Janki Birthpalace - Sitamarhi

Janki Birthpalace - Sitamarhi Sitamarhi is the native place of Maa Janki in Mithila region. It is a holy place for Hindu. The place was the karmabhoomi for maharishi pundarik.

Punaura Dham is the birthplace of Maa Sita, as per the Hindu mythology, Sita came out of a vessel when Raja Janak was ploughing field. Mithila state was facing the situation of drought, to overcome the drought, Raja Janak started ploughing field, when the plouging reached Punaura, the plough struck a vessel, due to the strike of the lower portion of the plough, the vessel broke and Sita came out o

f it. Raja Janak offered him the new baby but he denied the offer. As he was a saint he had no consistency in living. Raja Janak brought the baby child to his palace in Janakpur. The baby was named Sita, as the lower portion of the plough had struck the vessel and she was born

23/01/2024

पाहुन जी

05/09/2021

्री_महाकाल🙏🙏🙏

#इसे_पूरा_पढ़ें🙏🙏🙏

अंतिम सांस गिन रहे जटायु ने कहा कि "मुझे पता था कि मैं रावण से नही जीत सकता लेकिन फिर भी मैं लड़ा ..यदि मैं नही लड़ता तो आने वाली पीढियां मुझे कायर कहतीं".🚩
जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले.. तो मृत्यु आई और जैसे ही मृत्यु आयी.. तो गिद्धराज जटायु ने मृत्यु को ललकार कर कहा...🚩
"खबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना..! मैं तुझको स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकती... जब तक मैं माता सीता जी की "सुधि" प्रभु "श्रीराम" को नहीं सुना देता...🚩
मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर...मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला 🚩

किन्तु महाभारत के #भीष्म_पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे... आँखों में आँसू हैं ...
वे पश्चाताप से रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...🚩
कितना अलौकिक है यह दृश्य... रामायण में जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... 🚩
प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... 🚩
वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ?🚩

अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली... लेकिन भीष्म पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली...🚩
जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहे हैं.. प्रभु "श्रीराम" की शरण में....और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं..🚩

ऐसा अंतर क्यों..?.🚩

ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में #भीष्म_पितामह ने द्रौपदी चीरहरण देखा था... विरोध नहीं कर पाये और मौन रह गए थे..🚩
दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते... तो उनका साहस न होता, लेकिन द्रौपदी रोती रही... बिलखती रही... चीखती रही... चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... नारी की रक्षा नहीं कर पाये...🚩
उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और .... 🚩
जटायु ने नारी का सम्मान किया... 🚩
अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...🚩
जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति भीष्म जैसी होती है ... 🚩
जो अपना परिणाम जानते हुए भी...स्वयं एवं औरों के लिए संघर्ष करते है, उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है 🚩

अतः सदैव गलत का विरोध जरूर करना चाहिए । 🚩
"सत्य" परेशान जरूर होता है, पर पराजित नहीं । 🚩

🕉️जय श्री राम 🔥🙏🚩

🕉️हर हर महादेव 🔥🙏🚩

08/06/2021

*🌹 वट सावित्री पूजा-विधि कथा सहित 🌹*

*पूजन सामाग्री–*
बियन ८ टा, डाली ८ टा, बोहनी १ टा, अहिवात, उड़िद दाइल के बड़ १४ टा, सुतरी, सरवा २ टा, माईटक नाग-नागिन, केराक पात, लावा, एकटा सरवा मे दही, मुंग (फुलायल नैवेद्यक वास्ते), चना (फुलायल) , लाल कपड़ा, कनिया-पुतरा, साजी, अरवा चाउर, जनेऊ एक जोड़, गोटा सुपारी, फल, फूल, मिठाई, कांच हरदि, दुईब, गोटा धनिया, बिन्नी (लाल कपड़ा मे चाउर, दुईब, हरदि बान्हल), दूध ।
१. बोहनी आ सुतरी सँ बान्हल १४ टा बड़
२. केरा पात पर विष-विषहरा
३. विष-विषहरा
४. सरवा के ऊपर पानक पात पर गौर।

