Puri Tourism

Puri Tourism ମୁ ଯାହା ଦେଖୁଚି ତାହା ଲେଖୁଛି ତାହା କହୁଛି..

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27/06/2026

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10/06/2026

# # स्टेशन, समुद्र और खामोशी
# # अध्याय 1

**— कुछ यात्राएँ टिकट से शुरू होकर, दिल की गहराइयों में जाकर खत्म होती हैं।**



रविवार, 29 मई 2005।

वह दिन आज भी मेरे मन में उसी ट्रेन की सीटी की तरह गूँजता है। भुवनेश्वर स्टेशन से हम "हावड़ा–कन्याकुमारी सुपरफास्ट एक्सप्रेस" में सवार हुए थे।

वह समय आज जैसा नहीं था। हाथों में स्मार्टफोन नहीं थे, इंटरनेट नहीं था, ऑनलाइन बुकिंग की सुविधा नहीं थी। टिकट कन्फर्म हुआ है या नहीं, यह जानने के लिए भी पिताजी को बार-बार स्टेशन जाना पड़ता था।

आज सोचता हूँ तो हैरानी होती है कि इतने बड़े दक्षिण भारत भ्रमण की पूरी योजना, ट्रेन के टिकट, ठहरने की व्यवस्था और खर्चों का हिसाब पिताजी ने अकेले संभाला था। उस दौर में ऐसी यात्रा की योजना बनाना सचमुच कोई छोटी बात नहीं थी।

हमारे पास पाँच टिकट थे — पिताजी, माँ, मेरे बड़े भाई, मैं और मेरे नानाजी।

भाई ने अभी-अभी बारहवीं की परीक्षा पूरी की थी और मैं आठवीं कक्षा का छात्र था। हम दोनों का उत्साह देखते ही बनता था। आखिर यह हमारी पहली लंबी यात्रा थी — ओडिशा की सीमाओं से बाहर, लगभग अठारह दिनों का एक सपनों जैसा सफर।

कुछ देर इंतज़ार करने के बाद प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर धीरे-धीरे हमारी "हावड़ा–कन्याकुमारी सुपरफास्ट एक्सप्रेस" आकर रुकी। ट्रेन आने से पहले ही हमें पता था कि हमारा कोच कहाँ लगेगा, इसलिए पिताजी हमें पहले से वहीं ले जाकर खड़ा कर चुके थे।

प्लेटफॉर्म पर चाय वालों की आवाज़ें, कुलियों की भागदौड़, यात्रियों की भीड़ और इंजन की गंभीर गड़गड़ाहट — सब मिलकर एक अलग ही उत्साह पैदा कर रहे थे।

उस समय ट्रेन की यात्रा केवल एक जगह से दूसरी जगह पहुँचना नहीं होती थी, बल्कि अपने आप में एक उत्सव जैसी लगती थी।

रात करीब साढ़े दस बजे ट्रेन चल पड़ी। धीरे-धीरे भुवनेश्वर की रोशनियाँ अंधेरे में खो गईं। ट्रेन की लयबद्ध आवाज़ और खिड़की के बाहर भागता अंधकार मेरे भीतर एक अनजाना रोमांच भर रहा था।

अगली सुबह करीब पाँच बजे ट्रेन विशाखापट्टनम पहुँची। नींद भरी आँखों से खिड़की के बाहर देखा तो स्टेशन का नाम दिखाई दिया। हिंदी और अंग्रेज़ी तो पढ़ लेता था, लेकिन उसके साथ लिखी एक दूसरी लिपि ने मेरा ध्यान खींच लिया।

वह तेलुगु थी।

यहीं से मेरा एक नया खेल शुरू हुआ। हर स्टेशन पर आने वाली तेलुगु लिखावट को मैं बड़ी उत्सुकता से देखता रहता। ऐसा लगता था जैसे मैं धीरे-धीरे भारत की एक नई दुनिया में प्रवेश कर रहा हूँ।

दोपहर में जब ट्रेन राजमुंदरी स्टेशन पार कर रही थी, तब बाहर का दृश्य बदलने लगा।

दूर-दूर तक फैले नारियल के पेड़, बीच-बीच में दिखाई देने वाले छोटे-छोटे गाँव और हवा के साथ आती नदी की मिट्टी की खुशबू मन को एक अनोखी शांति दे रही थी।

कुछ देर बाद ट्रेन जब गोदावरी नदी पर बने उस विशाल पुल पर पहुँची, तो मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

पहली बार मैं इतनी बड़ी नदी और इतना लंबा पुल देख रहा था। ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और नीचे अनंत जलराशि फैली हुई थी। सूरज की किरणें पानी पर पड़कर इस तरह चमक रही थीं, मानो हजारों चाँदी के टुकड़े नदी पर तैर रहे हों।

उस पल की अनुभूति को आज भी शब्दों में बाँधना मुश्किल है।

मन में डर भी था और एक अनोखा आनंद भी। मैं सोच रहा था — “अगर ट्रेन पानी में गिर गई तो? हम कैसे बचेंगे?”

क्योंकि हमारे परिवार में केवल पिताजी को ही तैरना आता था।

लेकिन कुछ मिनट बाद ट्रेन पुल पार कर गई और मेरे मन में फिर से सुकून लौट आया।

उस दिन रात करीब आठ बजे हमारी ट्रेन चेन्नई एग्मोर स्टेशन पहुँची।

उससे पहले मैंने कभी ऐसा स्टेशन नहीं देखा था जो पूरी तरह एक विशाल छत के नीचे ढका हो। अंदर खड़े होकर घड़ी न देखो तो समझना मुश्किल था कि बाहर दिन है या रात।

मेरे जैसे गाँव के साधारण लड़के के लिए भुवनेश्वर ही दुनिया का सबसे बड़ा शहर था। मुझे लगता था कि उससे बड़ा कुछ हो ही नहीं सकता।

लेकिन चेन्नई में कदम रखते ही पहली बार एहसास हुआ कि दुनिया हमारी छोटी-सी कल्पना से कहीं अधिक विशाल है।

पिताजी 1980 के दशक में इसी शहर में काम कर चुके थे, इसलिए तमिल भाषा में उनकी अच्छी पकड़ थी। स्टेशन से लेकर शहर की सड़कों तक, लोगों की जीवनशैली से लेकर तमिलनाडु के विकास और संस्कृति तक, वे मुझे रास्ते भर बहुत सी बातें बताते रहे।

मैं चुपचाप सब सुनता रहा और महसूस करता रहा कि मैं सचमुच एक नई दुनिया में प्रवेश कर रहा हूँ।

यात्रा के दौरान ट्रेन जहाँ भी रुकती, वहाँ जो भी खाने-पीने की चीज़ें मिलतीं, हम लगभग सब कुछ खरीदकर चख लेते।

वड़ा हो, समोसा हो, चाय हो, झालमुड़ी हो या नमक-मिर्च लगी खीरा बेचने वाला कोई फेरीवाला — उस समय हर चीज़ हमें बेहद स्वादिष्ट लगती थी।

और एक चीज़ जो शायद सबसे ज्यादा खरीदी जाती थी, वह थी पानी की बोतल।

उस दौर की ट्रेन यात्रा का मतलब ही था — हर दो घंटे बाद किसी न किसी का कहना, “पानी खत्म हो गया... एक बोतल और ले आओ!”

