20/11/2022
#स्कूल_की_तैयारी_और_भात_की_भद्याई
हमारे बचपन मे च्वाइस नाम की कोई चीज नही थी , चीजें निर्धारित हुवा करती थी सभी बच्चों को चाहे अमीर हो या गरीब ज्यादे फर्क नही था | एक बात और तब गांवों मे अमीर मतलब रुपया पैसा नही था | अमीर का मतलब होता था जिसकी जमीन थी जिसमे पर्याप्त अन्न होता था , धिनाली थी , परिवार कर्मठ था और परिवार का एक सदस्य नौकरी मे होता था | ऐसा नही था कि तब गांव में पैसे वाले नही थे पर रहन सहन लगभग सबका एक जैसा ही था | खेती पाती उनकी महिलाए भी करती थी | टल्ली वाला पैजामा दिखना आम बात थी फर्क इतना था कि हमारे नीले पैजामे मे लाल टल्ली तो अमीर नीली मैचिग की टल्ली लगा लिया करते थे |
हमें कभी अपनी गरीबी पर हीन भावना नही होती थी |
आवश्यकताए सीमित थी | पुरुष अधिकतर नौकरीपेशा होते तो खेती महिलाए संभालती थी | महिलाओ के पास काम बहुत था तो समय मिलना मुश्किल होता था |
हमें सुबह स्कूल जाना होता था और हमारी ईजा(माँ) को हमें तैयार करने नाश्ता बनाने तक का समय नही था क्योकि यही समय उनके भी नहाने धोने , भीतर झाड झाडने , गाय भैंसो को न्यार पराल डालने का होता था | फिर परिवार के बडे बुजुर्गो को चाय देना , उनके लिए पानी गरम करना उनकी पूजा पाठ की व्यवस्था करना भी होता था | जिसके नौले धारे दूर हुए उनका एक काम तो पानी सारना भी हुवा , जानवर तो वैसे भी पानी ज्यादे ही पी जाते थे |
अब जब हम स्कूल के लिए तैयार होते तो ईजा हमें ले जाकर एक लोटे पानी से हमारा मुंह धुलवा कर तेल चुपडकर बालो में कंघी कर देती बस इतना ही था हमें तैयार करना | चूंकि दिन भर मिट्टी वगैरह मे खेलते रहते तो हमारे बाल उलझे हुए मिलते अगली सुबह और जब ईजा उनमें कंघा करती तो कंघा बालो में फंस जाता और ईजा चूंकि जल्दी मे होती तो कंघी से हमारे बाल लगभग उचेड ही देती | हम रोते , आंसू गिराते और ईजा से लगभग लड ही पडते , ईजा हैगोय , हैगोय , आब नि करू पीड कहती और बाल उचेडना चालू रहता | हम ईजा से छूटकर भागते फिर ईजा पुचकारती - जल्दी आ ईजा मेके ढील हुणै |
ईजा के लिए हमे मनाने हमारे पीछे आने का समय नही था | कभी मनाना कभी मैक्याना कभी रूठ जाना ईजा के ऐसे ही रूप दिखाई देते थे |
जिसके बडे भाई बहिन हुए उनकी जिम्मेवारी थी छोटो को तैयार करे , यहा बडी दीदी या किसी और के तैयार करने पर एक ठीकठाक जूतम पैजार रोज का सीन होता | दीदी लोग बात न मानने पर छोटो को एकाद फचैक जमा देते फिर ईजा की अदालत मे दीदी को गाई मैक छोटे को पुचकार मिलती | दीदीकहतीआज से नही करूंगी इसको तैयार , छोटा भाई आँसू और नाक के सिंगाण की मिश्रित जलधारा को पोछते हुए दीदी को दूर से चिढाने लगता | फिर हम नीली बुकसट और खाकी पेन्ट पहनते | यही ड्रैस हर सरकारी स्कूल की थी | हमारी तो इण्टर तक यही रही |
आजकल कभी सोचता हूं कि सिंगाण तो बच्चो की नाक मे निकलता ही नही | हमारी तो इतनी नाक बहती थी कि सुणुक्क सुणुक्क करने की आदत हो गयी थी | जब नाक ना भी बह रही हो तब भी सुणुक्क सीईई सीईई करते रहते थे | रूमाल से नाक पोछते है तो हमे बडे होकर पता चला | हम तो ले हतौडा मार फतोडा वाले थे | रूमाल में हम लोग गांठ लगाकर पैसे रखते या होलियो मे गुड |