*पूजन विधि*

एक दिन पहिने व्रती (नव विवाहित कनिया) नहाय धोय कऽ अरवा-अरवाइन भोजन करथिन।
साँझ खनि पांच टा गीत— भगवती, महादेव, ब्राह्मण, हनुमान आर गौरी गीत गावि, दुईब, कांच हरदि, धनिया (कनी) मिला कऽ गौर बनत, जकरा ढउरल सरवा पर एकटा सिक्का पर गौरी राखि पानक पात सँ झांपि, पानक पात के ऊपर सिंदूरक गद्दी राखि ललका कपड़ा सँ झांपि भगवति लग राखल जायत।
उड़िद दालि के फुलाकऽ १४ टा बड़ पकाओल जायत, जकरा सरेला पर सुतरीमे गांथल जायत (बिना सुइया के) बड़ गुथल सुतरी के बोहनी के मुँह पर बान्हल जायत।
केराक पात पर सिन्दूर आ काजर सँ बिष-विषहारा लिखल जायत।
राति खन कनी मुंग आ बेसी बूट (काला चना) फुलय लऽ पड़त ।

वट सावित्री पूजाक दिन नव कनियाँ नहाय धोय कऽ सासुर सँ आयल नव कपड़ा पहिर, श्रृंगार कय, खोंईछ लय, भगवतीक पूजा कय, हाथ मे साजी (जाही मे कनिया-पुतरा रहत), आ माथ पर बोहनी (जाही मे लाबा भरल रहत आ जकरा मुँह पर सुतरी मे बान्हल 14 टा बड़ रहत) लय कऽ भगवती के गोड़ लागि सब संगे बड़क गाछ तर जेती। गाछ तर बोहनी मे राखल लाबा केराक पात पर राखि देथिन आ ओही बोहनी मे पानि भैर देथिन।
गाछ तर अरिपन रहत, एकटा अरिपन के ऊपर ७ टा बिअनि रहत आ सात टा डाली मे फुलायल बूंट, फल, मिठाई राखल रहत।
गाछ तर अहिवात जरायल जायत। एक टा डाली मे चाउर, सुपारी, जनऊ, पैसा, फल -मिठाई राखल रहत जे पूजा के बाद पंडितजी केँ देल जायत।
आमक पात पर ६० (साइठ) ठाम फुलायल मुंग आ फल-मिठाई के नवेद्य लगायल जायत।
एकटा बियनि पर आ एक टा आम पर पांच टा सिन्दूर लगा बड़क गाछ के जड़ि मे ‍‌‍‍राखल जायत।
अरिपन पर विष-विषहारा लिखल पात राखि ओही पर माईटक विष-विषहारा राखल जायत।
कनिया एक टा बड़क पात केश में खोंसती।
सबटा ओरिआन बाद कनिया गौरी सबहक (सासूर बला, नहिअर बला जे राति में बनल आ विवाह बला) आगु नवेद्य राखि फूल आ सिन्दूर लय गौरी पूजती ओकरा बाद बिन्नी हाथ मे लय जांघ तर बोहनी राखि कथा सुनती।
कथा सुनला के बाद कनिया साड़ी के खूंट पर गाछ तर रखलाहा आम आ एक टा सिन्दूरक गद्दी लऽ कऽ मौली धागा बांधैत गाछ के चारू तरफ पांच बेर घूमती, फेर गाछ तर राखल बियनि से गाछ के तीन बेर होंकैत गला मिलती।
आब पुतरा के हाथ सँ कनिया के सिंदूरदान हेतई (कनिये करेती)
ओकरा बाद सबटा नैवेद्य उसगरती आ विष-विषहरा के दूध लाबा चढे़ती।
बोहनी में बान्हल सबटा बड़ के वायां हाथ के अंगुठा और अनामिका सँ तोरि कऽ एक बेर आगु आ एक बेर पाछु फेकैत फकरा पढ़ती—बड़ लिय (पाछु ), मर दिय (आगु)
ओकरा बाद माथ पर फेर बोहनी उठेती, हाथ मे साजी लेती आ भगवती घर मे ऐती।
गाछ तर राखल डाली सेहो उठि कऽ भगवती घर मे रखायत।
भगवती के गोर लागि सात टा अहिवाती के डाली देथिन आ सब पैघ सब के गोर लागि आशीर्वाद लेती।

