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04/03/2024
22/01/2024


 : भगवान  शिव की नगरी में उनके पुत्र गणपति जी का एक मंदिर ऐसा हैं जहां वह स्वयं भी त्रिनेत्रधारी हैं। बड़ा गणेश के नाम स...
26/11/2023

: भगवान शिव की नगरी में उनके पुत्र गणपति जी का एक मंदिर ऐसा हैं जहां वह स्वयं भी त्रिनेत्रधारी हैं। बड़ा गणेश के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर का इतिहास हजारों साल ka hai
Ganesh Ji temple of , वाराणसी स्थित बड़ा गणेशमुख्य बातेंइस मंदिर में स्वयंभू है भगवान की प्रतिमा40 खंभों पर बना है यह सुप्रसिद्ध मंदिरविघ्नहर्ता के यहां दर्शन से दूर होते हैं कष्ट
काशी यानी वाराणसी में भगवान गणपति का विशेष और प्रमुख मंदिर है बड़ा गणेश। यहां इन्हें वक्रतुण्ड के नाम से भी जाना जाता है। यहां गणपति जी की प्रतिमा स्वयंभू हैं और उनके दो नहीं अपने पिता शिवजी के तरह तीन नेत्र हैं। सिंदूरी रंग गणेश प्रतिमा के दर्शन करने मात्र से मनुष्य के बहुत से कष्ट दूर हो जाते हैं। माना जाता है कि बड़ा गणेश भगवान के दर्शन-पूजन से सारे ही रुके हुए कार्य पूरे हो जाते हैं और तरक्की की राह आसान हो जाती है। गणपति जी यहां अपनी पत्नी रिद्धि-सिद्धि और पुत्र शुभ-लाभ के साथ यहां विराजमान है। इस मंदिर में देवी मन्सा, संतोषी मां और हनुमान जी भी मौजूद हैं। वहीं गर्भगृह में गणपति जी तो गर्भगृह के बाहर उनकी सवारी मूषकराज विराजमान हैं।

गंगा के किनारे बसे उत्तर प्रदेश का शहर काशी (वाराणसी) सबसे पुराने शहरों में से एक है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख क...
21/11/2023

गंगा के किनारे बसे उत्तर प्रदेश का शहर काशी (वाराणसी) सबसे पुराने शहरों में से एक है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से बनारस में है। काशी में बसे भगवान शिव और माता पार्वती के महत्व के बारे में तो हर कोई जानता है लेकिन काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव का भी महत्व उतना ही खास और अहम है। काशी में एक बहुत ही पुरानी कहावत है कि ''पहले 'काशी कोतवाल' की पूजा फिर काम दूजा...''। जी हां, धार्मिक मान्यता है कि इस शहर में कोई भी शुभ काम करने से पहले 'काशी कोतवाल' यानी बाबा काल भैरव की पूजा की जाती है। इसलिए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 13 दिसंबर 2021 को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण से पहले काल भैरव की पूजा करने पहुंचे थे। कहा जाता है कि काशी नगरी में काल भैरव की मर्जी चलती है। भगवान शिव की पूजा करने से भी पहले इनको यहां पूजा जाता है। आइए जानें क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी और काशी के लिए इतने क्यों जरूरी हैं काल भैरव कोतवाल।

बाबा विश्‍वनाथ हैं काशी के राजा और कोतवाल हैं काल भैरव
भगवान शंकर की नगरी कही जानेवाली काशी को लेकर धार्मिक मान्यता है कि इस शहर के राजा बाबा विश्‍वनाथ हैं। वहीं काशी का कोतवाल काल भैरव को कहा जाता है। मान्यता है कि इस शहर में भैरव बाबा की मर्जी के बिना कुछ भी नहीं होता है और पूरी नगरी की देखरेख उन्ही के हाथों में है। काशी के रहने वाले लोगों का ये भी कहना है कि बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर के पास एक कोतवाली भी है, जिसकी रक्षा खुद काल भैरव करते हैं। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।

