09/05/2026
# जब श्रीकृष्ण ने पहली बार यशोदा मैया को “माँ” कहा ❤️
गोकुल की वह सुबह बहुत ही अलौकिक थी।
नंद भवन के आँगन में हल्की-हल्की धूप उतर रही थी। पक्षियों का मधुर स्वर वातावरण को और भी पवित्र बना रहा था। यशोदा मैया अपने नन्हे कान्हा को गोद में लेकर धीरे-धीरे झुला रही थीं।
कान्हा अभी छोटे थे। उनकी मीठी मुस्कान पूरे ब्रज को मोहित कर देती थी।
यशोदा मैया दिन-रात बस एक ही प्रयास करतीं — “कब मेरा लाल मुझे माँ कहकर पुकारेगा?”
हर दिन वे कान्हा के सामने बैठकर कहतीं —
“लाला… बोलो… माँ…”
कृष्ण बस मुस्कुरा देते, कभी उनकी उँगली पकड़ लेते, तो कभी अपनी नन्ही आँखों से उन्हें निहारते रहते।
एक दिन की बात है…
मैया रसोई में माखन बना रही थीं। तभी नन्हे कृष्ण घुटनों के बल चलते हुए वहाँ पहुँचे। उनके पैरों में बंधी पायल की मधुर ध्वनि पूरे घर में गूँज रही थी।
कृष्ण ने मटकी की ओर देखा, फिर यशोदा मैया की ओर।
मैया ने प्रेम से पूछा —
“क्या चाहिए मेरे लाल को?”
तभी अचानक कान्हा ने अपने छोटे-छोटे होंठ खोले…
और पहली बार कहा —
“माँ…”
बस…
वह एक शब्द सुनते ही समय जैसे थम गया।
यशोदा मैया की आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने तुरंत कान्हा को अपनी गोद में उठा लिया और सीने से लगा लिया।
उन्हें ऐसा लगा मानो पूरे ब्रह्मांड की सारी खुशियाँ उन्हें मिल गई हों।
जिस प्रभु के नाम का जाप देवता करते हैं…
जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं…
वही स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आज उन्हें “माँ” कहकर बुला रहे थे।
उस क्षण में न कोई वैकुंठ था, न कोई ऐश्वर्य…
था तो केवल एक माँ का निष्कलंक प्रेम।
कहते हैं, उस दिन ब्रज में बहने वाली हवा भी भाव-विभोर हो गई थी।
गायें रंभाने लगीं, वृक्ष झूम उठे, और देवताओं ने पुष्प वर्षा की।
क्योंकि उस दिन परमात्मा ने स्वयं प्रेम के आगे अपना सिर झुका दिया था।
श्रीकृष्ण ने संसार को यह सिखाया कि —
“भगवान को केवल ज्ञान, तप या शक्ति से नहीं…
बल्कि एक माँ के निष्कपट प्रेम से भी बाँधा जा सकता है।”
राधे राधे ❤️