीय असर

लगातार हो रहे इन हमलों से पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है. विश्लेषकों का मानना है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो यह संघर्ष व्यापक रूप ले सकता है, जिसका असर वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है.

अगर आप चाहें तो मैं इस खबर का थंबनेल टेक्स्ट, सोशल मीडिया पोस्ट या वीडियो स्क्रिप्ट भी तैयार कर सकता हूं.

 #ईरान ने खामेनी की मौत के बाद मिसाइलों से जवाबी हमला शुरू कियाईरान ने ईरानी सर्वोच्च नेता आयातोल्लाह अली खामेनी के निधन...
01/03/2026

#ईरान ने खामेनी की मौत के बाद मिसाइलों से जवाबी हमला शुरू किया

ईरान ने ईरानी सर्वोच्च नेता आयातोल्लाह अली खामेनी के निधन के बाद संयुक्त अमेरिकी–इस्राइली हमलों के जवाब में मिसाइलें दागनी शुरू की हैं. यह जवाबी कार्रवाई मध्य पूर्व में संघर्ष को और भड़काने वाली है, जो क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत देती है.

घटना का प्रारंभ-
28 फरवरी 2026 को, संयुक्त राज्य अमेरिका और इस्राइल ने एक बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया, जिसमें ईरान के कई सैन्य और वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया गया. ईरान की सरकारी मीडिया और पश्चिमी समाचार एजेंसियों के मुताबिक़ इस अभियान में आयातोल्लाह अली खामेनी की मौत की पुष्टि भी हुई है, जो देश के सर्वोच्च नेता थे और तीन दशक से अधिक समय तक शासन कर रहे थे.

खामेनी की मौत पर प्रतिक्रिया-
खामेनी के निधन की पुष्टि के बाद ईरान में राष्ट्रीय स्तर पर 40 दिनों का शोक घोषित किया गया है, और देशभर में उनका जीवन और प्रभाव बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है.

जवाबी मिसाइल हमले-
ईरान ने तुरंत ही इस्राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ मिसाइलें और ड्रोन लॉन्च करना शुरू कर दिया है. ईरानी आधिकारिक मीडिया के अनुसार, लगभग 75 से 150 मिसाइलों और कई ड्रोन तरीक़ों में हमले किये गये, जिनका लक्ष्य इस्राइली ठिकाने, अमेरिकी सैन्य ठिकानों तथा खाड़ी क्षेत्र के देशों में स्थित संयुक्त सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना था.

क्षेत्रीय प्रभाव-
इन जवाबी हमलों की वजह से कई देशों ने अपनी हवाई सीमाएँ बंद कर दी हैं, और सुरक्षा बलों को युद्ध की स्थिति पर तैयार रहने के आदेश दिए गए हैं. कुछ मिसाइलों को संघर्षरत देशों के हवाई रक्षा प्रणालियों द्वारा नष्ट किया गया है, जैसे संयुक्त अरब अमीरात ने तीसरी लहर मिसाइलें नाकाम कीं.

घटना का व्यापक अर्थ-
विश्लेषकों के अनुसार यह एक नए व्यापक युद्ध का संकेत हो सकता है, जो केवल तीन पक्षों — ईरान, अमेरिका और इस्राइल — तक सीमित नहीं रह सकता. यह संघर्ष मध्य पूर्व के तेल आपूर्ति मार्गों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकता है. विशेषज्ञ इस स्थिति को सबसे खतरनाक मिशन-स्तर तानाशाही मान रहे हैं.

अमेरिका और इस्राइल सरकारों ने ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को लंबे समय से खतरा बताया है.
ईरान ने भी समय-समय पर इस्राइल के खिलाफ मिसाइल और ड्रोन हमले किये हैं.

24/02/2026

Guess train speed to

30/01/2026

*गिरावट में बिटकॉइन को भी पछाड़ गया सोना-चांदी, निवेशकों में मचा हड़कंप*

नई दिल्ली: कीमती धातुओं के बाजार में आई ताज़ा गिरावट ने निवेशकों को चौंका दिया है। सोना और चांदी की कीमतों में ऐसी तेज़ टूट देखने को मिली है कि गिरावट के मामले में इन्होंने क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन को भी पीछे छोड़ दिया है। आमतौर पर ज्यादा उतार-चढ़ाव के लिए पहचाने जाने वाले बिटकॉइन की तुलना में इस बार सोना-चांदी ज्यादा तेजी से फिसले हैं।

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, बीते कुछ सत्रों में सोने और चांदी की कीमतों में प्रतिशत के लिहाज से इतनी बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जो इसी अवधि में बिटकॉइन में आई कमजोरी से कहीं अधिक रही। इससे साफ है कि सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोना-चांदी भी फिलहाल दबाव में हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर की मजबूती, अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुनाफावसूली और वैश्विक आर्थिक संकेतों ने कीमती धातुओं पर जोरदार असर डाला है। वहीं बिटकॉइन में उतार-चढ़ाव जरूर बना हुआ है, लेकिन इस बार उसकी गिरावट अपेक्षाकृत सीमित रही।