आइए जानें कैसे बने भैरव बाबा काशी के कोतवाल?
काल भैरव के काशी के कोतवाल यानी काशी में स्थापित होने के पीछे एक पौराण‍िक कथा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि एक बार भगवान ब्रह्माजी और विष्णुजी के बीच चर्चा छिड़ गई कि उन दोनों में से आखिर कौन बड़ा और शक्तिशाली है। इस विवाद के बीच भगवान शिव की चर्चा हुई। इसी चर्चा के दौरान ब्रह्माजी के पांचवें मुख ने भगवान शिव की आलोचना कर दी। ये सुनकर बाबा भोलेनाथ बहुत अधिक क्रोधित हो गए। कहा जाता है कि भगवान शिव के इसी गुस्से से काल भैरव का जन्म हुआ। यही वजह है कि काल भैरव को शिव का अंश भी माना जाता है। काल भैरव ने शिव के आलोचन करने वाले ब्रह्माजी के पांचवें मुख को अपने नाखुनों से काट दिया था।

ब्रह्म हत्‍या के दोष ने भैरव बाबा को पहुंचाया काशी
काल भैरव ने गुस्से में ब्रह्माजी के पांचवें मुख को काट तो दिया लेकिन वो मुख काल भैरव के हाथ से अलग ही नहीं हो रहा था। इस वक्त वहां शिव जी प्रक्रट हुए। शिव ने काल भैरव से कहा, तुमने ये क्या किया... तुम्हे तो ब्रह्म हत्‍या का दोष लग गया है। इस दोष को मिटाने का एक ही तरीका है कि तुम एक आम व्‍यक्ति की तरह तीनों लोकों का भ्रमण करो। जिस स्थान पर ये ब्रह्मा का ये पांचवां मुख तुम्‍हारे हाथ से छूट जाएगा, वहीं पर तुम इस पाप से मुक्‍ती पाओगे।

इतना आसान नहीं था काल भैरव को मुक्ति मिलना...!
भगवान शिव का आदेश मिलके ही बाबा भैरव तीनों लोकों का भ्रमण करने के लिए पैदल यात्रा पर निकल पड़े। लेकिन जैसे ही वह अपनी पैदल यात्रा शुरू कर रहे थे तो शिवजी की प्रेरणा से वहां एक कन्या प्रक्रय हो गई। कहा जाता है कि ये एक बहुत ही तेजस्‍वी कन्‍या थी, जो अपनी जीवा से कटोरे में रखे रक्‍त का पान कर रही थी। यह कन्या कोई आम कन्या नहीं बल्कि ब्रह्म हत्‍या थी। शिवजी ने इस कन्या को भैरव के पीछे छोड़ा था ताकि भैरव तीनों लोकों का भ्रमण करना ना छोड़े।

जब काशी में पहुंचे भैरव तो छूटा ब्रह्म हत्‍या का दोष
पौराण‍िक कथा के मुताबिक तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए जब भैरव बाबा काशी पहुंचे तो उनका पीछा कर रही कन्या छूट गई। शिवजी की आज्ञा के मुताबिक काशी में इस कन्‍या का प्रवेश करना मना था। काशी में जैसे ही भैरव बाबा गंगा के तट पर पहुंचे तो यहां भैरव बाबा के हाथ से ब्रह्माजी का शीश अलग हो गया। इसी के साथ भैरव बाबा को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काल भैरव को पाप से मुक्ति मिलते ही भगवान शिव वहां प्रक्रट हुए और उन्होंने काल भैरव को वहीं रहकर तप करने का आदेश दिया। उसके बाद से कहा जाता है कि काल भैरव इस नगरी में बस गए।

'तुम कहलाओगे काशी के कोतवाल'
पौराण‍िक कथा के मुताबिक काशी में काल भैरव को तप करने का आदेश देते हुए बाबा विश्ववनाश ने काल भैरव को आशीर्वाद भी दिया था। भगवान शिव ने काल भैरव को आशीर्वाद दिया कि तुम इस नगर के कोतवाल कहे जाओगे और युगो-युगो तक तुम्हारी इसी रूप में पूजा की जाएगी। कहा जाता है कि शिव का आशीर्वाद पाकर काल भैरव काशी में ही बस गए और वो जिस स्थान पर रहते थे वहीं काल भैरव का मंदिर स्‍थापित है।

