Narpat Shekhawat

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नमस्ते! मैं नरपत शेखावत, राजस्थान के गौरवशाली राजपूत वंश से हूँ। मूल रूप से भारत का निवासी हूँ, अब बेलारूस (यूरोप) में रहता हूँ, जहाँ भारतीय संस्कृति को स्थानीय जीवन से जोड़ रहा हूँ। कवि-लेखक के रूप में हिंदी, राजस्थानी व अंग्रेजी में रचनाएँ लिखता हूँ

“भारत पर आर्थिक संकट आने वाला है? जब तेल महँगा हो, रुपया टूटे, डॉलर बढ़े और देश के फॉरेन रिज़र्व पर दबाव आए — ये सिर्फ़ ...
20/05/2026

“भारत पर आर्थिक संकट आने वाला है? जब तेल महँगा हो, रुपया टूटे, डॉलर बढ़े और देश के फॉरेन रिज़र्व पर दबाव आए — ये सिर्फ़ चर्चा नहीं, आंकड़ों वाली चेतावनी है कि जेब और ज़िन्दगी दोनों खतरे में हैं।”

रविंद्र सिंह भाटी — नायक हैं, नाटक नहींबाड़मेर के लोग गुस्सा करते हैं, और ठीक करते हैं। पर इस गुस्से को बेकार का लेबल लग...
20/05/2026

रविंद्र सिंह भाटी — नायक हैं, नाटक नहीं

बाड़मेर के लोग गुस्सा करते हैं, और ठीक करते हैं। पर इस गुस्से को बेकार का लेबल लगाना असल मुद्दों से आंखें फेरना है। रविंद्र सिंह भाटी ने रेगिस्तान के उन दर्दों को आवाज दी जो दशकों से दबती आई थीं — पानी की कमी, रोजगार की कमी, विस्थापन और स्थानीय लोगों के साथ किए गए वायदों का टूटना। यह किसी फिल्मी स्क्रिप्ट की शुरुआत नहीं, यह हक़ की पुकार है।

भाटी का अंदाज़ नया और ताक़तवर है। उन्होंने युवा, आम और कट्टर राजनीति में न आए लोगों की उम्मीदों को बयां किया। उन्होंने लोकसभा में लाखों वोट बटोरे — यह संयोग नहीं, यह जनता की वास्तविक नाराज़गी है। जब संस्थाएँ जवाब नहीं देतीं, तो नेता को ज्यादा दृश्यता चाहिए होती है ताकि समस्या मीडिया‑ध्यान में आए और प्रशासन पर दबाव बने। क्या यही गलत है?

नाटकीयता और रणनीति में फर्क समझना ज़रूरी है:
- सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना और तेज़ बयान देना तब काम आता है जब कानूनी और प्रशासनिक रास्ते निष्क्रिय हों। यह लोकतांत्रिक दबाव का एक उपयुक्त तरीका है।
- भाटी का उद्देश्य ध्यान आकर्षित कर व्यवस्था की अनदेखी उजागर करना है — न कि आत्मघाती प्रचार। अगर कोई दृश्य ज्यादा जोरदार है तो वह इसलिए कि वर्षों की उपेक्षा का संकुचित नतीजा है।
- असल परीक्षा यह है कि प्रदर्शन के बाद क्या वास्तविक कार्रवाई होती है; भाटी और उनके साथियों ने कई बार लोकल मुद्दों को विधानसभा और मीडिया दोनों जगह उठाया है। यह दिखाता है कि उनका उद्देश्य केवल वायरल होना नहीं।

गिरल और RSMML के मामलों में मांगें वाजिब हैं: स्थानीय रोजगार, मुआवजे का उचित क्रियान्वयन, प्रदूषण नियंत्रण और पारदर्शिता। जब पारंपरिक तरीके काम नहीं करते, तो लोक‑दबाव बनाना ही आख़िरी विकल्प रह जाता है। और यदि नेता ही इस दबाव को व्यक्तिगत रूप से वहन कर सकते हैं, तो क्या इसे नेतृत्व नहीं माना जाएगा?