मज़ेदार बात यह थी कि उन अठारह दिनों में हमने जितना पानी पिया था, शायद घर पर पूरे साल में भी उतना नहीं पीते थे।

समय बिताने के लिए हम ताश भी साथ लाए थे। लगभग चालीस घंटे की उस लंबी यात्रा में “ब्रे” खेलना ही हमारा सबसे बड़ा मनोरंजन था।

कभी भाई जीतता, कभी पिताजी, और मैं अधिकतर हारने के बावजूद केवल ताश बाँटकर ही खुश हो जाता था।

यह ट्रेन में हमारी दूसरी रात थी।

शायद सबसे अधिक प्रतीक्षा वाली रात।

क्योंकि अगली सुबह हम अपने सपनों की मंज़िल — कन्याकुमारी — पहुँचने वाले थे।

यात्रा के दौरान कई अनजान लोगों से भी परिचय हुआ। कोई कन्याकुमारी का रहने वाला था, तो कोई पहले वहाँ घूमकर आ चुका था।

हैरानी की बात यह थी कि वे बिना किसी स्वार्थ के हमारी मदद कर रहे थे। कहाँ ठहरना बेहतर होगा, कौन-सा होटल सस्ता है, कौन-कौन सी जगह पहले देखनी चाहिए — वे बड़ी आत्मीयता से सब बता रहे थे।

आज उनके नाम याद नहीं हैं, लेकिन उस यात्रा में मिले उन अजनबियों का अपनापन आज भी मेरे मन में ताज़ा है।

अगली सुबह करीब सात बजे ट्रेन मदुरै पहुँची। अब उत्साह और बढ़ गया था, क्योंकि हम जानते थे कि कुछ ही घंटों में भारत के अंतिम छोर — कन्याकुमारी — पहुँचने वाले हैं।

बातों-बातों में पिताजी बता रहे थे कि वापसी में मदुरै रुककर माँ मीनाक्षी मंदिर भी देखेंगे।

और मैं खिड़की के बाहर देखते हुए बस यही सोच रहा था — क्या सचमुच हम इतनी दूर आ गए हैं?

पता ही नहीं चला कि बातचीत के बीच ट्रेन नागरकोइल स्टेशन पहुँच गई।

वहाँ से अगला और अंतिम स्टेशन था — कन्याकुमारी।

यह सुनते ही मन में खुशी की एक लहर दौड़ गई। इतने दिनों की प्रतीक्षा और इतना लंबा सफर... अब मंज़िल बस कुछ ही मिनट दूर थी।

अचानक मुझे पुरी की यात्राएँ याद आ गईं। जैसे पुरी से पहले मालतीपाटपुर स्टेशन आते ही दिल में उत्साह भर जाता था, ठीक वैसा ही एहसास मुझे नागरकोइल पार करने के बाद हो रहा था।

नागरकोइल से कन्याकुमारी के बीच का दृश्य आज भी मेरी आँखों में ताज़ा है।

दोनों ओर घने हरे पेड़, बीच-बीच में बसे छोटे गाँव, हवा में घुली भीगी मिट्टी की महक और दूर पहाड़ियों में अटके बादल — सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था।

चेन्नई की भागदौड़ के बाद प्रकृति की यह शांत सुंदरता मन को अद्भुत सुकून दे रही थी।

ऐसा लगता था मानो ट्रेन पटरियों पर नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हो।

आख़िरकार दोपहर करीब दो बजे हमारी ट्रेन कन्याकुमारी पहुँच गई।

जिस जगह की हम महीनों से कल्पना कर रहे थे, वह सपना आज हमारी आँखों के सामने साकार खड़ा था।

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हमने ठहरने के लिए विवेकानंद ट्रस्ट का एक कॉटेज लिया था।

खर्च बहुत कम था, लेकिन जगह असाधारण रूप से शांत और सुंदर थी। चारों तरफ समुद्री हवा, सन्नाटा और एक अनजानी आध्यात्मिक अनुभूति वातावरण में घुली हुई थी।

स्नान और भोजन के बाद शाम करीब चार बजे हम विवेकानंद रॉक और तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा देखने निकल पड़े।

कॉटेज से ऑटो स्टैंड की ओर जाते समय रास्ते में कई बोर्ड दिखाई दिए, जिन पर लिखा था — **“No Spitting”**।

उस उम्र में मुझे “Spitting” का अर्थ नहीं पता था। मैंने माँ से पूछा,

“इसका मतलब क्या है?”

माँ मुस्कुराकर बोलीं,

“थूकना मना है।”

मैंने तुरंत बड़ी गंभीरता से कहा,

“तो हमारे स्कूल के सारे सीनियर सर यहाँ कैसे आएँगे? वे तो हर दस मिनट में पान खाकर लाल-लाल थूकते रहते हैं!”

मेरी बात सुनकर सब ज़ोर से हँस पड़े और मैं तब भी पूरी गंभीरता से सोच रहा था कि यहाँ पान खाने वालों को सचमुच बड़ी परेशानी होती होगी।

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हँसी-मज़ाक करते हुए हम बोट घाट पहुँच गए।

समुद्र के बीच स्थित विवेकानंद रॉक तक पहुँचने में मुश्किल से पाँच-सात मिनट लगे, लेकिन वे कुछ मिनट मेरी ज़िंदगी की सबसे यादगार स्मृतियों में शामिल हो गए।

वहाँ कदम रखते ही एक गहरी शांति ने मन को घेर लिया।

ध्यान कक्ष पूरी तरह शांत था। ऐसा लगता था कि अगर कोई धीरे से साँस भी ले, तो उसकी आवाज़ पूरे वातावरण में गूँज उठे।

उस खामोशी में एक अदृश्य आध्यात्मिक ऊर्जा महसूस हो रही थी।

वहीं एक पुस्तक की दुकान पर मेरी दुकानदार से लंबी बातचीत हुई। वे बेहद ज्ञानवान और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। उनसे बात करते हुए समय का पता ही नहीं चला।

फिर मैं आगे बढ़ गया।

चारों ओर मंदिर, स्मारक और समुद्र की नमकीन हवा — सब मिलकर मन को भर रहे थे।

ऐसा लग रहा था कि मैं केवल एक स्थान नहीं देख रहा, बल्कि एक अनुभव को जी रहा हूँ।

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एक जगह खड़े होकर मैंने जो दृश्य देखा, वह आज भी मेरी स्मृतियों में जीवित है।

दो अलग-अलग रंगों का समुद्री जल एक-दूसरे से मिलता हुआ दिखाई दे रहा था।

एक गहरे नीले रंग का, जिसे मैं पुरी में देखे बंगाल की खाड़ी के जल जैसा मान रहा था, और दूसरा हल्के हरे रंग का, जिसे उस समय मैं अरब सागर समझ रहा था।

सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि दोनों के बीच एक स्पष्ट रेखा दिखाई दे रही थी।

मानो दोनों साथ रहते हुए भी अपनी-अपनी पहचान खोना नहीं चाहते हों।

समुद्र की हवा इतनी शीतल और ताज़गीभरी थी कि लगता था फेफड़े नहीं, आत्मा साँस ले रही है।

लहरों की आवाज़, दूर टूटती तरंगें और क्षितिज तक फैला नीला विस्तार — सब मिलकर एक अद्भुत संसार रच रहे थे।

लेकिन उसी सुंदरता के भीतर एक गहरा सत्य भी छिपा था।

आज जो समुद्र इतना शांत और सुंदर दिखाई देता है, वही यदि कभी अपना विकराल रूप धारण कर ले, तो पूरी सभ्यता को मिटा देने की शक्ति भी रखता है।

एक ही समुद्र।

एक ओर जीवन की शांति।

दूसरी ओर प्रकृति की अपार शक्ति।

उस पल मैंने महसूस किया कि यह केवल समुद्र नहीं है, बल्कि सृष्टि का एक महान आश्चर्य है — जहाँ सौंदर्य और भय दोनों एक साथ, एक ही मौन में निवास करते हैं।

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उसी समय मेरी नज़र एक घुँघराले बालों वाली लड़की पर पड़ी।

उम्र शायद मेरी ही बराबर रही होगी, लेकिन उस क्षण वह मुझे किसी फिल्म अभिनेत्री से भी अधिक आकर्षक लगी।

उसने पीले रंग का स्लीवलेस टॉप और घुटनों से थोड़ा ऊपर तक आने वाली काली स्कर्ट पहन रखी थी।

डूबते सूरज की रोशनी उसके होंठों पर लगी चमक को और उजागर कर रही थी।

सच कहूँ तो उस समय मुझे यह भी नहीं पता था कि लिप ग्लॉस नाम की कोई चीज़ होती है। हमारे गाँव या आसपास ऐसी चीज़ें देखने का अवसर कभी मिला ही नहीं था।

उसकी घुँघराली लटें समुद्री हवा के साथ लहराती थीं और उसे किसी चित्र की तरह सुंदर बना रही थीं।

