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12/05/2026

जब भी आर्थिक संकट आता है, महंगाई बढ़ती है, युद्ध का असर पड़ता है या वैश्विक हालात बिगड़ते हैं — सबसे पहले बोझ जनता पर डाल दिया जाता है।
कभी टैक्स बढ़ाओ, कभी खर्च कम करो, कभी सुविधाएँ छोड़ो।
लेकिन क्या कभी सत्ता ने अपने खर्च कम किए?

आज आम आदमी सिलेंडर, बिजली, स्कूल फीस, दवाई और रोज़मर्रा की महंगाई से जूझ रहा है, जबकि नेताओं की सुविधाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं।

हाल ही में सांसदों (MPs) की सैलरी, भत्तों और पेंशन में लगभग 24% तक बढ़ोतरी कर दी गई। उनकी मासिक सैलरी ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹1.24 लाख कर दी गई, साथ ही भत्ते और पेंशन भी बढ़ाए गए। 

कई राज्यों में विधायकों (MLAs) की सैलरी में भी भारी बढ़ोतरी हुई। ओडिशा में तो विधायकों की मासिक आय लगभग तीन गुना तक बढ़ा दी गई। 

सवाल ये है:
जब जनता से कहा जा रहा है कि खर्च कम करो, तो नेताओं पर ये नियम क्यों लागू नहीं होते?

अगर देशहित की इतनी चिंता है, तो सबसे पहले:
• नेताओं और मंत्रियों की VIP सुविधाएँ बंद होनी चाहिए
• आजीवन पेंशन समाप्त होनी चाहिए
• करोड़ों के सरकारी विज्ञापन बंद होने चाहिए
• चुनावी रैलियों में फिजूलखर्ची रुकनी चाहिए
• सरकारी पैसों से होने वाला प्रचार बंद होना चाहिए
• सांसदों और विधायकों की सैलरी बढ़ाने से पहले जनता की आय और रोजगार पर चर्चा होनी चाहिए

और सबसे जरूरी — चुनाव के समय मुफ्त राशन, मुफ्त पैसा और लालच देकर वोट लेने की राजनीति बंद होनी चाहिए।
देश मुफ्त बाँटने से नहीं, मजबूत अर्थव्यवस्था और रोजगार से चलता है।

भारत की चुनाव प्रक्रिया को भी बदलने की जरूरत है।
जापान जैसे देशों में चुनाव प्रचार सीमित, अनुशासित और कम खर्चीला होता है।
वहाँ पोस्टर, रोड शो, हेलीकॉप्टर और दिखावे की राजनीति कम होती है, जबकि हमारे यहाँ चुनावों में हजारों करोड़ पानी की तरह बहाए जाते हैं।
बाद में उसी जनता से कहा जाता है — “खर्च कम करो।”

अब जनता ये भी देख रही है कि पिछले 10 वर्षों में राजनीतिक पार्टियों, खासकर बीजेपी का फंड कई गुना बढ़ा है।
ADR की रिपोर्टों के अनुसार हाल के वर्षों में बीजेपी को मिलने वाला चंदा बाकी राष्ट्रीय पार्टियों के मुकाबले कई गुना ज्यादा रहा है। 2024-25 में बीजेपी को मिले दान बाकी सभी राष्ट्रीय पार्टियों के कुल दान से लगभग 10 गुना ज्यादा बताए गए। 

इलेक्टोरल बॉन्ड्स और बड़े कॉर्पोरेट फंडिंग के जरिए भी बीजेपी को सबसे ज्यादा फंड मिला। कई रिपोर्टों में बताया गया कि कुल इलेक्टोरल बॉन्ड फंडिंग का सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी को गया। 

तो जनता पूछ रही है:
जब पार्टियों के फंड लगातार बढ़ रहे हैं, नेताओं की सैलरी बढ़ रही है, चुनावों में करोड़ों खर्च हो रहे हैं — तब त्याग सिर्फ जनता ही क्यों करे?

अगर युद्ध और वैश्विक संकट इतने दिनों से चल रहा था, तो चुनाव से पहले देशहित क्यों याद नहीं आया?
तब विशाल रैलियाँ, विज्ञापन, रोड शो और प्रचार पर करोड़ों क्यों खर्च हुए?

देशभक्ति का मतलब सिर्फ जनता से बलिदान मांगना नहीं होता।
सच्ची देशभक्ति तब होगी जब सत्ता में बैठे लोग खुद अपने खर्च कम करें और उदाहरण पेश करें।

अब जनता को भावनाओं से नहीं, सवालों से जागना होगा।
लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने के लिए नहीं होती, सवाल पूछने के लिए भी होती है।

हर बार आम आदमी को बकरा बनाना बंद करो

#जनता_से_सवाल
ंस्कृति_बंद_करो
#जनता_को_बकरा_बनाना_बंद_करो


#महंगाई


#सवाल_पूछो
#देशहित_पहले
#भारत_जागो
#काम_की_राजनीति



#लोकतंत्र

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