*वट सावित्री कथा*
एक टा गाम मे एकटा ब्राह्मण अपना कनिया और सात टा पुत्र संगे खुशी खुशी रहैत छलाह। हुनका घर के चौका मे चिनवार लग एक टा नाग-नागिन अपन बिल बना क रहैत छल। ब्राह्मणक कनिया साँपक डरे प्रतिदिन भात पसेला कऽ बाद ओकर गरम माँर साँपक बिल मे ढारि दैत छलईथ जाहि सँ साँपक सबटा पोआ (बच्चा) सब मरि जाईत छल। निरंतर अपन पोआ सब के मरला सँ क्रोधित भय नाग–नागिन एक दिन ब्राह्मण के श्राप देलखिन जे “जेना अहाँ हमार बच्चा सब के मारलहुँ तहिना अहाँ के वंश के सबटा बच्चा सब साँप के कटला सँ मरि जायत।" समयांतराल में ब्राह्मणक बड़का बेटा केँ हर्षोल्लास सँ विवाह भेलनि। विवाहोपरांत ब्राह्मण बेटा कनियाक द्विरागमन करा अपना घर दिश विदा भेला। रास्ता मे किछ देरक वास्ते सुस्तेवा लेल एक टा वट वृक्षक नीचा मे दुनू बर कनिया बैसलाह। ओहि गाछ के जइड़ मे एकटा धोधैर छल जाहिमे नाग-नागिन रहइत छलईथ। नाग-नागिन धोधैर सँ निकलि दुनू बर कनिया के डैँस लेलखिन जाहि सँ दुनू के मृत्यु भय गेल I ब्राह्मणक घर मे दुःखक पहाड़ टूटि पड़ल I अहिना कय कऽ ब्राहमणक छ्हो पुत्र केँ एक-एक करि कऽ सर्प-दोष सँ मृत्यु भय गेलनि I ब्राह्मण–ब्राह्मणि चिंतित रहय लगला आ अपन छोटका बेटा के हमेशा अपना आँखि के सामने रखैत छलैथ I बेटा के हमेशा झांपि-तोपि के रखैत छलैथ कि कतहुँ साँप–बिच्छु नञ काटि लई I ब्राह्मणक बेटा जखन पैघ भेला त धनोपार्जन हेतु घर सँ बाहर जेबाक लेल जिद्द करय लगला। पहिने त हुनकर माता-पिता हुनका बाहर भेजवा लेल तैयार नई होईत छला, फेर एही शर्त पर राजी भेला कि हमेशा अपना संगे एकटा छाता और जूता रखता। शर्त मानि ब्राह्मण बेटा घर सँ बिदा भेला।
जाईत-जाईत एकटा गाम लग पहुँचला, गाम के बाहर एकटा धार छल, ब्राह्मण बेटा जूता पहिर लेलथि आ धार के पार करय लगला। तखने गामक किछु लड़की सभहक झुण्ड सेहो धार पार करैत छली। सखी सब ब्राह्मणक बेटा केँ जुत्ता पहिर पानि मे जाईत देखि ठठहा कऽ हँसय लगली आ कहय लगली कि – “हे देखू सखि सब केहन बुरबक छै ई ब्राह्मणक बेटा, पानि मे जूता पहिरने अईछ।" ओहि झुण्ड मे एकटा सामा धोबिन के बेटी सेहो छल से सखि सबके अपन तर्क देलखिन जे –"हे सखि! नई बुझलौं, ब्राह्मण बेटा पानी मे जूता एही दुआरे पहिरने अछि जाहि सँ पानि मे रहय बला साँप–कीड़ा ओकरा पैर मे नइ काटि लइ।” ब्राह्मण बेटा ओहि लङकी के तर्क सुनि चकित भेला। धार पार कय सब गोटा आगु बढ़ल, धुप बेसी छल मुदा ब्राह्मण बेटा छाता अपना कांख तर दबने रहल, सब सखि सब मुँह झांपि मुस्कुराइत रहली आ सोचैत छलि, जे एतेक धुप छै आ ई मानुष छत्ता कांख तर दबैने अछि। बर रौउद छल आ गाम क उबर-खाबड़ मैइटक रस्ता, सब गोटा चलैत-चलैत थाईक गेली। रस्ता कात मे एकटा बरका विशाल बड़क गाछ छल जकरा देख सब गोटा ओहि छाया मे विश्राम करवा हेतु गाछ तर बैस रहल। ब्राह्मण बेटा जखने गाछ तर बैसला अपन कांखि तर दबल छत्ता खोइल ताइन लेलइथ। सब सखि सब फेर जोर सँ हंस लागलि आ कह लागलि जे –“देखिअऊ इ मानुष के धूप छल त छत्ता कांख तर देवेने छल आ जखन गाछ तर छाया मे बैसल