05/01/2024
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।
दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगीं- हे अनन्त! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूं. वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाणरहित बतलाते हैं. श्रुतियां और संतजन दया और सुख का समुद्र, सब गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करने वाले लक्ष्मीपति भगवान मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं. वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह हैं. तुम मेरे गर्भ में रहे, इस बात के सुनने पर धीर विवेकी पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती. जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुस्कुराये. वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं. अतः उन्होंने पूर्वजन्म की सुंदर कथा कहकर माता को समझाया, जिससे उन्हें पुत्र का (वात्सल्य) प्रेम प्राप्त हो और भगवान के प्रति पुत्रभाव हो जाए. माता की बुद्धि इससे बदल गई, तब वह फिर बोली- हे तात! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो. मेरे लिए यह सुख परम अनुपम होगा. माता का यह वचन सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान भगवान ने बालक रूप होकर रोना शुरू कर दिया. बच्चे के रोने की बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियां उतावली होकर दौड़ी चली आईं. दासियां हर्षित होकर जहां-तहां दौड़ीं. सारे पुरवासी आनंद में मग्न हो गए.