कुछ जरूरी बातें जिन्हें समर्थन करते हुए याद रखना चाहिए:
- भाटी ने जनता को आवाज दी; उनकी राजनीति मूलत: लोकहित पर केंद्रित रही है।
- समस्या की जड़ें सिस्टमिक हैं; समाधान के लिए न केवल वाहीर प्रदर्शन बल्कि विधानसभा में सक्रिय संघर्ष, कानूनी पहल और स्थानीय संगठनों के साथ गठजोड़ दोनों चाहिए। भाटी इन कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं।
- नेताओं से त्रुटियाँ संभव हैं, पर क्या विरोध का मतलब ही नेता को खारिज कर देना है? या हमें उनके काम की दिशा में सुधार के लिए उनके साथ खड़ा होना चाहिए? असल जवाब दूसरा होना चाहिए।

अंत में—जनता नायकों की मूर्ती नहीं चाहती, पर वे चाहती है परिणाम। भाटी की ताक़त यही है कि उन्होंने बाड़मेर की पीड़ा को देश की राजनीति में ला दिया। उन्हें समय दें, साथ दें और उनसे जवाबदेही मांगें—इन्हीं तीनों चीज़ों से ही स्वस्थ लोकतंत्र और ठोस नतीजे मिलेंगे। विरोध करना लोकतंत्र है, पर समर्थन भी तभी वाजिब है जब वह समाधान‑उन्मुख हो। रविंद्र सिंह भाटी का संघर्ष अभी जारी है — उसे खत्म करने की कोशिश करने से बेहतर है कि हम उसे दिशा दें और स्थानीय हितों को परिणामों में बदलने में साथ दें।
✍️
नरपत सिंह शेखावत
゚viralシ #

"सनातन को सबसे अधिक क्षति ब्राह्मण जाति मात्र से नहीं, बल्कि पुरोहिती वर्चस्व, कर्मकांड-व्यापार और मध्यस्थता-प्रधान पंडा...
19/05/2026

"सनातन को सबसे अधिक क्षति ब्राह्मण जाति मात्र से नहीं, बल्कि पुरोहिती वर्चस्व, कर्मकांड-व्यापार और मध्यस्थता-प्रधान पंडावादी संस्कृति से हुई।”
゚viralシ

आज ही के दिन 17 मई 1933 को 28 वर्ष की आयु में अंडमान पोर्ट ब्लेयर की जेल में कालापनी की सजा के दौरान भूख हड़ताल कर रहे म...
18/05/2026

आज ही के दिन 17 मई 1933 को 28 वर्ष की आयु में अंडमान पोर्ट ब्लेयर की जेल में कालापनी की सजा के दौरान भूख हड़ताल कर रहे महावीर सिंह राठौड़ देश के लिए बलिदान हो गए थे।

हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशिएशन एवं भारत नौजवान संघ के अमर क्रांतिकारी महावीर सिंह राठौड़ जी के बलिदान दिवस पर उनके चरणों में शत शत नमन।

महावीर सिंह राठौड़ ने 18 वर्ष की आयु में ही जनवरी 1922 में, ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रारंभिक विद्रोह का प्रदर्शन किया।

1928 तक, अपनी पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह क्रांतिकारी गतिविधियों में जुट चुके महावीर सिंह राठौड़ ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के उन मूल सिद्धांतों को आत्मसात कर लिया था, जो साम्राज्यवाद के विरुद्ध सशस्त्र प्रतिरोध और सामाजिक समानता पर आधारित थे। इसका प्रमाण 1930 में उनके द्वारा सह-हस्ताक्षरित उस घोषणापत्र से मिलता है, जिसमें कहा गया था— “हम एक व्यापक परिवर्तन के पक्षधर हैं… ऐसा परिवर्तन जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को असंभव बना दे।”

इस वैचारिक परिवर्तन में जातिगत भेदभाव की स्पष्ट आलोचना, धर्म के रूढ़िवादी स्वरूप को उत्पीड़न का साधन मानना, तथा पर्दा प्रथा जैसी लैंगिक सामाजिक मान्यताओं का विरोध भी शामिल था। इसके स्थान पर वे महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक समानता के समर्थक थे। ये विचार उनके 1930 और 1932 के व्यक्तिगत पत्रों में स्पष्ट रूप से व्यक्त हुए हैं।

1928 में वे लाहौर चले गए, जहाँ उन्होंने “मोजंग हाउस” किराए पर लिया। यह स्थान एचएसआरए के सदस्यों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में उपयोग किया जाता था। यहीं से 17 दिसंबर 1928 को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की योजना की तैयारियों में सहायता दी गई। यह कार्रवाई औपनिवेशिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध के रूप में की गई थी।
सॉन्डर्स हत्या के बाद महावीर सिंह ने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और दुर्गावती देवी को मोजंग हाउस से सुरक्षित निकलने में सहायता की। उन्होंने उनके लिए परिवहन, भेष बदलने और अन्य व्यवस्थाएँ कीं, जिससे वे तत्काल ब्रिटिश गिरफ्तारी से बच सके।