बाबा विश्‍वनाथ के दर्शन से पहले भैरव के करते हैं लोग दर्शन
कहा जाता है कि बाबा विश्‍वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव का दर्शन करना चाहिए, क्योंकि वही इसी काशी नगरी के रक्षक और कर्ता-धर्ता हैं। काल भैरव ही हैं, जो लोगों को आशीर्वाद भी देते हैं और सजा भी। ऐसी मान्यता है कि काशी में काल भैरव की मर्जी के बिना यमराज भी किसी के प्राण नहीं ले जा सकता है। कहा जाता है कि काशी में जिसने काल भैरव के दर्झन नहीं किए , उसको बाबा विश्वनाथ की पूजा का भी फल नहीं मिलता है। बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर का जिक्र महाभारत और उपनिषद में भी किया गया ह

Out of 88 ghats of Varanasi, Dashashwamedh ghat is the most famous and most visited one. This is mainly due to the Ganga...
20/11/2023

Out of 88 ghats of Varanasi, Dashashwamedh ghat is the most famous and most visited one. This is mainly due to the Ganga Aarti that takes place in the ghat, every evening. Apart from this, the ghat is famous for many tourist activities and pilgrim purposes. This is the oldest ghat of Varanasi.

Where Dashashwamedh Ghat is Located ?
Dashashwamedh ghat is located very close to the Kashi Vishwanath temple. It is also very close to Jantar Mantar.You can find auto rickshaw or car from bus stand or railway station to reach Godaulia. From Godaulia, one need to walk for 5 – 10 minutes to reach the Ghat as no vehicle is allowed near it.

Why this Ghat is so famous ?
The ghat is more crowded during evenings and during Shivratri celebration. In the early morning, you can find many rituals and activities happening in the ghat. It is best visited during winter due to the calm climate. During eclipse, you can find many people taking a holy dip in this ghat.

Every evening, a group of priests performs a synced ritual to praise Goddess Ganges. Thousands of pilgrims and numerous tourists visit this ghat during evening to witness the ceremony. It is an important spot for photography in Varanasi.
There are numerous famous temples and tourist attractions near the ghat.
Boating from the ghat is a major tourist attraction. Boating at sunrise and sunset are considered more aesthetically pleasing.
Early morning bathing in the ghat is assumed to wash off sins. You can find many people bathing in the ghat.
Special rituals will be conducted in the ghat on Tuesdays and festivals
Pouring milk into the river from the ghat is said to be a holy act. You can find numerous devotees pouring milk into the river, during evening
History of Dashashwamedh Ghat
There are a lot of myths and legends related to the ghat. It is said that Lord Brahma welcomed Lord Shiva to the earth by sacrificing ten horses at Dashashwamedh ghat. Das – ten; Ashwa – horse and medth – sacrifice. The ghat was restored in 18th century twice. It is also said that in the 2nd century, a king scarified ten horses in this ghat.

Hi5 Tour & Travels  Happy Guests completed religious trip of sarnath and varanasi ghats and sankatmochanFor more details...
19/11/2023

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सारनाथ (Sarnath) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी ज़िले के मुख्यालय, वाराणसी, से लगभग 10 किलोमीटर पूर्वोत्तर में स्...
18/11/2023

सारनाथ (Sarnath) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी ज़िले के मुख्यालय, वाराणसी, से लगभग 10 किलोमीटर पूर्वोत्तर में स्थित प्रमुख बौद्ध एवम हिन्दू तीर्थस्थल है। ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था जिसे "धर्म चक्र प्रवर्तन" का नाम दिया जाता है और जो बौद्ध मत के प्रचार-प्रसार का आरंभ था। यह स्थान बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थों में से एक है (अन्य तीन हैं: लुम्बिनी, बोधगया और कुशीनगर)। इसके साथ ही सारनाथ को जैन धर्म एवं हिन्दू धर्म में भी महत्व प्राप्त है। जैन ग्रन्थों में इसे 'सिंहपुर' कहा गया है और माना जाता है कि जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म यहाँ से थोड़ी दूर पर हुआ था। यहां पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर भी है जहां सावन के महीने में हिन्दुओं का मेला लगता है।

