22/04/2020
कहानी जारी है.......
किस्सा पैराग्लाइडिंग का पार्ट 2
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अब हमारा मन पैराग्लाइडिंग करने का होने लगा,और अंदर से रोमांच का तूफान भी उमड़ रहा था। कुछ देर बाद भीमताल कस्बा नजदीक आ चुका था, उड़ती हुई ग्लाइडर भी अब दिखाई देना बन्द हो चुकी थी। नगर में पहुँचते ही ध्यान खुद ब खुद झील की तरफ खींचा चला जाता है। सड़क झील के साथ ही चलती है, जहॉ से पूरी झील को निहारा जा सकता है । भीमताल के अन्तिम छोर से एक रास्ता,उपर नौकुचियाताल की तरफ जाता है। उस रास्ते में आगे बढ़ते हुए, थोड़ी देर बाद ही हमारे सिरो के उपर से गुजरते हुए ग्लाइडर दिखाई देने लगे। लाल, हरे, नीले छतरियो को ध्यान से देखने पर उनमे हमे दो लोग दिखाई दिये।हमने फैसला लिया कि पहले हम कुछ देर इन ग्लाइडरो के उड़ने का तरीका देखेंगे अगर कुछ गड़बड़ नहीं हुई तो फिर पैराग्लाइडिंग करने की सोचेंगे।
काफी देर बाद तक, जब सब कुछ ठीक रहा तो मैने फैसला लिया की, मैं तो पैराग्लाइडिंग करूंगा ,लेकिन विनोद का मन अब भी तैयार नहीं था। मालूम करने पर पता चला कि एक राइड का चार्ज 1500 रू है। थोड़ा आगे की तरफ जाने पर दूसरा प्वाइंट मिला,उससे मिलकर बात करने पर रेट 1000 रू तय किया। जिसमें राइड+ रिकार्डिंग (CD) शामिल थे। रजिस्ट्रेशन काउंटर पर पहले तो वेट चैक किया गया । पैराग्लाइडिंग के लिये वेट का मैक्सिमम कट ऑफ 90 kg था, उसके बाद फिर एक पेपर दिया, जिसमे अपना नाम, पता, मोबाइल नं वगैरा भरना था। यह एक प्रकार का डेथ कंसेंट ही था।
खैर टिकट की फॉरमैलिटी के बाद हम दोनों 100 मीटर उचांई की तरफ बने पैराग्लाइडिंग टेक ऑफ प्वांइट की तरफ गये। मेरे से पहले दो और लोग भी थे, जिन्हें पैराग्लाइडिंग करनी थी। उस बने हुए प्लेटफार्म की तरफ उठता हर एक कदम दिल में DJ की तरह बज रहा था। तभी पैराग्लाइडर को लेकर एक बंदा दौड़ा और पीछे रह गयी सिर्फ रोमांच से भरी एक चीख। हमने एक दूसरे को देखा और तब पता चला कि जैसे खुशी के ऑसू होते हैं, ठीक वैसे ही बेवकूफ़ी और डर की हँसी भी होती है, जिसे हम उस समय महसूस कर रहे थे। फिर विनेद ने एसे मौके पर एक खतरनाक डायलॉग बोल कर मुझे और सोच में डाल दिया।
"आज हम दोनो में से जो भी जिन्दा बचेगा, उसे ज़िन्दगी भर हम दोनो के घरवालो के दिलो से गालियॉ पड़ेंगी"
"कुछ नहीं होगा यार"
बस, इस एक लाइन ने, ना जाने कितने सौ सालो से, कितनी ही जवान ज़िन्दगीयों को हर उस काम को करने के लिये उकसाया है, जिसे वो अपने मन से तो कभी ज़िन्दगी भर कर ही नही पाती।
मैने दूसरी तरफ देखा तो एक बंदा हाथों मे ग्लाइडिंग गेयर लेके खड़ा था, वो शिवू था, मेरे ग्लाइडर का पायलट।
" ये, तो छोटी राइड है,सर, हम तो तीन हजार फुट से पैराग्लाइडिंग कराते हैं।", मुझको बैगपैक की तरह का सेफ्टी गेयर पहनाते हुए शिवू बता रहा था । विनोद पूरे प्रोग्राम की वीडियो बना रहा था। मुझे हैलमेट पहनाने के बाद, शिवू ने खुद को भी ग्लाइडर के स्ट्रैप्स के साथ फ़िक्स करना शुरू किया। सर..,मेरे..गो कहते ही दौड़ना शुरू कर देना। अब यहॉ से मेरी, दिल की धड़कने मुझे जोरो से सुनाई दे रही थी।