सर्राफा बाजार में भी इसका सीधा असर दिखा। खरीदार फिलहाल इंतजार की रणनीति अपना रहे हैं, जबकि निवेशक सतर्क होकर आगे की चाल पर नजर बनाए हुए हैं। जानकारों के मुताबिक, अगर मौजूदा रुझान जारी रहा तो आने वाले दिनों में बाजार में और अस्थिरता देखने को मिल सकती है।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे लंबी अवधि के निवेशकों के लिए मौके के रूप में भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि इतनी तेज़ गिरावट के बाद सोना-चांदी में सुधार की गुंजाइश बनी रहती है, लेकिन फिलहाल बाजार की दिशा वैश्विक संकेतों पर निर्भर करेगी।

सोने–चांदी की कीमतों में जोरदार गिरावट, निवेशकों में चिंता का माहौलनई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में आए उतार...
30/01/2026

सोने–चांदी की कीमतों में जोरदार गिरावट, निवेशकों में चिंता का माहौल

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजारों में आए उतार–चढ़ाव के बीच सोने और चांदी की कीमतों में जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई है। बीते कुछ दिनों में दोनों कीमती धातुओं के दाम अचानक लुढ़कने से निवेशकों और सर्राफा कारोबारियों में चिंता का माहौल बन गया है।

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी डॉलर की मजबूती, वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बिकवाली के दबाव के कारण सोने–चांदी पर असर पड़ा है। इसके साथ ही शेयर बाजार में स्थिरता लौटने से सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने से फिलहाल निवेशकों का रुझान कुछ कम हुआ है।

देश के प्रमुख सर्राफा बाजारों में सोना प्रति 10 ग्राम कई सौ रुपये सस्ता हो गया है, जबकि चांदी के भाव में भी प्रति किलो भारी गिरावट देखी गई है। इस गिरावट से जहां पुराने निवेशकों को नुकसान का डर सता रहा है, वहीं आम ग्राहकों और नए निवेशकों के लिए इसे खरीदारी का अच्छा मौका माना जा रहा है।

कारोबारियों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात ऐसे ही बने रहे तो आने वाले दिनों में कीमतों में और उतार–चढ़ाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, लंबे समय के निवेश के नजरिए से सोना अब भी सुरक्षित विकल्प माना जा रहा है।

फिलहाल बाजार की नजर वैश्विक आर्थिक संकेतों और आने वाले दिनों में होने वाले केंद्रीय बैंकों के फैसलों पर टिकी हुई है, जो तय करेंगे कि सोने–चांदी की कीमतें आगे किस दिशा में जाएंगी।

29/01/2026

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत के इस आदेश के बाद देशभर के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और छात्रों को बड़ी राहत मिली है।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UGC द्वारा जारी नए नियमों को लागू करने से पहले सभी पक्षों की बात सुनी जाना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक नए नियमों के तहत कोई भी कार्रवाई नहीं की जाएगी।

दरअसल, UGC के नए नियमों को लेकर शिक्षण संस्थानों, शिक्षकों और छात्र संगठनों की ओर से आपत्तियां दर्ज की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ये नियम न केवल छात्रों के हितों के खिलाफ हैं, बल्कि इससे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर भी असर पड़ सकता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नियमों को बिना पर्याप्त परामर्श के लागू किया गया है, जिससे शिक्षा व्यवस्था में असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाते हुए अंतरिम रोक लगाने का फैसला किया।

वहीं, UGC की ओर से कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा गया कि नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना है। हालांकि अदालत ने फिलहाल इस दलील पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सभी की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि UGC के नए नियमों का भविष्य क्या होगा। तब तक के लिए मौजूदा व्यवस्था ही लागू रहेगी।

नई दिल्ली : महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री Ajit Pawar को लेकर कथित ‘प्लेन क्रैश की साजिश’ वाली खबर ने देश की राजनीति में भू...
28/01/2026

नई दिल्ली : महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री Ajit Pawar को लेकर कथित ‘प्लेन क्रैश की साजिश’ वाली खबर ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। इस पूरे मामले को लेकर अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee खुलकर सामने आ गई हैं और उन्होंने इसे बेहद गंभीर बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग कर दी है।

ममता बनर्जी ने कहा कि अगर किसी संवैधानिक पद पर बैठे नेता की सुरक्षा से जुड़ा ऐसा मामला सामने आता है, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह महज अफवाह है या इसके पीछे कोई गहरी साजिश छिपी हुई है।

मुख्यमंत्री ने कहा, “अगर किसी बड़े नेता के विमान को लेकर साजिश की बात सामने आती है, तो यह केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की सुरक्षा का सवाल है। इसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए।”

वहीं, विपक्षी दलों ने भी इस खबर को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है और आरोप लगाया है कि देश में राजनीतिक असहमति रखने वाले नेताओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर लापरवाही बरती जा रही है।

हालांकि, अभी तक इस पूरे मामले पर न तो अजीत पवार की पार्टी की ओर से कोई औपचारिक बयान आया है और न ही केंद्र सरकार ने साजिश के दावे की पुष्टि की है। सुरक्षा एजेंसियां मामले की तथ्यों के आधार पर पड़ताल कर रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी की यह मांग आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़कों तक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस कथित साजिश की जांच वास्तव में Supreme Court of India की निगरानी में होती है या मामला सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित रह जाता है।

22/01/2023

#बागेश्वर_धाम में परा शक्ति का अनुभव करना वाला का पत्रकार

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