Rangbhoomi

Rangbhoomi We are a professional theatre ensemble. Our company was founded in 1993. We produce a wide variety of plays and tour extensively throughout India.

In the last 22 years we have been successful in upholding the grandeur of Hindi Theatre, by sharing stories that endure and making theatre accessible to people from all walks of life. We are committed to producing highest quality theatre with finest artists. Rangbhoomi has been fortunate to be a part of almost all the major national theatre festivals, not only in Delhi but all over the country. Ra

ngbhoomi has the honor of participating in the opening ceremony of Common Wealth Games 2010, with 500 artists. For us it’s all about you. Everything we do—every story we tell, every production we assemble, every experience we create in our plays—is about you.

28 दिसम्बर 25, आज रंगभूमि की बैठक हुई। आगे की योजना बनायीं गई। 15 जनवरी 26, से नाटक की रिहर्सल आरम्भ होगी।
29/12/2025

28 दिसम्बर 25, आज रंगभूमि की बैठक हुई। आगे की योजना बनायीं गई। 15 जनवरी 26, से नाटक की रिहर्सल आरम्भ होगी।

24/10/2025
आज रमेश मेहता लिखित हास्य नाटक अंडर सेक्रेटरी की रीडिंग कलाकारों द्वारा की गई। कलाकारों की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी रही।
06/10/2025

आज रमेश मेहता लिखित हास्य नाटक अंडर सेक्रेटरी की रीडिंग कलाकारों द्वारा की गई। कलाकारों की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी रही।

युगपुरुष नाटक के एक दृश्य में परमहंस के रूप में विपिन कुमार और विवेकानंद की भूमिका में सुधीर रिखारी।
14/09/2025

युगपुरुष नाटक के एक दृश्य में परमहंस के रूप में विपिन कुमार और विवेकानंद की भूमिका में सुधीर रिखारी।

युगपुरुषअनिल गोयल         भारतवर्ष में गुरु-शिष्य परम्परा अनादि काल से चली आ रही है।  ऋषि वशिष्ठ और चाणक्य से लेकर वीर श...
02/09/2025