अछि तऽ छत्ता तनने अछि।" सामा धोबिनक बेटी जे ब्राह्मण बेटा के बेर-बेर ध्यान सँ देखि रहल छलैथ, फेर अपन तर्क देलखिन जे –“हे सखि सब! अहाँ सब फेर नई बुझलौं, ई ब्राह्मण बेटा गाछ पर रहै बला साँप-कीड़ा सँ अपना के बचबै लेल गाछ तर छत्ता तनने अछि।" ब्राह्मण क बेटा जे बरी काल सँ सामा बेटी के तर्क सुनैत छला, ओकर बात सँ ततेक प्रभावित भेला कि सोचलैथ कि अगर विवाह करब त एही चतुर कन्या सँ करब। ब्राह्मण बेटा गामक धोबिन लग गेला आ धोबिन सामा सँ कहलखिन जे हम आहाँक चतुर बेटी सँ विवाह कर चाहैत छी। सामा धोबिन तैयार भय गेलि आ खुशी–खुशी दुनू के विवाह कय देलखिन। जखन बिदागरीक समय आयल त सामा धोबिन कहलखिन जे –“हे बेटी हम त गरीब छी, हमरा लग धन-दौलत किछु नहि अछि, अहाँ के हम बिदागरी में की दिय ?” सामाक बेटी ताहि पर उत्तर में कहलखिन जे –“हे माय! अहाँ हमरा किछु नञ मात्र कनी धानक लाबा, कनी दूध, बोहनी आ एक टा बियन दिय आ आशीर्वाद दिय जे हम अपना पति आ हुनकर वंश वृद्धि मे सहायक होइयन।” सामा धोबिन सब चीज जे हुनकर बेटी कहलकैन ओरिआन कय क देलखिन आ आशीर्वाद दय दुनू बर कनियाँ के विदा केलखिन। ब्राह्मण बेटा अपन कनिया के लय अपना गाम दिश चल लगला। चलैत-चलैत जखन दुनू गोटा थाईक गेला त विश्राम करवा लेल एक टा बड़क गाछ के नीचा मे रुकि गेला। सामा धोबिनक बेटी अपन माय क देल सबटा समान गाछ के निचा मे राखि अपना वर संगे आराम करय लगलि। ओही बड़क वृक्ष के जइड़ मे एकटा नाग-नागिन बिल में संगे रहैत छल। गाछ के जइड़ लग दूध, लाबा आ बोहनी मे राखल पानि देखि नाग कय भूख और प्यास जागृत भय गेल आ नाग अपना बिल सँ निकलि बाहर जयबाक लेल व्यग्र भ गेला। नागिन बेर-बेर मना कर लागलैथ किन्तु नाग नइ मानलैथ आ बाहर आबि जहिना बोहनी में राखल पानि के पिबा लेल ओहि में मुहँ देलखिन, धोबिन बेटी नाग समेत बोहनी के हाथ सँ पकड़ि अपना जाँघ तर मे दाबि कऽ राखि लेलैथ। नाग कतबो प्रयास केलैथ निकलि नहि पयलैथ। जखन बरि काल बितलाक बादो नाग घुरि क नहि अयलाह त नागिन बाहर निकललि आ देखलखिन जे नाग के त एकटा नव कनियाँ पकड़ने अछि। नागिन ओकरा सँ कहलखिन कि नाग के छोड़ि दिअऊ, परन्तु सामा बेटी नहि मानलखिन। नागिन के निरंतर अनुनय–विनय के बाद धोबिन बेटी एकटा शर्त राखलखिन जे –“हे नागिन हम अहाँ के पति नाग राज के तखने छोड़बनि जखन अहाँ हमरा पति आ हुनकर वंश के सर्प-दोष सँ मुक्त करब संगहि हुनकर छबो भाई के जे मरि गेल छैथ केँ पुनः जीवित करब।" नागिन विवश छली धोबिन बेटी के शर्त मानवा लेल। नागिन स्वर्ग सँ अमृत अनलेइथ आ ब्राह्मण के सबटा पुत्र सहित पुत्रवधु के जीवित कय सर्प–दोष सँ मुक्त कय सब के आशीर्वाद देलखिन। तखन जा कऽ धोबिन बेटी नाग के छोड़लखिन और अपन करनी लेल क्षमा माँगि नाग-नागिन के प्रणाम केलैथ। तखन नाग नागिन ब्राह्मण के सबटा पुत्र आ पुत्रबधु सबके आशीर्वाद दैत कहलखिन –“जेष्ठ मास के अमावश्या दिन विवाहित कनिया सब ज्यों बड़ के गाछ के पूजा करती आ बिष-विषहारा केँ दूध लाबा चढ़ा हुनकर पूजा करती तँ हुनकर सब के सुहाग अखण्ड रहतैन।"

