25/05/2026
_*माँ गंगा जी का पृथ्वी पर अवतरण और त्रिपथगामिनी महिमा*_
ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मां गंगा की पूजा-अर्चना की जाती है।
इसी दिन मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।
*विष्णु पादाब्ज सम्भूते, गंगे त्रिपथगामिनी।*
*ब्रम्हद्रवेति विख्याते, पापं मे हर जाह्नवी।।*
मनुष्यों के तापों की शान्ति के लिए ब्रह्म का द्रवरूप होना
गंगा को 'ब्रह्मद्रव' भी कहते हैं।
ब्रह्मद्रव' का अर्थ है-आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ( शारीरिक, मानसिक और भौतिक ) - इन तीनों तापों से पीड़ित मनुष्यों की दशा से परमात्मा ( ब्रह्म ) का द्रवित होकर उनके तापों की शान्ति के लिए जल रूप में अवतरित होना ।
ताप चाहे कैसा भी हो उसकी शान्ति जल से ही होती है ।
पृथ्वी पर लाने के लिये भागीरथ ने गंगाजी की तपस्या की, उसके कारण गंगाजी का *भागीरथी* नाम पड़ गया । भगवान् शंकर ने गंगाजी ( भागीरथी ) को अपनी जटा में रमा लिया
*जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्नि-लिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि*—
जैसे कड़ाह में पानी डालें तो वह उसीमें ही घूमता रहता है, ऐसे ही भगवान् शंकरकी जटा में गंगा घूमने लगीं ।
गंगा के मन में था कि मेरे वेग को कौन रोक सकता है !
मैं उसे ले जाऊँ पातालमें । भगवान् शंकर ने उन्हें अपनी जटामें ही रख लिया ।
जटा में वे घूमती रहीं । भागीरथ की पीढियाँ गुजर गयीं गंगा द्वारा मुक्ति पाने के लिए उसने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की, तब उन्होंने थोड़ी-सी जटा खोली, उसमें से *तीन धाराएँ निकलीं । एक स्वर्ग में गयी, एक पाताल में गयी और एक पृथ्वी लोक में आयी, इस कारण गंगा का नाम ‘त्रिपथगामिनी’ पड़ा।*
गंगा गंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि ।।
मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ।।
_*सैकड़ों किलोमीटर दूर से भी जो गंगा गंगा कहता है सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक जाता है तो जो गंगा में स्नान करता होगा उसे कौन सा फल मिलेगा इसकी तुलना भी नहीं हो सकती।*_