Uttarakhand Roaming

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20/08/2021

नेलांग घाटी को उत्तराखंड का लद्दाख कहा जाता है. समुद्र तट से 11,000 फीट की ऊँचाई पर नेलांग घाटी में जाड़गंगा नदी बहती है...

कुमाउंनी रामलीला को दुनिया का सबसे लंबे ऑपेरा अर्थात नृत्य-नाटिका होने का दर्जा हासिल है जिस कारण इसे यूनेस्को ने विश्व ...
26/10/2020

कुमाउंनी रामलीला को दुनिया का सबसे लंबे ऑपेरा अर्थात नृत्य-नाटिका होने का दर्जा हासिल है जिस कारण इसे यूनेस्को ने विश्व सांस्कृतिक संपदा की सूची में स्थान दिया है.

कुमाऊं अंचल में रामलीला के मंचन की परंपरा का इतिहास लगभग 160 वर्षों से भी अधिक पुराना है. यहाँ की रामलीला मुख्यतः राम....

14/10/2020

Remembering Shailesh Matiyani on his Birthday

14/10/2020

"लो बेटे, रखो! ज़िद्दी औरत को समझाना तो खुदा के बस का भी नहीं. उसे उसके हाल पर छोड़, मेहमानों की फ़िक्र करो." Maimud Shailesh Matiyani Story

14/10/2020

मैंने लेखन के शुरुआती प्रयास उन्हीं की प्रेरणा से किये थे, पहले 1961 में अल्मोड़ा और उसके बाद 1966 में इलाहाबाद.. Remembering Shailesh M...

उत्तराखंड के चमोली जिले में खिले दुर्लभ ब्रह्मकमल के फूल, जानिए इन फूलों की खासियत।
14/10/2020

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रिपोर्ट – आरती बिष्ट देश के पहाड़ी इलाकों में सर्दी ने दस्तक दे दी है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ इलाकों मे.....

19/04/2020

तिब्बत से सटी नीति घाटी में बसा एक बेहद खूबसूरत गांव, जो उस द्रोणागिरी पर्वत को अपना भगवान मानता है जिसे हनुमान जी न...

उत्तराखण्ड राज्य जो कि हिमालय की गोद में बसा है जिसकी वजह से यह एक खास भौगोलिक परिस्थिति रखता है जिसमें ना जाने कितने बह...
09/03/2020

उत्तराखण्ड राज्य जो कि हिमालय की गोद में बसा है जिसकी वजह से यह एक खास भौगोलिक परिस्थिति रखता है जिसमें ना जाने कितने बहुमूल्य उत्पाद पैदा होते होंगे। आज हम एक ऐसे बहुमूल्य उत्पाद की बात कर रहे है जिसकी वर्तमान में शोध तथा वैज्ञानिक समुदाय में तो अच्छी पहचान है .

डॉ. राजेंद्र डोभाल, महानिदेशक -UCOST उत्तराखण्ड.
उत्तराखण्ड में बहुतायात मात्रा में उगने वाले इस उत्पाद को समान्यतः अमेज या सी-बकथॉर्न नाम से जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Hippophae जो कि एक Elacagnaceae कुल का पादप है। इसके अन्तर्गत विश्व में पायी जाने वाली कुल 7 प्रजातियों में से पांच मुख्य प्रजातियां Hippophae rhamnoids, H.salicifolia, H.neurocarpa, H.goniocarpa तथा H.tibetana हैं तथा जिनमें से तीन मुख्य प्रजातियां Hippophae rhamnoids, H.salicifolia तथा H.tibetana भारत में पायी जाती है। अमेज का मूल यूरोप तथा एशिया से माना जाता है, वर्तमान में इसकी अच्छी मांग और उपयोगिता को देखते हुए अमेरिकी देशों में भी उगाया जाने लगा है। भारत के उच्च हिमालयी राज्यों उत्तराखण्ड, हिमाचल तथा जम्मू कश्मीर आदि में यह 2000 से 3600 मीटर (समुद्र तल से) तक की ऊॅचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। उत्तराखण्ड राज्य के उत्तरकाशी, चमोली तथा पिथोरागढ जनपद में इसका बहुतायत उत्पाद होता है। इसे उत्तरकाशी में अमील, चमोली में अमेश तथा पिथोरागढ में चुक के नाम से जाना जाता है।