युगपुरुष
अनिल गोयल
भारतवर्ष में गुरु-शिष्य परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। ऋषि वशिष्ठ और चाणक्य से लेकर वीर शिवाजी के गुरु समर्थ गुरु रामदास तक हजारों नाम हमारे सामने हैं। कबीर ने कहा है, ‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय, बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविन्द दियो मिलाय’। बहुत सन्तोष का विषय है कि यह परम्परा आज तक भी उसी प्रकार से अखण्ड अक्षुण्ण चली आ रही है।
आधुनिक समय में इस गुरु-शिष्य परम्परा का एक अनूठा उदाहरण हमें परमहंस श्रीरामकृष्णदेव और उनके सर्वप्रिय शिष्य नरेन्द्रनाथ में देखने को मिला, जिन्होंने कालान्तर में स्वामी विवेकानन्द के नाम से पूरे विश्व में ख्याति पाई। ‘नरेन्द्रनाथ का विश्वास दर्शन में था। श्रीरामकृष्णदेव ने उन्हें बताया कि जहाँ दर्शन का अन्त होता है, वहीं से अध्यात्म का शुभारम्भ होता है। प्रायः ही शिष्य अपने गुरु से मिलने के लिये लालायित रहते हैं, तरसते रहते हैं। यहाँ पहली बार देखने को मिला कि गुरु श्रीरामकृष्णदेव अपने शिष्य नरेन्द्रनाथ से मिलने के लिये तड़पते थे, और उसके न आने पर अकेले में रोते थे।’
इन्हीं गुरु-शिष्य रामकृष्ण और नरेन्द्रनाथ के परस्पर के व्यक्तिगत, आत्मिक और आध्यात्मिक सम्बन्धों की कहानी को रंगभूमि रंगसमूह के जे.पी. सिंह ने 18 अगस्त 2025 को दिल्ली के कमानी प्रेक्षागृह में प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुति भीलवाड़ा ग्रुप के सौजन्य से प्रस्तुत की गई।
इस नाटक को जे.पी. सिंह ने स्वयं लिखा, जो जयवर्धन के नाम से लिखते हैं। नाटक में उन्होंने अपने को श्रीरामकृष्णदेव और नरेन्द्रनाथ के परस्पर सम्बन्धों को दिखाने तक ही सीमित रखा है, और इसीलिये इस नाटक में स्वामी विवेकानन्द का नाम आखिरी दृश्य में एक उल्लेख को छोड़ कर कहीं प्रयोग नहीं किया गया है, जो नाम उन्हें रामकृष्ण परमहंस के एक गुरुभाई ने बाद में कभी दिया था, और जिस नाम से वे संसार में जाने गये।
नाटक के कथानक का मूलाधार है गुरु और शिष्य की आध्यात्मिक जुगलबन्दी। गुरु-शिष्य की इस जुगलबन्दी को मंच पर निभाने का काम अभिनेताओं का था। नाटक में रामकृष्ण परमहंस की भूमिका विपिन कुमार ने और नरेन्द्रनाथ की भूमिका सुधीर रिखारी ने निभाईं। मुझे यह कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं है कि विपिन और सुधीर, दोनों ही ने अपने दायित्व को पूरी सफलता के साथ निभाया। मैं विपिन को अनेक वर्षों से अनेक विशाल व्यक्तित्वों की भूमिकाएँ निभाते देखता आया हूँ, अतः शंका थी कि क्या विपिन उन सब विशाल व्यक्तित्वों के प्रभावों से बाहर आकर रामकृष्ण परमहंस की एक बिल्कुल अलग ढंग की भूमिका में अपने को डुबा सकेंगे। लेकिन उन सब से बाहर निकल कर विपिन अपने को इस भूमिका में ढाल सके, यही एक अच्छा अभिनेता होने का चिन्ह है। सुधीर रिखारी संगीत के विशद ज्ञाता हैं, अतः जिस चीज की नरेन्द्रनाथ की भूमिका में उनसे अपेक्षा थी, वह तो उन्होंने किया ही। लेकिन प्रारम्भ में जिस प्रकार की असहजता नरेन्द्रनाथ को श्रीरामकृष्णदेव के अपने प्रति अति-स्नेह से रही होगी, उसे प्रस्तुत करके, और फिर बाद में उन्हीं श्रीरामकृष्णदेव के माध्यम से आध्यात्मिकता के उच्च स्तर को प्राप्त कर लेने के बाद उस असहजता में से बाहर आकर, गुरु के अपने प्रति स्नेह में स्वयं भी लीन हो जाने के क्षणों को सुधीर ने जिस प्रकार से जिया है, वह देखते ही बनता था! उनका मधुर गायन तो जैसे इस पूरे नाटक की जान ही रहा। इन दोनों को ही बाकी सभी अभिनेताओं का भी पूर्ण सहयोग मिला। इस प्रकार से यह नाटक अभिनेताओं और निर्देशक के मिले-जुले प्रयासों से एक उत्कृष्ट प्रस्तुति बनने का एक सुन्दर उदाहरण है।
स्वामी विवेकानन्द के रूप में भानु प्रताप सिंह, सुरेन्द्रनाथ के रूप में शुद्धो बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ की पत्नी के रूप में तृप्ति जौहरी, और शारदा माँ के रूप में दीप्ति शर्मा मंच पर रहीं। मंच परिकल्पना (सैट) और प्रकाश परिकल्पना जे.पी. सिंह की स्वयं की थी। संगीत भारती डांग का था।
नाटक में जे.पी. सिंह ने विजुअल प्रोजैक्शन या चाक्षुष प्रक्षेपण (दृश्य प्रक्षेपण) का बहुत सुन्दर प्रयोग किया। नाटक के सुन्दर और मोहक ग्राफिक्स को आख्या जयवर्धन ने बहुत कुशलता के साथ तैयार किया था, जिसने नाटक को एक उच्च स्तर की भव्यता प्रदान की। विजुअल प्रोजैक्शन के साथ शरद कुलश्रेष्ठ के लाईट एग्जीक्यूशन ने नाटक को एक अद्भुत अनुभव में बदल दिया था। सैट वेद पाहूजा ने तैयार किया, मुखसज्जा हरिश खोलिया की, तथा विजुअल प्रोजैक्शन सनोबर बारी का रहा।
नाटक में चाक्षुष प्रक्षेपण के प्रयोग पर पिछले वर्षों मे बहुत से प्रश्न उठते रहे हैं। लेकिन साधन उपलब्ध होने पर कोई नाट्य-निर्देशक चाक्षुष प्रक्षेपण के प्रयोग से कैसे अपने नाटक में भव्यता ला सकता है, यह इस प्रस्तुति में देखने को मिला। जब श्रीरामकृष्णदेव तीन बार नरेन्द्रनाथ को तीन बार अपने पैर के अंगूठे से स्पर्श करके अखिल ब्रह्माण्ड के दर्शन करवाते हैं, तब मंच के एकदम पीछे विशालाकार विद्युत-पर्दों पर कैसे पूरा ब्रह्माण्ड आलोकित हो उठता है, वह दृश्य देखते ही बनता था। इस चाक्षुष प्रक्षेपण के द्वारा ही जे.पी. सिंह ने इस नाटक में बार-बार गंगा, माँ काली के मन्दिर, ऋषि-मुनियों, कोलकता के दक्षिणेश्वर काली मन्दिर के बाहरी भागों और उसमें स्वामी रामकृष्ण परमहंस के निवास के अन्दर की बैठक, सुरेन्द्रनाथ का घर, कन्याकुमारी की शिला जिस पर बैठ कर बहुत बाद में नरेन्द्रनाथ ने तपस्या की थी, और अन्त में अमेरिका के शिकागो में स्वामी विवेकानन्द के सम्बोधन के जैसे दृश्यों को बहुत सुन्दरता और कुशलता के साथ उकेरा।
नाटक के प्रारम्भ में सभी कलाकारों के द्वारा माँ काली की पूजा, बंगाली लोक संगीत, जिसमें चैयन्य महाप्रभु के शिष्यों का पूरा दल गाता-बजाता हुआ आता है, और बाउल गायन के प्रयोग से जे.पी. सिंह ने अपनी कलात्मक अभिरुचि का परिचय दिया। इस प्रकार की विधाओं के अकारण और अप्रासंगिक प्रयोग से नाटक की मूल आत्मा को नष्ट कर देने के अनेक प्रयोग लगातार देखने को मिलते हैं; लेकिन उनके सही प्रयोग से निर्देशक कैसे नाटक को अद्भुत उँचाइयों पर पहुँचा सकता है, यह इस नाटक को देख कर समझ में आता है। सरस्वती और लक्ष्मी का मेल किस प्रकार से कलाओं में उत्कृष्टता ला सकता है, यह इस प्रस्तुति ने स्पष्ट कर दिया। इससे सरकार की कलाओं को सहायता देने की नीति के पुनरावलोकन की आवश्यकता पर भी प्रकाश पड़ता है। (पोस्टर को छोड़ कर अन्य सभी चित्र मेरे द्वारा खींचे गये हैं)

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