11/07/2021
क्या टकराव और नफरत की राजनीति के चलते अमन कायम हो सकता है
आई डी खजुरिया
दुनिया में मानवीय व्यवस्था की रचना, संरचना और प्राकृतिक नियमों में दखल देना और उसे तबाह करने को ही विकास कहा गया है. मनुष्य ने इसे 'राजनीति' का नाम दिया है. इसी के चलते नए-नए अविष्कारों की मदद से समूची मानवजाति और प्रकृति को कुछ हाथों में केंद्रित कर दिया गया है; बाकी जनता को गुलाम बताया गया, गंवार माना गया, बुद्धिहीन जाना गया, कमजोर माना गया और उन्हें हमेशा अपने हित साधने के लिए इस्तेमाल किया गया. उस बड़ी आबादी ने छातियों पर तीर खाए, तलवार से सिर कटवाए, बंदूक की गोलियों से शहीद हुए, एटम बमों की मार से मानव त्रासदियां हुई.
अमन की चाहत,जरूरत और उम्मीद हमेशा बढ़ती गई. मगर हर आम इंसान के लिए यह संसार अविस्मरणीय नर्क की भांति तकलीफदेह बना रहा. इस मामले में सभी सरकारें बुरी तरह निकम्मी साबित हुईं.
चाहे सैलाब आया, भूचाल ने हिलाया या फिर कोविड-19 की महामारी ने कहर बरपाया हो, दुनिया भर में डॉक्टर, रोगी और उनके परिजन, सभी बिलखते रहे. लाशें बहती रहीं, उनका अपमान होता रहा. इससे सामाजिक रिश्ते तार-तार हो गए. पर भ्रष्ट कारपोरेट तंत्र और उसकी कठपुतली सरकारों के चहेतों के मुनाफे बढ़ते गए. चाहे दवा निर्माता थे, आक्सिजन सिलिंडर, मास्क, सेनिटाइजर आदि के निर्माता, टेलीकम्युनिकेशन के मालिक, रेता-बजरी के ठेकेदार, सभी की पाँचों उंगलियां घी में डूबी रहीं. दाल-रोटी, तेल, प्याज, पेट्रोल-डीजल आदि ने तो जनता को नाकों चने चबवा दिए.
भारत सरकार और प्रधान सेवक ने तो पिछले सात साल से एक ही एजेंडा थामा हुआ है और वो है चुनाव का प्रबंध करना, भांति-भांति के अपने कपड़े बदलते रहना, बड़ी-बड़ी रैलियों को संबोधित करना, चाहे फर्स्ट हो या सेकंड फेज हो और चाहे अभी-अभी थर्ड फेज आया ही हो, उनका तो रास्ता तय है -- पांच राज्यों में आगामी चुनावों का डंका बजाना. वे वादे करते रहते हैं और भूलते जाते हैं, उन्हें कभी याद नहीं रखते.
भाजपा को अब अनेक सवालों के जवाब देने हैं –
कितने करोड़ युवाओं को उसने रोजगार दिया? कितने स्मार्ट सिटी तैयार हो गए? सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत कितने गाँव खुशहाल हुए? गंगा मैया साफ हुई या नहीं? अगर हुई तो कितनी साफ हुई? बुलेट ट्रेन कहां-कहां चली? मेक इन इंडिया का क्या परिणाम निकला? कितने दागी नेता जेल गए? स्टार्ट-अप इंडिया का क्या हुआ? बिहार को 175 लाख करोड़ के पैकेज से क्या-क्या विकास हुआ?
जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और 35ए हटाने से क्या अलगाववाद खत्म हो गया? जिन नेताओं की सुविधाएं बंद करके उन्हें "गैंग" नाम से नवाजा गया था, उनके साथ फिर वार्ता क्यों शुरू की गई? और जम्मू-कश्मीर की जनता के जीवन में कितना सुधार हुआ? क्या देश से और जम्मू-कश्मीर से भ्रष्टाचार मिटा?
स्थायी शांति वार्ता के दौरान क्या पड़ोसियों से बात हुई? अगर हुई तो कहां तक पहुंची? मोदी के विदेशी दौरों से देश को क्या हासिल हुआ? विदेश से काला धन वापिस लाने के वादे का क्या हुआ?
महिलाओं पर अत्याचार क्या रुक गया? महिलाओं के 33%रिजर्वेशन बिल का क्या हुआ?
क्या नोटबन्दी से आतंकवाद और नक्सलवाद की कमर टूट गई? देश में घूसखोरी बंद हो गई? मॉब लिंचिंग, रोमियो स्क्वैड, हिंदू-मुस्लिम करके देश मे तनाव बढ़ने से क्या इंसानियत को या राष्ट्र को कोई लाभ हुआ?
