07/07/2025
कृतयुगे रत्नमयं लिङ्ग त्रेतायां हेम सम्भवम्।
द्वापरे पारद श्रेष्ठ पार्थिव तू कलो युगे।।
सत्य युग में मणिलिङ्ग, त्रेतायुग में स्वर्णलिङ्ग, द्वापर युग में पारदलिङ्ग और कलयुग में पार्थिवलिङ्ग सर्वश्रेष्ठ हैं (पार्थिवं तु कलौ युगे)।
जो निष्कामभाव से नित्य पार्थिवलिङ्ग का पूजन करता है, वह सदा के लिए शिवलोक में वास करता है।
त्रेता युग रामायण काल में भी महत्व अद्भुत प्रसंग :
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा।।
जब श्री राम जी लंका पर चढ़ाई करने लगे तब मिट्टी से पार्थिवेशर लिङ्ग का निर्माण कर उनकी पूजा अर्चना करके भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया।
रामजी के द्वारा स्थापित लिङ्ग था इसलिए आज उनको रामेश्वरम नाम से जाना जाता हैं
त्रेता युग में भी इसका महत्व:
बाणासुर नाम का असुर प्रति दिन सवा लाख शिवलिङ्ग निर्माण कर उनकी पूजा करता और शाम को नर्मदा में विसर्जन करता इसलिए आज भी नर्मदा में से निकलने वाले शिवलिङ्ग को नर्मदेश्वर लिङ्ग कहते है और बाणासुर द्वारा निर्माण किए गए इसलिए उनका दूसरा नाम बाणलिङ्ग भी है।
एक पार्थिव का नित्य पूजन पापों का नाश करने वाला, दो लिंगों का पूजन पूजन अर्थ की सिद्धि करने वाला और तीन लिंगों का पूजन सभी कामनाओं की सिद्धि करता है। एक ओर सारे दान, विविध व्रत, तीर्थ, नियम और यज्ञ है तथा उनके समकक्ष दूसरी ओर पार्थिव शिवलिंग का पूजन है।
पार्थिव शिवलिंग का पूजन करने में स्त्रियों का तथा अन्य सब लोगों का भी अधिकार है।
जो पार्थिव लिंग का निर्माण करके बिल्वपत्रों से ग्यारह वर्ष तक उसका त्रिकाल पूजन करता है, उस व्यक्ति के दर्शनमात्र से भोग और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती हैं
आप सभी सनातनी गौ भक्तों को गुरुपूर्णिमा एवम् श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनाएं। आपके ऊपर शिव जी की कृपा सदैव बनी रहे 🙏🙏