नाग–नागिन सँ आशीर्वाद लय ब्राह्मणक सातो पुत्र आ' सातो कनिया जखन अपना घर पहुँचला त ब्राह्मण-ब्राह्मणि के प्रसन्ताक नई तऽ कुनु ओर रहलनि नञ छोड़ आ दुनू गोटा धोबिन सामा के बेटी के बहुत बहुत आशीर्वाद देलखिन। ओकरा बाद सब गोटा प्रसन्ता पूर्वक रहय लगला।

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*मिथिला संस्कृति सँ साभार*
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त्रयोदशी व्रत परेद्युः , चतुर्दशी व्रत परश्वःअर्थात:- त्रयोदशी व्रत काल्हि सोमदिन ७ जून आ चतुर्दशी व्रत परसु मंगलदिन ८ ज...
06/06/2021

त्रयोदशी व्रत परेद्युः , चतुर्दशी व्रत परश्वः
अर्थात:- त्रयोदशी व्रत काल्हि सोमदिन ७ जून आ चतुर्दशी व्रत परसु मंगलदिन ८ जून २०२१क होयत।
हिंदू सनातन धर्म मे त्रयोदशी तिथि खास मानल गेल अछि। इ व्रत प्रत्येक मासक शुक्ल आ कृष्ण पक्षक त्रयोदशी तिथि होइत अछि। जे प्रदोष व्यापिनि होइत अछि। एहि दिन भगवान शंकरक पूजा, आराधना कएल जाइत छन्हि। ज सोमदिनक प्रदोष व्रत पड़ैत अछि त ओकरा सोम प्रदोष व्रत कहल जाइत अछि।

सोम प्रदोष भगवान शंकरक पूजा, व्रत, आराधना आ स्तुतिक विशेष महत्व अछि। एहि दिन प्रदोष काल बहुत उत्तम समय मानल गेल अछि। एहि समय कएल गेल भगवान शिवक पूजा सँ अमोघ फलक प्राप्ति होइत अछि।
ां_जानकी🙏🙏🙏

30/05/2021
अपना ओहिठाम जखन कोनो ब्राह्मण नीचा (पृथ्वी) पर बैसय लगय छथि, तँ लोकसभ कहैत छथिन जे ओना नहि बैसू। तकर कारण बरका-बरका भोज ...
09/05/2021

