19/08/2025
#केदारताल_ट्रैक
हम लोगों ने तो बाबा केदारनाथ और केदार कंठा ट्रैक के बारे में जरूर सुना होगा मगर केदारताल के बारे में हम में से बहुत कम लोग ही जानते होंगे।
उत्तराखंड की प्रमुख छोटा चारधाम यात्रा के मुख्य तीर्थ स्थल गंगोत्री से मात्र 17 किलोमीटर की दुरी पर स्थित केदारताल ट्रेक उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय ट्रेक में से एक है।
वास्तव में समुद्रतल से 4900 मीटर (16075 फुट) की ऊंचाई पर स्थित केदारताल एक हिमनद झील है जिसके पानी का मुख्य स्त्रोत झील के आसपास में स्थित माउंट थलयसागर ( 6904 मीटर ), माउंट भृगुपंथ (6,772 मीटर) और माउंट मंदार (6,672 मीटर) जैसे हिमालय के विशाल पर्वत है।
इसके अलावा केदारताल केदारगंगा जैसी पवित्र नदी का उद्गम स्थल भी माना जाता है। केदारगंगा आगे जाकर भागीरथी नदी में विलय हो जाती है जो की पवित्र गंगा नदी की 12 सहायक नदियों में से एक है।
गंगोत्री से शुरू होने वाला केदारताल ट्रेक एक कठिन श्रेणी का ट्रेक माना जाता है, क्योंकि इस पुरे ट्रेक के दौरान आपको कई बार 45 डिग्री तक खड़ी चढ़ाई करनी पड़ती है और इसके अलावा इस जगह पर भुस्खलन की संभावना भी हर समय भी बनी रहती है इस वजह से इस पुरे ट्रेक को कठिन श्रेणी के ट्रेक में माना जाता है।
गंगोत्री से केदारताल ट्रेक पूरा करने की कुल अवधि 4-5 दिन मानी जाती है। और इस पुरे ट्रेक के दौरान आप गंगोत्री से भोजखरक और केदारखरक होते केदारताल पहुंच सकते है। पुरे ट्रेक के दौरान आप हिमालय के पहाड़ों में स्थित घने जंगलो और खड़ी चट्टानों को पार करते हुए केदारताल पहुचंते है जो की आपकी यात्रा को और भी रोमांचक और यादगार बना देता है।
केदारताल हिमालय के उन गिने-चुने ट्रेक में से एक है जहाँ से आपको हिमालय के सबसे विशाल पर्वत एक साथ दिखाई देते है जैसे – मांडा पर्वत, माउंट गंगोत्री, माउंट थलयसागर, माउंट जोगिन और माउंट भृगुपंथ। उत्तराखंड में जितने भी ट्रेक है उन सभी ट्रेक में सबसे कम भीड़ आपको इस ट्रेक पर मिलती है क्योंकि सिर्फ अनुभवी ट्रेकर ही इस ट्रेक पर जाना पसंद करते है।
इसलिए अगर आपको केदारताल ट्रेक करना है तो आप जितना हो सके उतना अपने आपको शारीरिक रूप से सक्षम बनाये और हो सके तो इस ट्रेक को करने से पहले 2-4 मध्यम श्रेणी के ट्रेक कर लें ताकि आप यह ट्रेक आसानी से पूरा कर पाएं।
केदारताल का इतिहास -
उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध ट्रेक होने के साथ-साथ केदारताल को हिन्दू धर्म में भगवान शिव की झील के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव ने स्वयं इस झील का जल पिया था । और इसी वजह से हिन्दू धर्म में केदारताल का धार्मिक महत्व भी बढ़ जाता है। केदारताल से जुडी हुई पौराणिक कथा देवता और दानवों के द्वारा अमृत के लिए समुद्र मंथन के समय से जुडी हुई है।
ऐसा माना जाता है की जब देवताओं और दानवों ने मिल कर समुद्र मंथन किया था, तब उस समय समुद्र मंथन से निकलने वालों 14 रत्नो में एक हलाहल विष (कालकूट विष ) भी सम्मिलित था। पौराणिक कथा के अनुसार हलाहल विष में इतनी ज्यादा गर्मी थी की समुद्र मंथन के समय उपस्थित सभी देवता और दानव जलने लग गए थे इसके अलावा यह भी माना जाता है की इस विष में पुरे ब्रम्हांड को समाप्त करने की क्षमता थी।
हलाहल विष के प्रभाव से बचने के लिए देवताओं और दानवों ने भगवान शिव से इस पीने की प्रार्थना की। देवताओं और दानवों की प्रार्थना को स्वीकार करने के बाद जब भगवान शिव ने हलाहल विष पिया तो इस वजह से उनके कंठ में बहुत तेज जलन होने लगी।
ऐसा माना जाता है की हलाहल विष से होने वाली जलन को शांत करने के लिए भगवान शिव गंगोत्री से कुछ दुरी पर स्थित एक ताल का पानी पिया था जिसे आज हम सभी केदारताल के नाम से जानते है। और ऐसा भी माना जाता है की उसी समय केदारताल से केदार गंगा नदी का निर्माण हुआ था।
ट्रैकिंग रूट
पहला दिन - देहरादून से गंगोत्री (दुरी 237 किलोमीटर)
दूसरा दिन- गंगोत्री से भोजखरक (8 किमी ट्रेक)
तीसरा दिन - भोजखरक से केदारखरक (4 किमी ट्रेक)
चौथा दिन - केदारखरक से केदारताल (5 किमी ट्रेक)
पांचवा दिन - केदारताल - भोजखरक - केदारखरक - गंगोत्री (17 किमी वापसी)
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8449689525