17/05/2026
मान धर्यो मनमोहिनी प्यारी, घन-निभृत निकुंज अँधियारी।
विटप-वितान बिलसत छाया, झरति सुधा ससि रजनी प्यारी॥
बैठी राधा तिरछे दृग धारि, अधर अरुण, उर अंतर भारी।
कुंचित भ्रुकुटि, कुटिल मुसुकानि, आगम पिय को निहारी॥
आवत श्याम सरस सुघराई,
मृदु मनुहार करत बनवारी॥
कसुम्बी पाग सिर, चंद्रिका सुँहारी,
कटि पट सोहत श्याम मुरारी॥
अंतर हास, बहिरंग रोष, यह प्रणय-मान गति अति न्यारी।
कहै ‘दास’ मिलि हँसि दुहुँ मुख, बरसै प्रेम सुधा सुखकारी॥
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