05/09/2018
अध्यापक दिवस पर
एक कविता गुरू चरणों में
गुरू वह नहीं है
जो तेजधारा
अपनी पीठ पर बिठाकर
पार करा दे
गुरु वह है
जो तैरना सिखाकर
कह दे कि जा पार कर
मैं खड़ा हूँ किनारे
संकट लगे तो पुकार लेना
गुरु वह नहीं है
जो हाथ पकड़कर
रास्ते पर साथ ले जाए
गुरू वह है जो
आँखें और नजर देकर
सारे रास्ते दिखाकर कह दे
कि जा
अपनी आँखों, अपनी नजर का
प्रयोग कर अपनी
बेहतर नई राहें ढूंढ़
गुरू वह नहीं है
जो ध्यान करना सिखाये
गुरु वह है जो शिष्य को
कभी कभी कुछ भी न करके
केवल अपने अंदर उतरना सिखा दे
और इस तरह स्वाभाविक
ध्यान होने लगे
गुरू वह नहीं है
जो सत्य, सही गलत क्या है?
वह बताये
गुरू वह है जो
बुद्धि विवेक ज्ञान चेतना
जाग्रत कर दे
और कह दे कि जा
अब तू स्वयं अपना सत्य खोज
अपना सही गलत चुन ले।
गुरु वह नहीं है
जो जीवन यापन की शिक्षा देकर
धन अर्जन सिखा दे
गुरू वह है
जो अर्जित धन का प्रयोग
अपने जीवन को
और समस्त जगत को
अधिकाधिक आनंदित करने में
कैसे प्रयोग करें
वह सिखा दे
गुरू वह नहीं है
जो ईश्वर, देवता की पूजा सिखा दे
गुरु वह है
जो उद्दात्त कर्मों
और उद्दात्त गुणों
को जाग्रत करके
शिष्य को देवत्व
और ईश्वरत्व
तक पहुँचाने की
राह खोल दे।