"ऑल द बेस्ट, अपना अनुभव हमें भी बताना", मेरा हौसला बढ़ाने के लिए विनोद बोला, शायद मन में वो भी कहीं न कहीं डरा हुअ था।
मैं उसे सैल्यूट करते हुए, मुस्कुराया लेकिन कुछ बोल न सका,शायद डर कुछ ज्यादा ही हावी हो चुका था।
1.2..3...कहते ही शिवू जोर से बोला,"गो... "
इससे पहले की, मैं कुछ समझ पाता, मेरे पैर जमीन को छोड़ चुके थे।
कहते हैं कि हादसो पर किसी का जोर नहीं होता, लेकिन जानबूझ कर अपना डेथ कंसेंट दे देना, पागलपन नहीं तो और क्या था।
पीछे छूट चुकी जमीन के साथ ही मैं कुछ लॉजिक भी छोड़ चुका था, जिनका होना या ना होना अब एक ही था। एक एसी हकीकत जिसे मैने पढ़े लिखे होते हुए भी सिर्फ जोश के नाम पर नजरंदाज कर दिया कि, सेफ्टी के लिए शायद वहॉ कोई एेंबुलेंस भी ना थी। वो सच्चाई कि,
एडवेंचर के नाम पर हम क्या करने जा रहें हैं , इस बारे में हम दोनो के घरवालो को कुछ पता ही नहीं था।
अब सच्चाई सिर्फ ये थी कि,मैं ,हवा में.. था, और एक 20-25 फुट लम्बे सिंथेटिक के कपड़े से, बँधी रस्सियों के सहारे तैर रहा था। जिसकी डोर भी किसी और के हाथों मे थी...., जिसे मैं शायद मुश्किल से सिर्फ पंद्रह मिनट पहले ही मिला था। खेत, सड़के, इमारते, टॉवर, पेड़ और चिड़िया.... पूरा शहर .....,इस एक पल में,मैं, इन सबसे उपर उठ चुका था। मैं ना हवा को सिर्फ महसूस कर रहा था ब्लकि ग्लाइडर से टकराने वाली तेज हवा को सुन भी रहा था। दूर देखने पर नौकुचियाताल और भीमताल की झीले भी नजर आ रही थी। अब जाकर दिल की धड़कने कुछ नॉर्मल हुई। चेहरे पर मुस्कान लौट चुकी थी। हवा में तैरते बादल जैसे मेरे पास ही थे, पहाड़ की ऊँची चोटीयॉ, अब ज्यादा उँची नही रही। मन में एक अलग सुकून था। यह सच में खुद के भरोसे ना हो पाता, एेसा लग रहा था कि,शिवू की कही गई वो बात, मेरे तमाम लॉजिक पर भारी पड़ रही थी, दोस्तों सच में वो नजारा जन्नत ही था।
सर अब कुछ स्टंट कर लें",शिवू ने भरोसा दिलाते हुए कहा।
"कहॉ से है, भाई...... और कब से चला रहे हो इसे? " मैने उससे पूछा
"हिमॉचल से हूँ,सर, पहले वहीं ग्लाइडर उड़ाता था, अब कुछ महीनो से यहीं हूँ, टोटल छः साल हो गये हैं ।"
हिमॉचल के बीर बिलांग की पैराग्लाइडिंग के बारे में मैने किसी से सुना था, तो दिल में थोड़ी तसल्ली हुई।
"एक्सपिरियंस तो काफी है आपको, बुरा ना मानो तो एक बात पूँछू ",
अगर आप जमीन से सैकड़ौ फुट उपर हो ,और उस पर, आपकी ज़िन्दगी की डोर किसी और के हाथों मे हो तो, एेसी फॉरमैसिटी करनी बहुत ज्यादा जरूरी हो जाती है।
"पूछिये, सर"
"कभी, गिरे हो क्या? "
शिवू जोर से हँसा और बोला, "सर, पैराग्लाइडिंग करने का यही तो मजा है, पैराग्लाइडिंग करने वाला सिर्फ एक ही बार गिरता है और अभी मेरा वो टाइम नहीं आया है।"
सैकड़ौ पुट की उँचाई पर ठहाके लगाने वाले का सीना भी उसी चट्टान की तरह मजबूत हो सकता है, जिनके उपर से अभी हम गुजर रहे थे ।