लेकिन सबसे अधिक याद रह गईं उसकी आँखें।

हल्की उदासी से भरी वे धुँधली आँखें, जिनमें एक अजीब-सी गहराई थी।

उन आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे अपनी ओर खींच रहा था।

मैं जानता था कि मैं एक धार्मिक स्थल पर खड़ा हूँ, लेकिन उस उम्र में सही और गलत की परिभाषाएँ इतनी स्पष्ट नहीं होतीं।

यह आकर्षण क्या था, क्यों था, मैं नहीं जानता था।

मैं बस उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

क्योंकि वह भी तिरुवल्लुवर रॉक की ओर जा रही थी।

ऐसा लग रहा था जैसे समुद्र, हवा और यह अनजाना आकर्षण — तीनों मिलकर मुझे किसी नई कहानी की ओर ले जा रहे हों।

उस दिन मेरी यात्रा केवल जगहों को देखने की यात्रा नहीं रह गई थी।

शायद पहली बार मैं अपने भीतर के एक नए संसार को भी खोज रहा था।

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**क्रमशः...**




Puri Tourism
Binod Bihari

ଷ୍ଟେସନ୍, ସମୁଦ୍ର ଓ ନିରବତା-----------------------------------ଚାପ୍ଟର ୧------------ କିଛି ଯାତ୍ରା ଟିକେଟ୍‌ରୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ, ହୃଦୟର ଗ...
31/05/2026

ଷ୍ଟେସନ୍, ସମୁଦ୍ର ଓ ନିରବତା
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ଚାପ୍ଟର ୧
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- କିଛି ଯାତ୍ରା ଟିକେଟ୍‌ରୁ ଆରମ୍ଭ ହୋଇ, ହୃଦୟର ଗଭୀରତାରେ ଯାଇ ଶେଷ ହୁଏ।

ରବିବାର, ୨୯ ମଇ ୨୦୦୫।

ସେ ଦିନଟା ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୋ ମନରେ ସେଇ ଟ୍ରେନର ସିଟିର ଶବ୍ଦ ଭଳି ଗୁଞ୍ଜିଉଠେ। ଭୁବନେଶ୍ୱର ଷ୍ଟେସନରୁ ଆମେ ଚଢିଥିଲୁ “ହାଉରା –କନ୍ୟାକୁମାରୀ ସୁପରଫାଷ୍ଟ ଏକ୍ସପ୍ରେସ” ରେ।

ସେ ସମୟଟା ଆଜିର ଭଳି ନୁହେଁ। ହାତରେ ସ୍ମାର୍ଟଫୋନ୍ ନଥିଲା, ଇଣ୍ଟରନେଟ୍ ନଥିଲା, ଅନଲାଇନ୍ ବୁକିଂର ସୁବିଧା ନଥିଲା। ଟିକେଟ୍ କନଫର୍ମ ହେଲା କି ନାହିଁ ଜାଣିବା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ବାପାଙ୍କୁ ବାରମ୍ବାର ଷ୍ଟେସନ୍ ଯିବାକୁ ପଡୁଥିଲା।

ଆଜି ଭାବିଲେ ଆଶ୍ଚର୍ୟ ଲାଗେ — ଏତେ ବଡ଼ ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତ ଭ୍ରମଣର ସମସ୍ତ ଯୋଜନା, ଟ୍ରେନ୍ ଟିକେଟ୍, ରହିବା ବ୍ୟବସ୍ଥା ଆଉ ଖର୍ଚ୍ଚର ହିସାବ ବାପା ଏକା ହାତରେ ସମ୍ଭାଳିଥିଲେ। ସେ ସମୟରେ ଏଭଳି ଭ୍ରମଣ ପ୍ଲାନ୍ କରିବା ସତରେ କୌଣସି ଛୋଟ କଥା ନଥିଲା।

ଆମ ପାଖରେ ଥିଲା ପାଞ୍ଚୋଟି ଟିକେଟ୍ — ବାପା, ମା, ମୋ ଭାଇ, ମୁଁ ଆଉ ମୋ ଆଜା।।ଭାଇ ନୂଆ ନୂଆ ଦ୍ୱାଦଶ ପରୀକ୍ଷା ଶେଷ କରିଥିଲା, ଆଉ ମୁଁ ଅଷ୍ଟମ ଶ୍ରେଣୀର ଛାତ୍ର। ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କର ଉତ୍ସାହ କହିଲେ ନ ସରେ।। କାରଣ ଏହା ଆମର ପ୍ରଥମ ଦୂର ଯାତ୍ରା — ଓଡ଼ିଶା ବାହାରେ, ପ୍ରାୟ ୧୮ ଦିନର ଏକ ସ୍ୱପ୍ନିଲ ଭ୍ରମଣ।

କିଛି ସମୟର ଅପେକ୍ଷା ପରେ ପ୍ଲାଟଫର୍ମ ନମ୍ବର ୪ରେ ଧୀରେ ଧୀରେ ପ୍ରବେଶ କଲା ଆମ “ହାଉରା – କନ୍ୟାକୁମାରୀ ସୁପରଫାଷ୍ଟ ଏକ୍ସପ୍ରେସ”। ଟ୍ରେନ୍ ଆସିବା ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ଆମେ ଜାଣିସାରିଥିଲୁ ଆମ ବଗି କେଉଁଠି ଲାଗିବ। ସେଥିପାଇଁ ବାପା ଆମକୁ ନେଇ ଆଗରୁ ସେଇ ସ୍ଥାନରେ ଯାଇ ଠିଆ କରେଇଥିଲେ।
ପ୍ଲାଟଫର୍ମରେ ଚା’ ବାଲାଙ୍କ ଡାକ, କୁଲିମାନଙ୍କ ଦୌଡ଼ାଦୌଡ଼ି, ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିଡ଼ ଆଉ ଟ୍ରେନର ଇଞ୍ଜିନର ଗମ୍ଭୀର ଶବ୍ଦ — ସବୁକିଛି ମିଶି ଏକ ଅଜଣା ଉତ୍ସାହର ପରିବେଶ ସୃଷ୍ଟି କରୁଥିଲା।
ସେତେବେଳେ ଟ୍ରେନ୍ ଯାତ୍ରା କେବଳ ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରୁ ଅନ୍ୟ ସ୍ଥାନକୁ ଯିବା ନଥିଲା, ଏହା ନିଜେ ଗୋଟିଏ ପର୍ବ ଭଳି ଲାଗୁଥିଲା।
ରାତି ପ୍ରାୟ ସାଢେ ଦଶଟାରେ ଟ୍ରେନ୍ ଛାଡିଲା। ଧୀରେ ଧୀରେ ଭୁବନେଶ୍ୱରର ଆଲୋକ ଅନ୍ଧାରରେ ହଜିଗଲା। ଟ୍ରେନର ଝିଙ୍କାର ଶବ୍ଦ ଆଉ ଝରକା ପାଖରୁ ଦୌଡୁଥିବା ଅନ୍ଧାର ମୋ ମନରେ ଏକ ଅଜଣା ରୋମାଞ୍ଚ ଭରିଦେଉଥିଲା।

ପରଦିନ ସକାଳ ୫ଟା ବେଳେ ଟ୍ରେନ୍ ପହଞ୍ଚିଲା ବିଶାଖାପଟ୍ଟଣମ୍। ଘୁମୁଘୁମୁ ଆଖିରେ ଝରକା ବାହାରକୁ ଚାହିଁ ଦେଖିଲି ଷ୍ଟେସନ୍ ବୋର୍ଡ। ହିନ୍ଦୀ ଏବଂ ଇଂରାଜୀ ପଢିପାରୁଥିଲି, କିନ୍ତୁ ସେଥିରେ ଥିବା ଅନ୍ୟ ଗୋଟିଏ ଲିପି ମୋ ମନରେ ଅସୀମ କୌତୁହଳ ଜଗାଇଦେଲା। ସେଟା ଥିଲା ତେଲୁଗୁ ଅକ୍ଷର।
ତା’ପରୁ ମୋର ଏକ ନୂଆ ଖେଳ ଆରମ୍ଭ ହେଲା। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଷ୍ଟେସନରେ ଆସୁଥିବା ତେଲୁଗୁ ଲେଖାକୁ ଚାହିଁ ରହୁଥିଲି। ମନେ ହେଉଥିଲା ମୁଁ ଧୀରେ ଧୀରେ ଭାରତର ଏକ ନୂଆ ଦୁନିଆକୁ ପ୍ରବେଶ କରୁଛି।