सिंह के भगत सिंह के साथ संबंध केवल वैचारिक नहीं थे, बल्कि वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की क्रांतिकारी कार्रवाइयों में सक्रिय सहयोगी भी थे। 1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की योजना बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह कार्रवाई लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध स्वरूप की गई थी, हालांकि इसका वास्तविक निष्पादन भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और चंद्रशेखर आज़ाद ने किया था।

उन्होंने संगठन की गतिविधियों को जारी रखने के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने में भी योगदान दिया। इसके अंतर्गत पंजाब नेशनल बैंक जैसी संस्थाओं को निशाना बनाकर डकैती की योजनाएँ भी प्रस्तावित की गई थीं। 5 मई 1930 को सिंह ने भगत सिंह और संगठन के अन्य सदस्यों के साथ एक संयुक्त वक्तव्य पर सह-हस्ताक्षर किए, जिसमें चल रहे मुकदमों के बीच भी क्रांतिकारी सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई गई।

एटा, उत्तरप्रदेश में जन्में ठाकुर महावीर सिंह राठौड़ को
वर्ष 1929 में श्री महावीर सिंह राठौड़ को लाहौर षडयंत्र केस में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। लाहौर जेल में कुछ समय बाद महावीर सिंह राठौड़ को 1930 में बल्लारी सेंट्रल जेल (मैसूर) और फिर मद्रास जेल भेज दिया गया। जनवरी 1933 में, महावीर सिंह को 'साजा-ए-कालापानी' के तहत अंडमान के पोर्ट ब्लेयर जेल में भेज दिया गया था। अंडमान की यह जेल घोर यातना का प्रतीक थी। जेल अधिकारियों के साथ हो रहे अन्याय और अमानवीय व्यवहार के खिलाफ महावीर सिंह जी ने अनशन जारी रखा।

12 मई 1935 को सभी राजनीतिक कैदी अपनी मांगों को लेकर जेल में अनशन पर चले गए। अनशन के छठे दिन से जेल प्रशासन ने जबरदस्ती खाना शुरू कर दिया। आधे घंटे की मशक्कत के बाद 10-12 लोगों ने मिलकर महावीर सिंह को जमीन पर बिठाया, जिसके बाद डॉक्टर ने उनके सीने पर एक घुटना लगाकर नाक के अंदर ट्यूब डाल दी. उन्होंने नहीं देखा कि ट्यूब उनके पेट के बजाय महावीर सिंह के फेफड़ों में चली गई है। 1 लीटर दूध उनके फेफड़ों में चला गया, जिससे 17 मई 1933 को भारत के सपूत श्री महावीर सिंह राठौड़ देश के महान कार्य के लिए शहीद हो गए।

18/05/2026

सुनी सुनाई बातों की बजाय रिसर्च करके लिखा जाता तो भारत का इतिहास कुछ और होता।
कुंवर नरपत सिंह "नादान"

18/05/2026

मेरा साफ़ मानना है कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था ने जातिगत ढांचे को तोड़ने के बजाय उसे और अधिक जिंदा, गहरा और राजनीतिक बना दिया है। जिस व्यवस्था का नाम सामाजिक न्याय रखा गया, वही आज कई जगह सामाजिक दूरी का सबसे बड़ा कारण बनती दिख रही है। जाति को मिटाने के बजाय बार-बार सरकारी फॉर्मों, चयन प्रक्रियाओं, राजनीति, प्रतिनिधित्व और लाभ-हानि की भाषा में दोहराया जा रहा है, जिससे समाज में बराबरी नहीं, बल्कि नई-नई रेखाएँ खिंचती जा रही हैं। जो व्यवस्था इंसान को उसकी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ाने के लिए बननी चाहिए थी, वह कई बार जाति को फिर से पहचान, शक्ति और सौदेबाज़ी का हथियार बना देती है। सच यह है कि आरक्षण ने कुछ वर्गों को अवसर देने का काम तो किया, लेकिन उसी के साथ उसने जाति को मिटाने के बजाय उसे और अधिक संगठित, संवेदनशील और स्थायी बना दिया। इसलिए अब समय है यह ईमानदार सवाल पूछने का कि क्या यह व्यवस्था बराबरी ला रही है, या जातिवाद को नया जीवन देकर समाज को और ज्यादा बाँट रही है? अगर बीमारी को खत्म करने की बजाय हम हर बार उसका नाम लिखते रहेंगे, तो समाज कभी स्वस्थ नहीं होगा।
✍️
कुँ नरपत सिंह "नादान"