अपना ओहिठाम जखन कोनो ब्राह्मण नीचा (पृथ्वी) पर बैसय लगय छथि, तँ लोकसभ कहैत छथिन जे ओना नहि बैसू। तकर कारण बरका-बरका भोज मे जखन आसन सभ लेल उपलब्ध नहि होइत छल, तँ पुआर के बीरी बनाय बैसय लेल तत्कालीन व्यवस्था कएल जाइत छलैक। प्रायः अपने अवश्य देखने होयब।

शास्त्र मे कहल गेलअछि :-
ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्राम च पुस्तकं।
वसुंधरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं।

ब्राह्मणक पोन, शंख, शालिग्राम भगवान, पुस्तक आ स्त्रीक स्तन, एहि सभहक भार पृथ्वी वहन नहि कए सकैत छथि। यदि पृथ्वी पर एहि सभहक भार देल जाइछ तँ भार सँ ओ विचलित भए जाइत छथि।
अतः बिना आसन/आधार के ब्राह्मण, शंख, शालीग्राम, पुस्तक आ स्त्रीक स्तन, पहिरल पवित्री, जप कएल रुद्राक्षक मालाक स्पर्श जमीन सँ नहि होयबाक चाहि।
🙏🌷🌹🌻⚘🌺🙏🏼

05/05/2021

्री_महाकाल🙏🙏🙏

श्रेष्ठ पुरुष वही है, जो संसार (शरीरादि पदार्थों) को और 'स्वयं' (अपने स्वरूप) को तत्त्व से जानता है। उसका यह स्वाभाविक अनुभव होता है कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, धन, कुटुम्ब, जमीन आदि पदार्थ संसार के हैं, अपने नहीं। इतना ही नहीं, वह श्रेष्ठ पुरुष त्याग, वैराग्य, प्रेम, ज्ञान, सद्गुण आदि को भी अपना नहीं मानता; क्योंकि उन्हें भी अपना मानने से व्यक्तित्व पुष्ट होता है, जो तत्त्व प्राप्ति में बाधक है। 'मैं त्यागी हूँ', 'मैं वैरागी हूँ', 'मैं सेवक हूँ', 'मैं भक्त हूँ' आदि भाव भी व्यक्तित्व को पुष्ट करनेवाले होने के कारण तत्त्व प्राप्ति में बाधक होते हैं। श्रेष्ठ पुरुष में (जड़ता के सम्बन्ध से होनेवाला) 'व्यष्टि अहंकार' तो होता ही नहीं, और 'समष्टि अहंकार' व्यवहार मात्र के लिये होता है, जो संसार की सेवा में लगा रहता है; क्योंकि अहंकार भी संसार का ही है।

संसार से मिले हुए शरीर, धन, परिवार, पद, योग्यता, अधिकार आदि सब पदार्थ सदुपयोग करने अर्थात् दूसरों की सेवा में लगाने के लिये ही मिले हैं; उपभोग करने अथवा अपना अधिकार जमाने के लिये नहीं। जो इन्हें अपना और अपने लिये मानकर इनका उपभोग करता है, उसको भगवान् चोर कहते हैं - 'यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः' (गीता ३/१२)। ये सब पदार्थ समष्टि के ही हैं, व्यष्टि के कभी किसी प्रकार नहीं। वास्तव में इन पदार्थों से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रेष्ठ पुरुष के अपने कहलाने वाले शरीरादि पदार्थ (संसार के होने से) स्वतः स्वाभाविक संसार की सेवा में लगते हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के हित में उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।

'देने' के भाव से समाज में एकता, प्रेम उत्पन्न होता है और 'लेने' के भाव से संघर्ष उत्पन्न होता है। 'देने' का भाव उद्धार करने वाला और 'लेने' का भाव पतन करने वाला होता है। शरीर को 'मैं', 'मेरा' अथवा 'मेरे लिये' मानने से ही 'लेने' का भाव उत्पन्न होता है। शरीर से अपना कोई सम्बन्ध न मानने के कारण श्रेष्ठ पुरुष में 'लेने' का भाव किञ्चिन्मात्र भी नहीं होता। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरों का हित करने वाली ही होती है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुष के दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप, चिन्तन आदि से स्वतः लोगों का हित होता है। इतना ही नहीं, उसके शरीर को स्पर्श करके बहनेवाली वायु तक से लोगों का हित होता है।

ादेव🙏🙏🙏

02/05/2021

्री_महाकाल🙏🙏🙏

#कोरोना_पार्ट_2_की_गिरफ्त_में_अचानक_भारत_कैसे_आ_गया?