ଖରାବେଳେ ଟ୍ରେନ୍ ଯେତେବେଳେ ରାଜାମୁନ୍ଦ୍ରୀ ଷ୍ଟେସନ୍ରୁ ଛାଡ଼ିଲା, ସେତେବେଳେ ଝରକା ବାହାରର ଦୃଶ୍ୟ ଧୀରେ ଧୀରେ ବଦଳିବାକୁ ଲାଗିଲା।
ଦୂର ଯାଏଁ ପସରିଥିବା ସବୁଜ ନଡ଼ିଆ ଗଛ, ମଧ୍ୟେମଧ୍ୟେ ଦେଖାଯାଉଥିବା ଛୋଟ ଛୋଟ ଗାଁ, ଆଉ ଗରମ ପବନ ସହ ଆସୁଥିବା ନଦୀ ମାଟିର ଗନ୍ଧ ମନକୁ ଏକ ଅଲଗା ଶାନ୍ତି ଦେଉଥିଲା।
କିଛି ସମୟ ପରେ ଟ୍ରେନ୍ ଯେତେବେଳେ ଗୋଦାବରୀ ନଦୀ ଉପରେ ଥିବା ସେଇ ବିଶାଳ ଲମ୍ବା ସେତୁ ଉପରେ ଚଢ଼ିଲା, ସେତେବେଳେ ମୋ ହୃଦୟ ଧକ୍ଧକ୍ କରୁଥିଲା।
ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଏତେ ବଡ଼ ନଦୀ, ଏତେ ଲମ୍ବା ବ୍ରିଜ୍ ଦେଖୁଥିଲି। ଟ୍ରେନ୍ ଧୀରେ ଧୀରେ ଚାଲୁଥିଲା, ଆଉ ତଳେ ଅସୀମ ଜଳରାଶି। ସୂର୍ଯ୍ୟର ଆଲୋକ ପାଣି ଉପରେ ପଡ଼ି ଏମିତି ଚମକୁଥିଲା, ମନେ ହେଉଥିଲା ନଦୀ ଉପରେ ହଜାର ହଜାର ରୂପାର ଖଣ୍ଡ ଭାସୁଛି।
ସେ ସମୟର ଅନୁଭବକୁ ଆଜି ମଧ୍ୟ ଶବ୍ଦରେ କହିବା କଷ୍ଟକର। ମନରେ ଭୟ ମଧ୍ୟ ଥିଲା, ଆଉ ଅଜଣା ଆନନ୍ଦ ମଧ୍ୟ। ମୁଁ ଭାବୁଥିଲି — “ଯଦି ଟ୍ରେନ୍ ପାଣିରେ ପଡ଼ିଯାଏ? ଆମେ କିପରି ବଞ୍ଚିବୁ?” କାରଣ ଆମ ଘରେ କେବଳ ବାପାଙ୍କୁ ମାତ୍ର ପହଁରିବା ଆସୁଥିଲା।
କିନ୍ତୁ କିଛି ମିନିଟ୍ ପରେ ଟ୍ରେନ୍ ସେତୁ ପାର୍ ହେଲା ଆଉ ମୋ ମନରେ ଏକ ଅଜଣା ଶାନ୍ତି ଫେରିଆସିଲା।

ସେଇ ଦିନ ରାତି ପ୍ରାୟ ୮ଟା ବେଳେ ଆମ ଟ୍ରେନ୍ ପହଞ୍ଚିଲା “ଚେନ୍ନାଇ ଏଗମୋର” ଷ୍ଟେସନରେ। ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁଁ କେବେ ଏମିତି ଷ୍ଟେସନ୍ ଦେଖିନଥିଲି, ଯାହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ବିଶାଳ ଛାଦ ତଳେ ଢାକା ଥାଏ। ଭିତରେ ଠିଆ ହୋଇ ଘଡ଼ି ନଦେଖିଲେ ଦିନ କି ରାତି ତାହା ମଧ୍ୟ ବୁଝିହେଉନଥିଲା।
ମୋ ଭଳି ଗାଁର ସରଳ ପିଲା ପାଇଁ ଭୁବନେଶ୍ୱର ହିଁ ଥିଲା ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ସହର। ମୋର ଭାବନା ଥିଲା ଭୁବନେଶ୍ୱରଠାରୁ ବଡ଼ ଆଉ କିଛି ହୋଇପାରିବ ନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଚେନ୍ନାଇରେ ପାଦ ରଖିବା ପରେ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଅନୁଭବ କଲି — ଦୁନିଆ ଆମ ଛୋଟ ଛୋଟ କଳ୍ପନାଠାରୁ କେତେ ଅଧିକ ବିଶାଳ।

ବାପା ୮୦ ଦଶକରେ ସେହି ସହରରେ କାମ କରୁଥିଲେ। ସେଥିପାଇଁ ତାମିଲ୍ ଭାଷାରେ ସେ ବହୁତ ସ୍ୱଚ୍ଛନ୍ଦ ଥିଲେ। ଷ୍ଟେସନ୍ ଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ସହରର ରାସ୍ତା, ଲୋକମାନଙ୍କ ଜୀବନଶୈଳୀ, ତାମିଲନାଡୁର ଉନ୍ନତି ଆଉ ସଂସ୍କୃତି ବିଷୟରେ ବାପା ମୋତେ ଅନେକ କଥା କହୁଥିଲେ।
ମୁଁ ଚୁପଚାପ ସେସବୁ ସୁଣୁଥିଲି ଆଉ ମନେ ମନେ ଅନୁଭବ କରୁଥିଲି ଯେ ମୁଁ ଧୀରେ ଧୀରେ ଏକ ନୂଆ ଦୁନିଆରେ ପ୍ରବେଶ କରୁଛି।
ଯାତ୍ରା ସମୟରେ ଟ୍ରେନ୍ ଯେଉଁ ଷ୍ଟେସନ୍ରେ ଅଟକୁଥିଲା, ସେଠାରେ ଯାହା ଖାଇବା ଟ୍ରେନ୍ ପାଖକୁ ଆସୁଥିଲା ଆମେ ପ୍ରାୟ ସବୁକିଛି କିଣି ଖାଉଥିଲୁ।
ସେଟା ବରା ହେଉ, ସିଙ୍ଗଡ଼ା ହେଉ, ଚା ହେଉ, ଝାଲମୁଡ଼ି ହେଉ କିମ୍ବା କାକୁଡ଼ିରେ ଲୁଣ-ଲଙ୍କା ଲଗାଇ ବେଚୁଥିବା ଲୋକ ହେଉ — ସବୁକିଛି ଆମ ପାଇଁ ସେତେବେଳେ ସ୍ୱାଦିଷ୍ଟ ଲାଗୁଥିଲା।
ଆଉ ଗୋଟିଏ ଜିନିଷ ଯାହା ସମ୍ଭବତଃ ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ କିଣାଯାଉଥିଲା, ସେଟା ହେଉଛି ପାଣି ବୋତଲ। ସେ ସମୟରେ ଟ୍ରେନ୍ ଯାତ୍ରାର ଅର୍ଥ ହେଉଥିଲା — ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦୁଇ ଘଣ୍ଟାରେ କାହାରି ନ କାହାରି କହିବା, “ପାଣି ସରିଗଲାଣି… ଆଉ ଗୋଟେ ବୋତଲ ନେଇଆସ!”
ମଜାର କଥା ହେଉଛି, ଯେତେ ପାଣି ଆମେ ସେ ୧୮ ଦିନର ଯାତ୍ରାରେ ପିଇଥିଲୁ, ମନେ ହୁଏ ଘରେ ସାରା ବର୍ଷରେ ମଧ୍ୟ ତେତେ ପିଉନଥିଲୁ।
ଏହି ଖାଇବା-ପିଇବା ସହିତ ଆମେ ତାସ୍ ମଧ୍ୟ ନେଇଥିଲୁ। ପ୍ରାୟ ୪୦ ଘଣ୍ଟାର ସେଇ ଦୀର୍ଘ ଯାତ୍ରାରେ “ବ୍ରେ” ଖେଳିବା ହିଁ ଥିଲା ଆମର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ପାସ୍‌ଟାଇମ୍। କେବେ ଭାଇ ଜିତୁଥିଲା, କେବେ ବାପା, ଆଉ ମୁଁ ଅଧିକ ସମୟ ହାରିଲେ ମଧ୍ୟ କେବଳ ତାସ୍ ବାଣ୍ଟିବାରେ ବହୁତ ଖୁସି ହେଉଥିଲି।