मेरे स्टंट के लिए,हॉ कहते ही, एक झटके से पूरी, दुनिया उल्टी हो गयी।मेरी हालत का अंदाजा, आप कोल्ड ड्रिंक की उस बोतल से लगा सकते हैं जिसे मुँह के बल खड़ा कर दिया हो।
आसमान को ऑखे खोलकर अपने पैरों के नीचे देखने की हिम्मत मुझमे तो नही थी।
"घबराना मत सर, पैसे तो सब कमा लेते हैं, पर ये लाइफ टाइम मोमेंट है, सर ...., हर किसी को नहीं मिलता। सिर्फ दो राउंड और, फिर हम लैंड कर जाएंगे सर"
ऑखे खोलने पर सूरज की चमकती तेज रोशनी, आसमानी और हरा रंग सब घूमते हुए, नजर आ रहे थे। ग्लाइडर के घूमते ही सारा सर्कुलेशन सिर की तरफ शिफ्ट हो जाता और दो सेकेंड के लिये पॉव सुन्न हो जाते।
अचानक लास्ट स्टंट पूरा हुआ और ग्लाइडर सीधा हो गया, अब हम लैंडिंग जोन की तरफ जा रहे थे।
"सर, पॉव सीधे रखियेगा नहीं तो चोट लग सकती है।"
पायलट की हर बात को मानना, पुराणों मे इसे ही धर्म बताया गया है।
"पॉव सीधे रखियेगा, सर," उसने फिर कहा।
फिर भी, लैंडिंग के समय ,मैने, अपना दॉयॉ पॉव जमीन से छू दिया, जानबूझकर नही, रिफलेक्स मैकेनिज्म के कारण । इस प्वांइट पर मेरे दिमाग ने चाहते हुए भी शिवू की बात को नहीं माना। लैंडिंग हो चुकी थी, मेरे दॉये पैर में जर्क पड़ चुका था।
शिवू, राइडिंग गेयर मुझसे अलग करते हुए बोला,"पॉव टूट सकता था, सर, मैने बोला था, सीधा रखने को"
मै उठा और चल कर देखा पॉव ठीक था, लेकिन हल्का सा दर्द था।
थोड़ा आगे जाने पर, एक जिप्सी आपको लेने आयेगी।" थैंक्यू कहते हुए शिवू चला गया।
मेरी जीन्स की पॉकेट में फोन बजा, स्क्रीन पर एक बार फिर से विनोद का नाम और नं लिखा आ रहा था । मैने सामने की तरफ पहाड़ी पर बने प्लेटफार्म की तरफ देखते हुए फोन उठाया।
"अबे, जिन्दा है?", विनोद ने हँसते हुए पूछा।
मैने हवा मे हाथ हिलाते हुए कहा, "हॉ"
शायद वो मुझे देख पा रहा था।
पंद्रह मिनट में, मैं, दोबारा से उसी टेक ऑफ प्वांइट पर पहुँच चुका था। वहॉ पहुँचने पर पता चला कि, विनोद ने भी रजिस्ट्रेशन करा लिया है, शायद शिवू की बात सच में काम कर चुकी थी ।हवा में स्टंट लेते विनोद के ग्लाइडर को देखते हुए मुझे याद आ रहा था कि अभी घंटे भर पहले विनोद खुद मुझे बता रहा था कि उसे बड़े वाले गोल झूले में बैठने पर ही अजीब घबराहट होने लगती है, और अब वो खुद ही रॉकेट बना हुआ था। वो खुश था। पैराग्लाइडिंग पूरी हो चुकी थी।
आज भी जब उस पल को याद करता हूँ तो वो सब एक सपना लगता है। लगता है कि, किसी ने एड्रीनलिन की ढेरों सुईयॉ एक साथ चुभा दी हों। आज भी कभी ,जब लगता है की ,कहीं टेक ऑफ से पहले कही, विनोद की बात सच हो जाती तो, दिल दहल जाता है । ज़िन्दगी में, एक बार में, शायद एक ही चीज मिल सकती है पहली जिम्मेदारी, केयर या चिंता , या फिर पागलपन, बेवकूफ़ी और खुशी।
हमने लास्ट वाले को चुना।
लेकिन हॉ..... कभी-कभी जिम्मेदारी और केयरनेस को चुनना ही समझदारी होती है।हम तो शायद खुशकिस्मत बेवकूफ थे।
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धन्यवाद