लेकिन हकीकत में न देश का विकास हुआ, न टैक्स प्रणाली में सुधार हुआ, न इंस्पेक्टर राज में कमी आई, न ही बैंकों का अरबों रुपया डकार जाने वाले भ्रष्ट पूंजीखोर जेल गए. स्कूल-कालजों या समूची शिक्षा प्रणाली तथा अस्पतालों एवं स्वास्थ्य प्रणाली का हाल तो इन दोनो विभागों के मंत्रियों के इस्तीफों से ही खुल गया.
किसानों का आंदोलन और सरकार का रवैया क्या खेती की सुविधाओं में इजाफा करेगा? किसानों की आत्महत्याओ को रोकने का काम करेगा? सरकार खुद अपनी सोच को वैज्ञानिक बनाते हुए क्या जनता में वैज्ञानिक मानसिकता को बढ़ावा देगी और ज्यादा से ज्यादा नए वैज्ञानिक प्रयोग करके ऐसी वैकल्पिक विचारधाराओं को भी पनपने का मौका देगी जिससे भिन्नता मे एकता का सच ढूंढा जा सके, जिससे सबको रोटी-कपड़ा-मकान मिले, अदालतों में ज्यादा से ज्यादा न्याय मिले?
यह सब कुछ मुमकिन है बशर्ते हम सब नई वास्तविकताओं को समझने और अपनाने के लिए प्रकृति की संरचना का अध्ययन करें और सच को समझें.
मनुष्य की आज तक की समझ के अनुसार, प्रकृति में अनगिनत प्रक्रियाएं या घटनाक्रम हैं जो एक-दूसरे से भिन्न हैं. दूसरी बात यह है कि इनमें हर प्रक्रिया या घटनाक्रम एक-दूसरे पर अंतर्निर्भर है, अंतर्संबंधित है और ये सभी एक नियम के तहत लगातार आपसी एकता एवं आपसी संघर्ष के जरिये अंतरक्रिया करते आ रहे हैं. इसी से हर घटनाक्रम का विकास हो रहा है. इसका प्रमाण भिन्नता में एकता की सचाई से दीखता है. इसी प्रकार मानवजाति भी एक घटनाक्रम है जो भिन्न-भिन्न रंगों, बोलियों, शक्लों, रीति-रिवाजों, खाने-पीने की आदतों, पसंदों, क्षेत्रो (पहाड़ी, मैदानी, बर्फानी, जंगली), आस्थाओं और राष्ट्रों में बंटा होते हुए भी एक ही मानवजाति घटनाक्रम है और भिन्नता में एकता के नियम के अनुसार विकसित हो रहा है.
बेशक मनुष्य के अंदर समझने, विचारने और कुछ करने की योग्यता दूसरे घटनाक्रमों से कहीं अधिक है. वह विचार गढ़ता है, नफा-नुकसान को अच्छी तरह जानता है. इससे उसके अंदर दूसरों को गुलाम बनाने, मुनाफा कमाने की प्रवृति भी पैदा हुई है और उसने अपने लिए ये दर्शन भी गढ़ लिए हैं कि मानव सर्वश्रेष्ठ है, वह प्रकृति का मालिक है (मैन इज मास्टर ऑफ नेचर, ही कैन कंकर द नेचर ), जिस किसी के पास धनबल, बाहुबल और शस्त्रबल सहित राजसत्ता हो वो सर्वत्र मालिक है.
इस समझ और गुमान के चलते आज साढ़े सात अरब दुनिया को कंट्रोल में लेकर सारे मनुष्य विरोधी खेल खेले जा रहे हैं. यही व्यवस्था आज मानव व प्रकृति विरोधी बन चुकी है जो अधिकतम मुनाफा कमाने के लिए मनुष्य को भी वस्तु मानकर लूट रही है.
इसका एक ही हल है कि मानव टकराव व नफरत की राजनीति छोड़े; आपसी दुश्मनी को तिलांजलि दे; रंग, नस्ल, धर्म की लडाई का अंत करे; यह समझे कि अंतर्निर्भरता और सहअस्तित्व प्रकृति की सचाईं है; पूरी दुनिया से हथियारों की दौड़ खत्म हो; वीटो पावर खत्म हो; हर राष्ट्र को बराबर सम्मान मिले; दुनिया में सामाजिक और राजनीतिक मसले बातचीत से हल हों.
इसके अंतर्गत दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान भी यह पहल कर सकते हैं कि जंग किसी मसले का हल नहीं; बंदूक विचारो को नहीं दबा सकती; बातचीत शुरू की जाए, खासकर जम्मू-कश्मीर में स्थायी अमन-चैन लाया जा सके. इसके साथ ही सभी पड़ोसी देशों -- नेपाल, श्रीलका, म्यांमार, अफगानिस्तान, मालदीव, बांग्लादेश, भूटान -- की साझा मार्किट बनाई जाए. भारत और पाकिस्तान दोनो जम्मू-कश्मीर को साझा कंडोमिनियम बनाकर अपने रिश्ते अच्छे बना सकते हैं. नतीजा: सभी देशो की इकॉनोमी डबल हो जाएगी; सारे संसार को अमन-शांति का मार्ग दिखाया जा सकता है.
जुलाई,11,2021.