ଏହା ଥିଲା ଟ୍ରେନରେ ଆମର ଦ୍ୱିତୀୟ ରାତି। ସମ୍ଭବତଃ ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ ଅପେକ୍ଷାର ରାତି। କାରଣ ଆଜି ରାତି ପାହିଲେ କାଲି ସକାଳେ ଆମେ ପହଞ୍ଚିବାକୁ ଯାଉଥିଲୁ ଆମ ସ୍ୱପ୍ନର ଗନ୍ତବ୍ୟ — କନ୍ୟାକୁମାରୀ।

ଯାତ୍ରା ସମୟରେ ଅନେକ ଅଜଣା ଲୋକଙ୍କ ସହ ପରିଚୟ ହୋଇଥିଲା। କେହି କନ୍ୟାକୁମାରୀରେ ରୁହୁଥିଲେ, ଆଉ କେହି ସେଇ ଜାଗା ଆଗରୁ ବୁଲି ଆସିଥିଲେ।
ଆଶ୍ଚର୍ୟର କଥା ହେଉଛି, ସେମାନେ ଆମକୁ ସଂପୂର୍ଣ୍ଣ ନିଷ୍କାମ ଭାବେ ସହାୟତା କରୁଥିଲେ — କେଉଁଠି ରହିବା ଭଲ, କେଉଁ ହୋଟେଲ୍ ସସ୍ତା, କେଉଁ ସ୍ଥାନ ପ୍ରଥମେ ଦେଖିବା ଉଚିତ୍, ସବୁକିଛି ବିଷୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆତ୍ମୀୟତାର ସହ କହୁଥିଲେ।
ଆଜି ସେମାନଙ୍କ ନାଁ ମୋର ମନେ ନଥାଇପାରେ, କିନ୍ତୁ ସେ ଯାତ୍ରାରେ ମିଳିଥିବା ସେଇ ଅଜଣା ଲୋକଙ୍କ ଭଲପାଇବା ଆଉ ସରଳ ବ୍ୟବହାର ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୋ ମନରେ ସେମିତି ତାଜା ହୋଇ ରହିଛି।
ପରଦିନ ସକାଳ ପ୍ରାୟ ୭ଟା ବେଳେ ଟ୍ରେନ୍ ପହଞ୍ଚିଲା ମଦୁରାଇ ଷ୍ଟେସନରେ। ସେତେବେଳେ ଆମ ମନର ଉତ୍ସାହ ଆଉ ବଢ଼ିଯାଇଥିଲା। କାରଣ ଆମେ ଜାଣିଥିଲୁ, ଆଉ କେବଳ କିଛି ଘଣ୍ଟା ପରେ ଆମେ ପହଞ୍ଚିଯିବୁ ଭାରତର ଶେଷ ସୀମା — କନ୍ୟାକୁମାରୀରେ।
କଥାବାର୍ତ୍ତା ଭିତରେ ବାପା କହୁଥିଲେ, ଫେରିବା ବେଳେ ମଦୁରାଇରେ କିଛି ସମୟ ରୁହି ମା ମୀନାକ୍ଷୀ ମନ୍ଦିର ଦର୍ଶନ କରିବା। ସେତେବେଳେ ମୁଁ କେବଳ ଝରକା ବାହାରକୁ ଚାହିଁ ଭାବୁଥିଲି — ସତରେ କି ଆମେ ଏତେ ଦୂର ଆସିପହଞ୍ଚିଲୁ!

କଥାବାର୍ତ୍ତା ଭିତରେ କେତେବେଳେ ଟ୍ରେନ୍ ପହଞ୍ଚିଗଲା “ନାଗରକୋଇଲ୍” ଷ୍ଟେସନରେ, ତାହା ଆମେ ଧ୍ୟାନ ମଧ୍ୟ ଦେଇପାରିନଥିଲୁ। ସେଠାରୁ ପରବର୍ତ୍ତୀ ଆଉ ଶେଷ ଷ୍ଟେସନ୍ — କନ୍ୟାକୁମାରୀ। ଏହା ଶୁଣିବା ମାତ୍ରେ ମନ ଭିତରେ ଏକ ଅଜଣା ଖୁସିର ଲହରୀ ଖେଳିଉଠିଲା। ଏତେ ଦିନର ଅପେକ୍ଷା, ଏତେ ଦୂର ଯାତ୍ରା… ଆଉ ଏବେ ଗନ୍ତବ୍ୟ କେବଳ କିଛି ମିନିଟ୍ ଦୂରେ।
ହଠାତ୍ ମୋତେ ପୁରୀ ଯାତ୍ରାର କଥା ମନେ ପଡ଼ିଗଲା। ପୁରୀ ପୂର୍ବର “ମାଲତୀପାଟପୁର” ଷ୍ଟେସନ୍ ଆସିଲେ ଯେପରି ମନରେ ଅଜଣା ଉତ୍ସାହ ଜାଗିଉଠେ, ଠିକ୍ ସେହି ଅନୁଭୂତି ମୋତେ ନାଗରକୋଇଲ୍ ଛାଡ଼ିବା ପରେ ହେଉଥିଲା।

ନାଗରକୋଇଲ୍ ଠାରୁ କନ୍ୟାକୁମାରୀ ମଧ୍ୟର ଦୃଶ୍ୟ ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୋ ଆଖିରେ ସେମିତି ତାଜା ହୋଇ ରହିଛି। ଦୁଇପାର୍ଶ୍ୱରେ ଘନ ସବୁଜ ଗଛ, ମଧ୍ୟେମଧ୍ୟେ ଦେଖାଯାଉଥିବା ଛୋଟ ଗାଁ, ପବନ ସହ ଆସୁଥିବା ମାଟିର ଭିଜା ସୁଗନ୍ଧ ଆଉ ଦୂରର ପାହାଡ଼ ଭିତରେ ଲୁଚିଥିବା ମେଘ — ସବୁକିଛି ମିଶି ଏକ ସ୍ୱପ୍ନ ଭଳି ଲାଗୁଥିଲା। ଚେନ୍ନାଇର ବ୍ୟସ୍ତତା ପରେ ଏହି ପ୍ରକୃତିର ଶାନ୍ତ ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ମନକୁ ଅଦ୍ଭୁତ ଶାନ୍ତି ଦେଉଥିଲା।

ମନେ ହେଉଥିଲା ଟ୍ରେନ୍ ରେଳ ଲାଇନ୍ ଉପରେ ନୁହେଁ, ପ୍ରକୃତିର କୋଳ ଭିତରୁ ଧୀରେ ଧୀରେ ଗତି କରୁଛି। ଝରକା ପାଖରେ ବସି ମୁଁ କେବଳ ବାହାରକୁ ଚାହିଁ ରହିଥିଲି। ସେ ସମୟରେ ମନ ଭିତରେ ଯେଉଁ ଖୁସି ଥିଲା, ତାହାକୁ ସମ୍ଭବତଃ ଶବ୍ଦରେ କହିହେବ ନାହିଁ।
ଶେଷରେ ଦୁପର ପ୍ରାୟ ୨ଟା ବେଳେ ଆମ ଟ୍ରେନ୍ ପହଞ୍ଚିଲା କନ୍ୟାକୁମାରୀରେ। ଗତ କିଛି ମାସ ଧରି ଯେଉଁ ସ୍ଥାନକୁ ନେଇ କେବଳ କଳ୍ପନା କରୁଥିଲୁ, ଆଜି ସେଇ ସ୍ୱପ୍ନ ଆମ ଆଖି ସାମ୍ନାରେ ସତ୍ୟ ହୋଇ ଠିଆ ହୋଇଥିଲା।

