28/08/2025
कुल्लू-मनाली: देवभूमि की बदलती तस्वीर
हिमालय की शांत वादियों में,
जहाँ कभी ऋषियों ने तप किया,
मंत्रों की गूँज और देव परम्पराओं का आलोक फैला था,
वही कुल्लू-मनाली आज भी अपनी साँसों में उस पुरातन गंध को समेटे है।
यह भूमि कभी ध्यान और साधना का तीर्थ थी,
जहाँ मंदिरों की घंटियों की ध्वनि आत्मा को पवित्र करती थी,
जहाँ हर शिला, हर वृक्ष,
मानो ऋषियों की कथा कहता था।
पर आज…
देवभूमि का स्वरूप धुँधला पड़ रहा है।
अब यहाँ आने वाले, शांति नहीं खोजते—
वे मदहोशी और क्षणिक सुख के यात्री बन गए हैं।
जहाँ कभी तप की अग्नि जली थी,
अब हनीमून की हलचल और नशे का अंधकार पसर रहा है।
सड़कें चौड़ी हो गई हैं,
पर हृदय संकुचित हो गया है।
परम्पराओं की मर्यादा,
पर्यटन की भीड़ में कहीं खो गई है।
फिर भी…
पहाड़ों की बर्फ अब भी शुद्ध है,
देवताओं के मंदिर अब भी जीवित हैं,
और संस्कृति की जड़ें अब भी धरती में गहरी हैं।
जरूरत बस इतनी है कि हम फिर से
कुल्लू-मनाली को देवभूमि की आत्मा से जोड़ें।