अमेश को हिपोपी भी कहा जाता है और इसमें लगने वाले फल को ही मुख्य रूप से उपयोग में लाया जाता है जिससे जूस, जेम, जेली तथा क्रीम आदि निर्मित कर उपयोग में लाया जाता है। विभिन्न वैज्ञानिक विश्लेषणों तथा इस पर हुए शोध के अनुसार यह एक विशेष पौष्टिक तथा औषधीय फल है। जिसमें कुछ विशेष औषधीय रसायन होने के कारण विभिन्न औषधीय गुण है। इसके एसेंसियल ऑयल में लगभग 190 प्रकार के बायोएक्टिव अवयव पाये जाते है। जिसकी वजह से इसके ऑयल की अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में खास मांग रहती है। प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा अन्य अमीनों एसिड की अच्छी मात्रा होने के साथ यह कैल्शियम, फास्फोरस तथा आयरन का अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। इसमें विटामिन सी की मात्रा 695 मिग्रा/100ग्रा जो कि नीबू तथा संतरे से भी अधिक है, विटामिन ई -10 मिग्रा/100ग्रा तक तथा केरोटिन 15मिग्रा/100ग्रा तक पाये जाते है। इसके अलावा यह विटामिन के का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है जो कि इसमें 230 मिग्रा/100ग्रा तक पाया जाता है। इसके फल का एक अलग ही स्वाद शायद ही

अमेश यानी सीबक्थोर्न के फलों से लकदक टहनी
किसी अन्य फल से मेल रखता हो जो कि इसमें मौजूद वोलेटायल अवयव जैसे कि इथाइल डोडेसिलोएट, इथाइल औक्टानोएट, डीलानौल, इथाइल डीकानोएट तथा इथाइल डोडेकानोएट आदि के कारण होता है। इसके अलावा यह एक अच्छा प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट का भी स्रोत है जो कि इसमें उपस्थित एस्कोर्बिक एसिड, टोकोफेरोल, कैरोटेनोइडस, फ्लेवोनोइडस आदि के कारण है। अच्छे पोषक तथा औषधीय रसायनों के कारण इसका उपयोग पाचन, अल्सर, हृदय, कैंसर तथा त्वचा रोगों में परम्परागत ही किया जाता है।

वर्तमान में अमेज से निर्मित विभिन्न व्यवसायिक उत्पाद जैसे एनर्जी ड्रिंक्स, स्किन क्रीम, न्यूट्रिशनल सप्लिमेंटस, टॉनिक, कॉस्मेटिक क्रीम तथा सेम्पू आदि बाजार में उपलब्ध है। यह त्वचा कोशिका तथा म्यूकस मेम्ब्रेन रिजेनेरेशन आदि में प्रभावी होने के कारण कॉस्मेटिक में खूब प्रयोग किया जाता है। रोमेनियो द्वारा इससे निर्मित क्रीम तथा शैम्पू विकसित कर अन्तर्राष्ट्रीय पेटेंट किया गया है। इसके अलावा अमेज को अच्छा नाइट्रोजन फिक्सेशन करने वाला पौधा भी माना जाता है जो कि लगभग 180मिग्रा/हैक्टअर प्रतिवर्ष नाइट्रोजन फिक्शेसन करने की क्षमता रखता है जो कि मिट्टी की उर्वरकता में प्रभावी होता है।

अमेश के फल बेहद खट्टे.
विश्वभर में अमेज से निर्मित विभिन्न उत्पादों की बढती मांग को देखते हुए इसका अच्छी मात्रा में उत्पादन किया जाता है। पूरे विश्व के सम्पूर्ण उत्पादन का लगभग 90 प्रतिशत उत्पादन चीन, रूस, कनाडा, मंगोलिया तथा उतरी यूरोप में होता है। प्राकृतिक रूप में लगभग 750 से 1500 किग्रा बेरी प्रति हैक्टेयर उत्पादन जंगलों से प्राप्त होता है। चीन में इसके लगभग 200 से अधिक प्रोसेसिंग प्लांट हैं। विस्तृत वैज्ञानिक तथा शोध अध्ययन के अनुसार अमेज की पौष्टिक तथा औषधीय महत्ता को देखते हुए पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की आर्थिकी का बेहतर विकल्प बनाया जा सकता है।

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09/03/2020

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उत्तराखंड में स्थित फूलों की घाटी में हर साल लाखों की तादाद में पर्यटक आते हैं और इसकी सुंदरता का लुत्फ उठाते हैं।

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12/12/2019

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