ଆମେ ରହିବା ପାଇଁ ବିବେକାନନ୍ଦ ଟ୍ରଷ୍ଟର ଗୋଟିଏ କଟେଜ୍ ନେଇଥିଲୁ। ଖର୍ଚ୍ଚ ଖୁବ କମ୍ ଥିଲା, କିନ୍ତୁ ସ୍ଥାନଟା ଅସାଧାରଣ ଭାବେ ଶାନ୍ତ ଆଉ ସୁନ୍ଦର। ଚାରିପାଖରେ ସମୁଦ୍ର ପବନ, ନିରବ ପରିବେଶ ଆଉ ଅଜଣା ଏକ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଅନୁଭୂତି ମନକୁ ଅଲଗା ଶାନ୍ତି ଦେଉଥିଲା।
ସ୍ନାନ ସାରି ମଧ୍ୟାହ୍ନ ଭୋଜନ କରି ଆମେ ସନ୍ଧ୍ୟା ପ୍ରାୟ ୪ଟା ବେଳେ ବାହାରିଲୁ ବିବେକାନନ୍ଦ ରକ୍ ଆଉ ତିରୁଭାଲ୍ଲୁଭରଙ୍କ ବିଶାଳ ମୂର୍ତ୍ତି ଦେଖିବାକୁ।

କଟେଜ ରୁ ଅଟୋ ଷ୍ଟାଣ୍ଡ ଦିଗକୁ ଚାଲିଯାଉଥିବା ବେଳେ ରାସ୍ତା କଡ଼ରେ ଅନେକ ବୋର୍ଡ ଦେଖିଲି, ସେଥିରେ ଲେଖାଥିଲା — “No Spitting”। ସେ ବୟସରେ “Spitting” ମାନେ କଣ ମୁଁ ଜାଣୁନଥିଲି। ତେଣୁ ମାଙ୍କୁ ପଚାରିଲି, “ଏହାର ଅର୍ଥ କଣ?”
ମା ହସି କହିଲେ, “ଛେପ ପକାଇବା ମନା।”
ମୁଁ ଆଶ୍ଚର୍ୟ ହୋଇ ସହଜରେ କହିଦେଲି, “ତାହେଲେ ଆମ ସ୍କୁଲର ସବୁ ସିନିୟର ସାର୍ ମାନେ ଏଠାକୁ କିପରି ଆସିବେ? ସେମାନେ ତ ସବୁବେଳେ ପାନ ଖାଇ ପ୍ରତି ଦଶ ମିନିଟ୍‌ରେ ଲାଲ ଲାଲ ଛେପ ପକାଉଥାନ୍ତି!”
ମୋ କଥା ଶୁଣି ସମସ୍ତେ ହସିଉଠିଲେ, ଆଉ ମୁଁ ସେତେବେଳେ ମଧ୍ୟ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଗମ୍ଭୀର ଭାବେ ଭାବୁଥିଲି — ସତରେ ଏଠାରେ ପାନ ଖାଇବା ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ବହୁତ କଷ୍ଟ ହେବ!

ସେଇ ହସ-ମଜାର ଭାବନା ଭିତରେ ଆମେ ବୋଟ୍ ଘାଟକୁ ପହଞ୍ଚିଗଲୁ। ସମୁଦ୍ର ମଝିରେ ଥିବା ବିବେକାନନ୍ଦ ରକ୍ ପହଞ୍ଚିବାକୁ କେବଳ ୫–୭ ମିନିଟ୍‌ର ବୋଟ୍ ଯାତ୍ରା ଲାଗିଲା, କିନ୍ତୁ ସେଇ କିଛି ମିନିଟ୍ ମୋ ଜୀବନରେ ଚିରସ୍ମରଣୀୟ ହୋଇ ରହିଗଲା।

ସେଠାରେ ପାଦ ରଖିବାମାତ୍ରେ ଏକ ଗଭୀର ଶାନ୍ତିର ଅନୁଭୂତି ମନକୁ ଢାକିଦେଲା। ଧ୍ୟାନ କକ୍ଷଟି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିରବ ଥିଲା। ମନେ ହେଉଥିଲା, ଯଦି କେହି ଟିକେ ଧୀରେ ଶ୍ୱାସ ନେଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଶବ୍ଦ ସମଗ୍ର ପରିବେଶରେ ପ୍ରତିଧ୍ୱନି ହେଇଯିବ। ସେଇ ନିରବତାରେ ଏକ ଅଜଣା ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଶକ୍ତି ଲୁଚିଥିବା ପରି ଲାଗୁଥିଲା।

ସେଠାରେ ଥିବା ଗୋଟିଏ ପୁସ୍ତକ ଦୋକାନରେ ମୋର ଦୋକାନୀଙ୍କ ସହ ଦୀର୍ଘ ସମୟ କଥା ହେଲା। ସେ ବହୁତ ଜ୍ଞାନୀ ଆଉ ସରଳ ମନର ଲୋକ ଥିଲେ। ତାଙ୍କ ସହ କଥା କହୁଥିବା ବେଳେ ସମୟ କେମିତି ଗଲା ମୁଁ ଜାଣିପାରିଲି ନାହିଁ।

ତା’ପରେ ମୁଁ ଆଗକୁ ଚାଲିଗଲି। ଚାରିପାଖରେ ଥିବା ମନ୍ଦିର, ସ୍ମାରକ, ଆଉ ସମୁଦ୍ରର ଲୁଣା ହାୱା — ସବୁକିଛି ମିଶି ମୋ ମନକୁ ଭରିଦେଉଥିଲା। ମନେ ହେଉଥିଲା ଯେପରି ମୁଁ କେବଳ ଏକ ସ୍ଥାନ ଦେଖୁନଥିଲି, ଏକ ଅନୁଭୂତି ଜୀବନରେ ବଞ୍ଚୁଥିଲି।

ଗୋଟିଏ ସ୍ଥାନରେ ଠିଆ ହୋଇ ମୁଁ ଯେ ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖିଲି, ସେଟା ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୋ ମନରେ ଜୀବନ୍ତ। ଦୁଇଟି ଭିନ୍ନ ରଙ୍ଗର ସମୁଦ୍ର ଜଳ ଏକାଠି ଆସି ମିଶୁଥିଲା। ଗୋଟିଏ ଗାଢ଼ ନୀଳ ରଙ୍ଗର — ପୁରୀରେ ଯାହା ମୁଁ ଦେଖିଥିଲି ସେଇ ବଙ୍ଗୋପସାଗର, ଆଉ ଅନ୍ୟଟି ହାଲୁକା ସବୁଜ ଛାୟାର — ଯାହାକୁ ମୁଁ ସେତେବେଳେ ଆରବ ସାଗର ଭାବିଥିଲି।
ଆଶ୍ଚର୍ୟର କଥା ହେଉଛି, ଦୁଇଟି ଜଳର ମଧ୍ୟରେ ଏକ ସ୍ପଷ୍ଟ ସୀଧା ରେଖା ଦେଖାଯାଉଥିଲା। ମନେ ହେଉଥିଲା ସେମାନେ ପାଖାପାଖି ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ନିଜ ନିଜ ପରିଚୟ ହାରାଇବାକୁ ଚାହୁଁନଥିଲେ, ଯେପରି ଦୁଇଟି ଭିନ୍ନ ଦୁନିଆ ଏକେ ମଞ୍ଚରେ ଠିଆ ହୋଇଛି।

ସମୁଦ୍ରର ପବନ ଏତେ ଶୀତଳ, ଏତେ ସତେଜ ଥିଲା ଯେ ମନେ ହେଉଥିଲା ଫୁସଫୁସ ନୁହେଁ, ଆତ୍ମା ଶ୍ୱାସ ନେଉଛି। ସେଇ ଶାନ୍ତ ଲହରୀର ଶବ୍ଦ, ଦୂରରେ ଭାଙ୍ଗୁଥିବା ତରଙ୍ଗର ଧ୍ୱନି, ଆଉ ଆକାଶ ସହ ମିଶିଯାଉଥିବା ନୀଳିମା — ସବୁକିଛି ମିଶି ଏକ ଅଦ୍ଭୁତ ସମାନ୍ତର ସୃଷ୍ଟି କରିଥିଲା।