अब आती नाश्ते की बारी | गांवो मे तब सुबह नाश्ते का तो प्रचलन ही नही था | वहां तो शहरो के नाश्ते के टाइम पर भात पक जाता था | नाश्ता तो शाम की चाय के समय पर किया जाता था वो भी किसी किसी के घर |
हमें सुबह स्कूल जाना होता था और खाने के समय और हमारे जाने के समय का तालमेल नही बैठता था इसलिए बच्चो के लिए रात से रोटी रख दी जाती जिसे सुबह स्कूल जाने से पहले तवे पर या डायरैक्ट जांती पर गरम कर उसके उपर गुड , भांग या कोई धनिये , जीरे का नमक या घी वगैरह के साथ हमें मिल जाता था | ये बासी नही खाता , ये पसंद नही यो भल नै लागन जैसे शब्द तो हम जानते ही नही थे हमें जो मिल गया वही स्वाद लेकर खा जाते | कभी कहीं से बासी पूडिया आ गयी तो सुबह के नाश्ते मे हमारा त्यार हो गया | सुबह रोटी के साथ - मूली का कच्चा थेचुवा , दही , दूध भी हमे अच्छा ही लगता | हम नमक के कणिक के साथ भी रोटी भकोर जाते |
अब दस ग्यारह बजे तक जो भात परिवार के लिए बनता वो हमारे लिए स्कूल से आते वक्त के लिए किसी कढाई या भद्यावे मे रख दिया जाता था |
एक तो बचपन उपर से दिन भर की भागदौड से स्कूल की छुट्टी होने पर खूब भूख लग जाती और हम स्कूल से दौडकर घर आते बस्ते को एक ओर पटकते और रसोई के उस कोने पर पहंच जाते जहां भात की कढाई होती थी | जल्दी इतनी रहती कि हाथ धोना सिर्फ गीला कर एक बार हाथो को एक बार रगडकर पेन्ट मे पोछ लेते |
गर्मिया हुई तो कढाई मे रखे ठन्डे भात पर ही टूट पडते और सर्दियो में कढाई के भात को ओलकर जांती पर रख देते | हमारे लिए दाल , भात , टपकिया , झोली ( पयो ) जो भी बना हो सब एक कढाई मे मिलाकर ही रखा होता था | अधधुले हाथो से मिलाकर बांज के क्वेलौ मे गरम करने रख देते | अगर डाडू हुवा तो ठीक नही तो बीच बीच मे हाथो से मिलाते |
फिर सभी बहन भाई कढाई के चारो तरफ बैठकर भात की सपोडा सपोडी चालू करते | कभी कभी ज्यादा गरम भात भी मुंह मे डाल जाते तब मुंह खोलकर आआआ करके बहन या भाई से मुंह मे फूक भी मार मागते .| लोहे की कढाई भी तब बढिया आती थी जंग कम ही लगता था , कढाई का भात गरम गरम अलग ही स्वाद लगता था | मिक्स दाल मे से कभी बडी राजमा के गूदे कभी टपकिया से आलू के टुकडे अलग अलग करके खाना खाने का स्वाद बढा देता था | कढाई को चाट चाट कर लगभग साफ धुली हुई सी बना देने की कला तो तत्कालीन हर पहाडी बच्चे को आती ही थी |
हालाकि पहाड मे एक आम कहावत बडी प्रचलित थी कि जो भद्याव या कढाई चाटता है उसके ब्याह मे बारिस होती है पर मुझे लगता है ये सही होता तो पहाड की हर शादी मे सुनामी ही आती |
भात गरम करने की प्रक्रिया मे कढाई की तली पर भात चिपक जाता था और कुछ अधजला हो जाता था जिसे हम - कुटूणि कहते थे | असली लडाई कुटूणि के लिए होती थी | थोडा जली हुई , कुरकुरा सी और भुटैन भुटैन होती थी कुटूणि | आज भी उसका स्वाद भूले नही भूलता | बहन भाइयो मे कुटूणि के लिए भी जंग होती |
भात को धपोडते ही हम कभी कपडे बदल कर तो कभी बिना बदले स्कूल ड्रैस मे खेलने दौड पडते - कभी घर के पिछवाडे , कभी गधेरे में कभी फसल कटे खाली खेतो में , कभी किसी पेड के नीचे | घर का आंगन तो हमारा खेल का मैदान हुवा ही ..
पहाड के कस्बो का तो पता नही पर गांव के बच्चो का बचपन तब ऐसा ही था |
#कुछ_पुरानी_बाते_पहाड_की
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