संकट मोचन हनुमान मंदिर हिन्दू भगवान हनुमान के पवित्र मंदिरों में से एक हैं। यह वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत में स्थित है।...
18/11/2023

संकट मोचन हनुमान मंदिर हिन्दू भगवान हनुमान के पवित्र मंदिरों में से एक हैं। यह वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत में स्थित है। यह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय कॆ नजदीक दुर्गा मंदिर और नयॆ विश्वनाथ मंदिर के रास्ते में स्थित हैं। संकट मोचन का अर्थ है परेशानियों अथवा दुखों को हरने वाला। इस मंदिर की रचना बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के स्थापक श्री मदन मोहन मालवीय जी द्वारा १९०० ई० में हुई थी। यहाँ हनुमान जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है, इस दौरान एक विशेष शोभा यात्रा निकाली जाती है जो दुर्गाकुंड से सटे ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर से लेकर संकट मोचन तक चलायी जाती है। भगवान हनुमान को प्रसाद के रूप में शुद्ध घी के बेसन के लड्डू चढ़ाये जाते हैं। भगवान हनुमान के गले में गेंदे ऐवं तुलसी की माला सुशोभित रहती हैं। इस मंदिर की एक अद्भुत विशेषता यह हैं कि भगवान हनुमान की मूर्ति की स्थापना इस प्रकार हुई हैं कि वह भगवान राम की ओर ही देख रहे हैं,ऐवं श्री राम चन्द्र जी के ठीक सीध में संकट मोचन महराज का विग्रह है , जिनकी वे निःस्वार्थ श्रद्धा से पूजा किया करते थे। भगवान हनुमान की मूर्ति की विशेषता यह भी है कि मूर्ति मिट्टी की बनी है।संकट मोचन महराज कि मूर्ति के हृदय के ठीक सीध में श्री राम लला की मूर्ति विद्यमान है, ऐसा प्रतीत होता है संकट मोचन महराज के हृदय में श्री राम सीता जी विराज मान है। मंदिर के प्रांगण में एक अति प्राचीन कूआँ जो संत तुलसीदास जी के समय का कहा जाता है, श्रद्धालु इस कूप का शीतल जल ग्रहण करते हैं । यहाँ विस्तृत क्षेत्र में तुलसी के पौधों को लगाया गया है साथ ही आस पास पुराने रास्ते पर अनेक वृक्ष लगाने के साथ स्वक्षता का ध्यान रखा गया है जिसके कारण विषाक्त सर्पों से भय मुक्त वातावरण तैयार हुआ है |

If Varanasi is the Spiritual Capital of the country, then Kashi Vishwanath Temple is its crowning glory. Situated on the...
16/11/2023

If Varanasi is the Spiritual Capital of the country, then Kashi Vishwanath Temple is its crowning glory. Situated on the western banks of the River Ganga, it is one of the twelve holiest jyotirlingas or sacred centers of Shiva worship spread across India. This ancient Varanasi Shiva temple finds mention in the Puranas. The main deity of the shrine is a linga that is placed upon a silver altar. What is truly fascinating about this temple is that it has been subjected to destruction and re-construction a number of times over the course of history. But the temple has never bowed to the dictates of time and even today, it stands as one of the most popular temples in Varanasi that is thronged by devotees and tourists in thousands, every day.

Another interesting fact about this temple is that it features a gold dome and a gold spire on top. It is believed that if you make a wish after seeing the dome, Lord Shiva fulfills your wish. Legend has it that when the Mughal ruler Aurangzeb planned to destroy the temple, the idol of the temple deity was hidden in a well inside the temple complex. The well is still there. Be sure to take a look at this historical well when you visit the temple.

Location: Vishwanath Gali
Timings: 02.30 am to 11.00 pm; every day

Address

Kabir Nagar , Durgakund
Varanasi
221005

Opening Hours

Monday 9am - 5pm
Tuesday 9am - 5pm
Wednesday 9am - 5pm
Thursday 9am - 5pm
Friday 9am - 5pm
Saturday 9am - 5pm
Sunday 9am - 5pm

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