आओ जरा विचार करें।

Covid 19 की Sucessfull Handling से और वैक्सीन डिप्लोमेसी से पूरे विश्व में भारत का डंका बजा और पूरे भारत में भी मोदी सरकार की जय जय कार होने लगी।

देश की अर्थव्यवस्था भी दौड़ने लगी। इसी बीच फर्जी किसान आन्दोलन भी फुस्स होने लगा। बंगाल चुनाव जो चर्चा में बना रहा, वहां पर भाजपा के जीतने की प्रबल संभावना बनने लगी।

इसी दौरान कुछ घटनाएं वैश्विक और अंदरूनी तौर पर हुई। चीन को बॉर्डर से पिट के वापसी करनी पड़ी। पूरे विश्व में भारतीय फार्मेसी का डंका बजने लगा।

इससे चीन को तो समस्या होनी स्वाभाविक ही थी मगर #लेफ्ट_लिबरल_बिडेन को भी तकलीफ हुई। #एंजेला_मर्केल को भी भारत से ईर्ष्या हुई।
अंदरूनी तौर पर महाराष्ट्र की अघाड़ी सरकार सचिन वाजे के मनसुख केस में द्वारा पकड़े जाने से हिल गई। फिर कमिश्नर पुलिस का लेटर और देशमुख का इस्तीफा।

इन सब घटनाओं से बंगाल चुनाव के बाद महाराष्ट्र में गंजे ठाकरे की सरकार गिरना तय माना जा रहा था।

पिछले महीने राहुल गांधी ने एक अमेरिकन सीनेटर को कहा कि भारत में डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूशन्स पर मोदी का कब्जा हो रहा है। अब वहां सत्ता परिवर्तन डेमोक्रेटिक तरीकों से नहीं हो सकता। मतलब भारत के खिलाफ भारत के नेता वैश्विक तौर से माहौल बना रहे थे।

अचानक महाराष्ट्र में कोरोना की दूसरी लहर शुरू होने लगी। जो मार्च के दूसरे सप्ताह से शायद शुरू हुई।

मित्रों, ये सब अनायास ही नहीं हुआ है कोरोना 2 को महाराष्ट्र, केरल, पंजाब, दिल्ली व छत्तीसगढ़ के रास्ते पूरे देश में फैलाया गया है।

एक और बात हमारे सिस्टम को Overwhelm करने के लिए सब कुछ साथ साथ हुआ है। बहुत जल्दी हाहाकार की स्थिति बनाने के लिए ऑक्सीजन की मारामारी व कालाबाज़ारी सब साथ साथ शुरू किया गया है।

आम तौर से 90 तक के ऑक्सीजन लेवल को नार्मल माना जाता रहा है उस नार्मल को अब 94 कहा का जा रहा है।

मतलब किसी की 91 भी आ जाये तो उसकी जान सांसत में आ जाएगी। इसलिए लोगों ने ऑक्सीजन को भी घरों में कैद कर लिया है। ऐसा लगता है कि मानो पूरे देश को भ्रमित कर दिया गया हो।

अब इसी कड़ी में अमेरिका का Attitude देखिये और उसको राहुल गांधी की अमेरिकन सांसद से मीटिंग देखिये।

मित्रों, भारत के अगल बगल में पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान व श्रीलंका कहीं भी कोई कोरोना नहीं है।

भारत को टारगेट किया गया है। इसमें देश के गद्दार व बिकाऊ मीडिया शामिल है। इन सब ने ये बताने की कोशिश की है कि मोदी के बस में नही है देश चलाना।

आप इन सब घटनाओं पर गौर कीजिए और फैसला कीजिये।

ादेव🙏🙏🙏

Address

Punaura Dhaam
Sitamarhi
843302

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