କିନ୍ତୁ ସେଇ ଶାନ୍ତ ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଭିତରେ ଏକ ଗଭୀର ସତ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଲୁଚିଥିଲା। ଏହି ସମୁଦ୍ର, ଯାହା ଆଜି ଏତେ ଶାନ୍ତ ଆଉ ସୁନ୍ଦର ଲାଗୁଥିଲା, ଯଦି କେବେ ତାର ଭୟଙ୍କର ରୂପ ନେଇଯାଏ, ତେବେ ସମଗ୍ର ସଭ୍ୟତାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିଦେବାର ଶକ୍ତି ତା’ର ଭିତରେ ରହିଛି। ଏକେ ସମୁଦ୍ର — ଏକ ପକ୍ଷରେ ଜୀବନର ଶାନ୍ତି, ଆଉ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷରେ ପ୍ରକୃତିର ଭୟଙ୍କର ଶକ୍ତି।

ସେତେବେଳେ ମନରେ ଗଭୀର ଭାବରେ ଅନୁଭବ ହେଲା — ଏହା କେବଳ ସମୁଦ୍ର ନୁହେଁ, ଏହା ଏକ ସୃଷ୍ଟିର ଆଶ୍ଚର୍ୟ। ଭଗବାନଙ୍କର ଏମିତି ଏକ ରଚନା, ଯେଉଁଠି ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ଆଉ ଭୟ — ଦୁଇଟି ଏକାସାଥି ରହିଛି, ଏକେ ନିରବ ଭାବରେ।

ସେତେବେଳେ ହଠାତ୍ ମୋ ନଜର ପଡ଼ିଲା ଗୋଟିଏ କୁଞ୍ଚୁକୁଞ୍ଚିଆ କେଶ ଥିବା ଝିଅ ଉପରେ। ବୟସ୍ ସମ୍ଭବତଃ ମୋ ସମାନ, କିନ୍ତୁ ସେ ମୋ ଆଖିରେ ସେତେବେଳେ କୌଣସି ସିନେମା ନାୟିକାଠାରୁ କମ୍ ନୁହେଁ, ବରଂ ଅଧିକ ଆକର୍ଷଣୀୟ ଲାଗୁଥିଲା।

ତା’ର ପୋଷାକ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ପଶ୍ଚିମୀ ଢଙ୍ଗର — ହଳଦିଆ ରଙ୍ଗର ହାତ ନଥିବା ଟପ୍ ଆଉ ଆଣ୍ଠୁର ଠିକ୍ ଉପରକୁ ଥିବା କଳା ସ୍କର୍ଟ। ସୂର୍ଯ୍ୟ ଆଲୋକରେ ତା’ର ଠୋଠରେ ଲାଗିଥିବା ଚକଚକିଆ ଲିପ୍ ଗ୍ଲସ୍ ଏମିତି ଚମକୁଥିଲା ଯେ ମୁଁ କିଛି ମୁହୂର୍ତ୍ତ ପାଇଁ ଆଖି ଫେରାଇପାରୁନଥିଲି।

ସତ କହିଲେ, ସେତେବେଳେ “ଲିପ୍ ଗ୍ଲସ୍” ବୋଲି କିଛି ଥାଏ ବୋଲି ମୁଁ ଜାଣୁନଥିଲି। ଆମ ଗାଁ, ଆମ ପରିବାର କିମ୍ବା ସଙ୍ଗମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏମିତି କିଛି ଦେଖିବା ମଧ୍ୟ ଅସମ୍ଭବ ଥିଲା। ସେଇ ଅଜଣା ଚମକ ମୋ ମନକୁ ଅଜଣା ଭାବରେ ଆକର୍ଷିତ କରୁଥିଲା।

ପଶ୍ଚିମ ଦିଗରୁ ବହୁଥିବା ସମୁଦ୍ର ପବନ ତା’ର କୁଞ୍ଚୁକୁଞ୍ଚିଆ କେଶକୁ ଛୁଇଁ ଆଉ ଅଧିକ ଲହରୀ ଭରିଦେଉଥିଲା। ସେଇ କେଶର ଢେଉ, ପବନର ଖେଳ, ଆଉ ସମୁଦ୍ରର ଶବ୍ଦ — ସବୁକିଛି ମିଶି ତା’କୁ ଏକ ଅଲଗା ଜଗତର ଚିତ୍ର ପରି ଦେଖାଉଥିଲା।

ଆଉ ସବୁଠାରୁ ଅଧିକ ମନରେ ରହିଗଲା ତା’ର ଆଖି। ସେଇ ଅଳ୍ପ ବିଷାଦଭରା, ଧୂସର ଆଖି ଦୁଇଟି — ଯେଉଁଥିରେ ଏକ ଅଜଣା ଗଭୀରତା ଥିଲା। ସେ ଆଖିରେ ଏମିତି କିଛି ଥିଲା, ଯାହା ମୋତେ ଅଜଣା ନିଶାରେ ଡୁବାଇଦେଉଥିଲା।

ଏମିତି ଏକ ନିଶା, ଯାହାରୁ ମୁଁ ଚାହିଲେ ମଧ୍ୟ ବାହାରିପାରୁନଥିଲି। ମୁଁ ଜାଣୁଥିଲି ମୁଁ ଗୋଟିଏ ଧାର୍ମିକ ସ୍ଥାନରେ ଅଛି, କିନ୍ତୁ ସେ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ମୋ ନଜରକୁ ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରିପାରୁନଥିଲି। କଣ ଠିକ୍, କଣ ଭୁଲ — ସେ ବୟସରେ ସେ ବୁଝିବା ଶକ୍ତି ମୋର ନଥିଲା। ଏହା ପାପ କି ନୁହେଁ, ସେଥି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଜାଣୁନଥିଲି।

ମୁଁ କେବଳ ତା’ର ପଛେ ପଛେ ଚାଲୁଥିଲି… କାରଣ ସେ ମଧ୍ୟ ଯାଉଥିଲା ତିରୁଭାଲ୍ଲୁଭର ରକ୍ ଦିଗକୁ। ମନେ ହେଉଥିଲା ଯେପରି ସମୁଦ୍ର, ପବନ ଆଉ ଏହି ଅଜଣା ଆକର୍ଷଣ — ସବୁକିଛି ମୋତେ ଏକ ଅଜଣା କାହାଣୀ ଦିଗକୁ ଟାଣିନେଉଛି।

ସେ ଦିନ ସେଠାରେ ମୋର ଯାତ୍ରା କେବଳ ସ୍ଥାନ ଦେଖିବା ନଥିଲା… ମନେ ହେଉଥିଲା ମୁଁ ନିଜକୁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରଥମ ଥର ପାଇଁ ଆବିଷ୍କାର କରୁଥିଲି।

ଚାପ୍ଟର ୧ ଏଠିରେ ଶେଷ ହେଲା।
ଚାପ୍ଟର ୨ରେ ଆମେ ଆଗକୁ ଚାଲିବୁ…

କ୍ରମଶଃ…




ସତ୍ୟ ବନ୍ଧୁଚେୟାର୍‌ରେ ବସି ସିଗାରେଟ୍‌ର ଧୂଆଁ ସହ ସନ୍ଧ୍ୟାର ସୂର୍ଯ୍ୟାସ୍ତର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟକୁ ଶାନ୍ତ ମନେ ଉପଭୋଗ କରୁଥିଲି। ବାମ ହାତରେ ଚାର କପ,...
17/04/2026

ସତ୍ୟ ବନ୍ଧୁ

ଚେୟାର୍‌ରେ ବସି ସିଗାରେଟ୍‌ର ଧୂଆଁ ସହ ସନ୍ଧ୍ୟାର ସୂର୍ଯ୍ୟାସ୍ତର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟକୁ ଶାନ୍ତ ମନେ ଉପଭୋଗ କରୁଥିଲି। ବାମ ହାତରେ ଚାର କପ, ଡାହାଣ ହାତରେ ସିଗାରେଟ—ପ୍ରକୃତିର ନିରବତା ମଧ୍ୟରେ ବାଲକୋନୀରେ ବସି ଅଜଣା ଭାବନାରେ ହଜିଯାଇଥିଲି। ସିଗାରେଟ୍‌ରୁ ଉଠୁଥିବା ଧୂଆଁ ଧୀରେ ଉପରକୁ ଯାଇ ମୋ ମୁଣ୍ଡ ଉପରେ ଛୋଟ ମେଘ ଭଳି ଘୁରିବୁଲୁଥିଲା।

ସେହି ନିରବ ମୁହୂର୍ତ୍ତରେ ଗୋଟେ ପ୍ରଶ୍ନ ମନକୁ ଛୁଇଁଗଲା—କିଏ ହେଉଛି ମନୁଷ୍ୟର ପ୍ରକୃତ ବନ୍ଧୁ? ପରିବାର, ସମ୍ପର୍କୀୟ, ସ୍କୁଲର ସାଙ୍ଗ, କଲେଜର… ନା ଅଫିସର? ନା କି ସବୁ ଅନୁଭବ ପରେ ମଧ୍ୟ ଆମେ ସେଇ ପୁରୁଣା କଥାକୁ ଫେରିଯାଉ—କୁକୁର ହିଁ ମନୁଷ୍ୟର ପ୍ରକୃତ ବନ୍ଧୁ?