17/05/2026

क्या यही है आज का भारत?
जहाँ जाति अब भी इंसान की पहचान से बड़ी बना दी जाती है,
जहाँ किसी मासूम बच्ची की चीख़ खबर बनकर भी जल्दी भुला दी जाती है,
जहाँ अन्याय के खिलाफ उठी आवाज़ को भी कभी-कभी शांति के नाम पर दबा दिया जाता है,
और जहाँ उग्रता को जड़ से खत्म करने के बजाय उसे बस कागज़ी बयानबाज़ी में ढक दिया जाता है।
आज हालात ऐसे हैं कि एक तरफ समाज में जातिवादी घटनाएँ फिर से सिर उठा रही हैं,
तो दूसरी तरफ बेटियों की सुरक्षा पर सवाल हर दिन और भारी होते जा रहे हैं।
कहीं अपमान, कहीं उत्पीड़न, कहीं डर, कहीं चुप्पी —
और इन सबके बीच इंसानियत बस बयान बनकर रह जाती है।
जो लोग सच के लिए बोलते हैं, उन्हें या तो समझाया जाता है या दबाया जाता है।
जो लोग आवाज़ उठाते हैं, उनकी बात सुनने के बजाय अक्सर माहौल को “शांत” करने के नाम पर मुद्दे को ही ढक दिया जाता है।
और ऊपर से राजनीति की उठा-पटक देखिए —
कभी कुर्सी के लिए गठजोड़, कभी कुर्सी के लिए तोड़फोड़,
कभी जनता के नाम पर नारे, कभी जनता के ही ज़ख्मों पर सौदेबाज़ी।
न्याय की जगह सत्ता का हिसाब चलता है,
और व्यवस्था की जगह केवल बयानबाज़ी बचती है।
इन सबके बीच कई बार मन कहता है — शायद जगह बदलना मेरा गलत फैसला नहीं था।
क्योंकि जहाँ मैं अभी हूँ, वहाँ कम-से-कम हर दिन जाति, असुरक्षा, भीड़-मानसिकता और राजनीतिक तमाशे का यह बोझ नहीं उठाना पड़ता।
वहाँ सांस लेना आसान है, सोच पाना आसान है, और सबसे बड़ी बात — डर के साथ जीना नियम नहीं है।
लेकिन सवाल सिर्फ जगह का नहीं है@।
सवाल उस समाज का है जो रोज़ गिरते स्तर को भी “सामान्य” मानने लगा है।
सवाल उस व्यवस्था का है जो बच्चियों की सुरक्षा पर भाषण तो देती है, पर ज़मीन पर जवाब कम देती है।
सवाल उस राजनीति का है जो हर बार आग बुझाने के बजाय उसे अपने फायदे के मुताबिक दिशा देने की कोशिश करती है।
देश का पतन तब शुरू होता है जब अन्याय देखकर भी लोग चुप रहना सीख जाते हैं।
और आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है —
हम घटनाओं से चौंकते हैं, कुछ दिन बोलते हैं, फिर भूल
जाते हैं।

13/05/2026

क्या राजपुत समाज के नेताओं के पिंडदान हो चुके है? #राजपूत

 ाधव_स्कूल और  #तिहावली_हत्या_कांड दोनों मामले में    #राजपूत  #समाज के  #राजनैतिक और  #सामाजिक  #नेताओं और  #कार्यकर्ता...
11/05/2026

ाधव_स्कूल और #तिहावली_हत्या_कांड दोनों मामले में #राजपूत #समाज के #राजनैतिक और #सामाजिक #नेताओं और #कार्यकर्ताओं की #चुप्पी हैरत में डालने वाली है। आखिर इस चुप्पी का #राज क्या है?

11/05/2026

पंकु को न्याय दिलाने वाले जरा इधर भी देख लो।

!! कुण कुण जाणे पीथळ न !!
09/05/2026

!! कुण कुण जाणे पीथळ न !!

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