ବହୁତ ସମୟ ଭାବିବା ପରେ ଗୋଟେ କଥା ସ୍ପଷ୍ଟ ହେଲା—ଗୋଟେ ସମୟରେ ସମସ୍ତେ ଅଲଗା ହୋଇଯାନ୍ତି। ସମସ୍ତଙ୍କର ରାସ୍ତା ଭିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ, ମତ ଭିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ। ଏପରିକି ରାତି ଆସିଲେ ନିଜ ଛାଇ ମଧ୍ୟ ନିଜଠୁ ଅଲଗା ହୋଇଯାଏ। ତାହେଲେ କିଏ ନିଜର, କିଏ ଆପଣାର—ଏହି ପ୍ରଶ୍ନଟା ମନକୁ ଧରି ରହିଲା।

ଏହା ଭାବୁଥିବାବେଳେ ଅଜାଣତାରେ ଆଖିରୁ କିଛି ଲୁହ ଝରିଗଲା। ମୁଁ ବୁଝିପାରୁନଥିଲି ଯେ ମୁଁ ଚିନ୍ତିତ ନା ଦୁଃଖିତ। କିନ୍ତୁ ସେହି ଝରୁଥିବା ଲୁହ ମନେ ହେଉଥିଲା ଯେମିତି ମୋତେ କହୁଛି—“ଧୈର୍ଯ୍ୟ ରଖ, ମୁଁ ତୋ ସଂଗେ ଅଛି।” ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତ ପରେ ଛାତିଟା କିଛିଟା ହାଲୁକା ଲାଗିଲା।

ଶେଷରେ ମୁଁ ମୋର ଉତ୍ତର ଖୋଜି ପାଇଲି। ଏହି ଜୀବନର ଏକମାତ୍ର ସାଥି ସେଇ, ଯିଏ କେବେ ତାର ରଙ୍ଗ ବଦଳାଏନାହିଁ। ଜନ୍ମବେଳେ ଯେମିତି ଭୋକ ଲାଗିଲେ କାନ୍ଦର ସାଥ ଦେଇ ଆଖିରୁ ଝରିପଡ଼ୁଥିଲା, ଆଜି ମଧ୍ୟ ସେଇଭଳି ହୃଦୟରେ ଆଘାତ ଲାଗିଲେ ନିରବରେ ବାହାରିଆସେ।

ଆମେ ଯେତେବେଳେ କାହାକୁ କିଛି କହି ପାରି ନଥାଉ, ସେତେବେଳେ ମଧ୍ୟ ସେ ଆମ ମନର କଥାକୁ ଠିକ୍ ବୁଝିପାରେ। କିଛି ନ କହି ସେ ନିଜ ବାଟେ ବୋହିଯାଏ—କେବେ ଆମ ଜାଣତାରେ, କେବେ ଆମ ଅଜାଣତାରେ।

ଏହି ଦୁନିଆର ପ୍ରତ୍ୟେକ ସମ୍ପର୍କ କିଛିନା କିଛି ଆଶା ଓ ଶର୍ତ୍ତରେ ବାନ୍ଧା ଥାଏ। କିନ୍ତୁ ଲୁହ ସହ ଆମର ଯେ ସମ୍ପର୍କ, ସେଟା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିଷ୍ପ୍ରୟୋଜନ ଓ ନିର୍ଶର୍ତ୍ତ—ସେଥିପାଇଁ ସେ ଆମ ସାଙ୍ଗରେ ସବୁବେଳେ ରହିଯାଏ। ଶୁଣିବାକୁ ଲାଗେ ଯେ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏମିତି ନିର୍ଶର୍ତ୍ତ ଭଲପାଇବା ଥିଲେ ସମ୍ପର୍କ ସଦା ରହିପାରେ। କିନ୍ତୁ ସେଇ କଥା ଶୁଣିବାକୁ ଭଲ ଲାଗେ, ପଢ଼ିବାକୁ ଭଲ ଲାଗେ—ବାସ୍ତବରେ ତାହା କେତେ ଦୂର ସମ୍ଭବ, ସେଥିରେ ଅନେକ ସନ୍ଦେହ ଅଛି। କାରଣ ଆମେ ମନୁଷ୍ୟ—ଆମର ଆଶା ଅଛି, ଦାୟିତ୍ୱ ଅଛି; ଆଉ ଯେତେବେଳେ ସେଗୁଡିକ ପୂରଣ ହୁଏନାହିଁ, ସମ୍ପର୍କର ଶର୍ତ୍ତଗୁଡିକ ଭାଙ୍ଗିଯାଏ ଓ ସଂଘର୍ଷ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ।

ଲୁହ କେବେ କିଛି ମାଗେନାହିଁ। ସୁଖ ହେଉ କି ଦୁଃଖ, ସେ ସବୁବେଳେ ଆମ ସାଥିରେ ରହେ। ଆମ ଜୀବନର ଅବସ୍ଥାକୁ ନେଇ ସେ କେବେ ଆମକୁ ସଫଳ କିମ୍ବା ଅସଫଳ ବୋଲି ବିଚାର କରେନାହିଁ, ନାହିଁ ତାର ରୂପ କିମ୍ବା ରଙ୍ଗ ବଦଳାଏ।

ତା ପାଇଁ ଆମେ ଆଜି ମଧ୍ୟ ସେଇ ଛୁଆ, ଯିଏ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ନିଜର କରିନେଇଥାଏ। ଆମ ସୁଖରେ ସେ ଗର୍ବିତ ହୁଏନାହିଁ, ଆଉ ଦୁଃଖରେ କାତର ହୋଇ ଆମକୁ ବିବ୍ରତ କରେନାହିଁ। ବରଂ ସୁଖରେ ଝରି ସେ ଆମକୁ ନମ୍ର କରେ, ଆଉ ଦୁଃଖରେ ଭାଙ୍ଗି ପଡ଼ିବାକୁ ଦିଏନାହିଁ—ବିପରୀତରେ ଆମକୁ ଆହୁରି ବଳଶାଳୀ କରେ।

ଲୁହ ହେଉଛି ମନୁଷ୍ୟର ପରମ ବନ୍ଧୁ, କାରଣ ସେ କେବେ କିଛି ମାଗେନାହିଁ, ଅଭିମାନ କରେନାହିଁ, ନାହିଁ କିଛି ଆଶା ରଖେ। ସେ କେବଳ ନିରବରେ ଆମ ସାଙ୍ଗରେ ଚାଲିବାକୁ ଚାହେଁ—ଏନ୍ତୁଡ଼ି ଶାଳରୁ ମସାଣି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ।



25/01/2024

Happy Republic Day..

18/01/2024

Hi.

On this page I would be describing about the various Dressing type of Lord Jagannath. Which one happens on which date and what are the Speciality of that dressing type.




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17/01/2024


I have seen the coridor and I believe it looks good. It will definitely enhance the beauty of the which will give identities to all the people of on world level. Let's welcome it and try not to make politics out of this.

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24/06/2023

Jai Jagannath....

Here from this Rath Yatra 2023 onwards weekly I'll publish blogs related to Lord Jagannath which will definitely give uoh goosebumps. Will try to spread the stories as much as possible.

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैःस्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुत...
23/06/2023

रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः
स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः ।
दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया
जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥

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