Kashi Karmkand

Kashi Karmkand We provide scholar pandit ji of kashi with pujan samgri for rudrabhishek, mahamritunjay path, bhagwat katha, grah shanti Puja etc. across India.

Shastrarth (debate in search for true meaning of Scriptures and philosophic aspects), is still deeply rooted in the daily lives of the people of Kashi. Every evening people assemble on the ghats at the bank of the river Ganges, flowing through the city and hold Shastrarth among themselves. One such evening, at Assi Ghat, which is the sangam (meeting point) of the Ganges with its tributary river As

i, under the Fig tree, a bunch of vibrant young enthusiasts Arvind, Shakti, Kusumakar, Ranjan and Amit, had a prolonged debate on Karm Kand (the ritualistic practices) and Vedic traditions. The hypnotic debate lasted several hours. Around mid-night it was realised that most of the current practices outside Kashi are actually not in sync with the Vedic traditions. Thus began the quest for original Vedic traditions. Gradually, when the like-minded people flocked together, it was decided to spread awareness about the actual Vedic traditions and the organisation “Kashikarkand” was born.

*🕉️ सनातन पंचांग 🕉️*▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬*🌞 पञ्चाङ्ग | 22 जनवरी 2026 | गुरुवार 🌞*⛅ विक्रम संवत : 2082 (सिद्धार्थी)⛅ शाक संवत : 1...
22/01/2026

*🕉️ सनातन पंचांग 🕉️*
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*🌞 पञ्चाङ्ग | 22 जनवरी 2026 | गुरुवार 🌞*
⛅ विक्रम संवत : 2082 (सिद्धार्थी)
⛅ शाक संवत : 1947
🌞 सूर्यायण : उत्तरायण
⛅ ऋतु : शिशिर
⛅ मास : माघ
🌕 पक्ष : शुक्ल
🗓️ तिथि :
➡️ चतुर्थी 🌙 रात्रि 02:28 तक
➡️ तत्पश्चात पंचमी
🌟 नक्षत्र :
➡️ शतभिषा ⏰ दोपहर 02:27 तक
➡️ तत्पश्चात पूर्वाभाद्रपद
⛅ योग :
➡️ वरियान ⏰ शाम 05:37 तक
➡️ तत्पश्चात परिध
⛅ करण :
➡️ वणिज ⏰ दोपहर 02:41 तक
➡️ तत्पश्चात विष्टि (भद्रा)
*🌑 राहुकाल : दोपहर 01:51 – 03:10*
🌞 सूर्योदय : 07:20
🌒 सूर्यास्त : 05:48
🌜 चंद्र राशि : कुम्भ
🌞 सूर्य राशि : मकर
💫 दिशाशूल : दक्षिण दिशा
🦜 व्रत / पर्व / योग :
*➡️ विनायक वरद कुंद तिल चतुर्थी*
*➡️ तिल चौथ*
*➡️ पंचक • भद्रा • रवियोग*
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*🟡 गुरुवार के शुभ–अशुभ मुहूर्त*

⛔ राहुकाल : 01:51 – 03:10
⛔ यमगण्ड : 07:20 – 08:39
⛔ गुलिक काल : 09:59 – 11:18
✅ अभिजित मुहूर्त : 11:50 – 12:35
❌ दूर मुहूर्त : 06:43–06:45 | 06:54–06:55
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*🌞 दिन का चौघड़िया*

✅ शुभ : 07:20 – 08:38
❌ रोग : 08:38 – 09:58
❌ उद्वेग : 09:58 – 11:18
✅ चर : 11:18 – 12:37
✅ लाभ : 12:37 – 01:57
✅ अमृत : 01:57 – 03:16
❌ काल : 03:16 – 04:36
✅ शुभ : 04:36 – 05:55
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*🌒 रात का चौघड़िया*

✅ अमृत : 05:55 – 07:36
✅ चर : 07:36 – 09:16
❌ रोग : 09:16 – 10:57
❌ काल : 10:57 – 12:37
✅ लाभ : 12:37 – 02:17
❌ उद्वेग : 02:17 – 03:58
✅ शुभ : 03:58 – 05:38
✅ अमृत : 05:38 – 07:20

*🕉️ नोट*
*📌 दिन व रात्रि के चौघड़िया का आरंभ*
*क्रमशः सूर्योदय एवं सूर्यास्त से होता है।*
*⏳ प्रत्येक चौघड़िया की अवधि — डेढ़ घंटा होती है।*

*चर में चक्र चलाइये, उद्वेगे थलगार।*
*शुभ में स्त्री श्रृंगार करे, लाभ में करो व्यापार॥*
*रोग में रोगी स्नान करे, काल करो भण्डार।*
*अमृत में काम सभी करो, सहाय करो कर्तार॥*
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*🌞 दिन का होरा*

गुरु : 07:20 – 08:20
मंगल : 08:20 – 09:20
सूर्य : 09:20 – 10:20
शुक्र : 10:20 – 11:20
बुध : 11:20 – 12:20
चन्द्र : 12:20 – 13:20
शनि : 13:20 – 14:20
गुरु : 14:20 – 15:20
मंगल : 15:20 – 16:20
सूर्य : 16:20 – 17:20
शुक्र : 17:20 – 18:20
बुध : 18:20 – 19:20
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
*🌒 रात का होरा*
चन्द्र : 19:20 – 20:20
शनि : 20:20 – 21:20
गुरु : 21:20 – 22:20
मंगल : 22:20 – 23:20
सूर्य : 23:20 – 24:20
शुक्र : 24:20 – 01:20
बुध : 01:20 – 02:20
चन्द्र : 02:20 – 03:20
शनि : 03:20 – 04:20
गुरु : 04:20 – 05:20
मंगल : 05:20 – 06:20
सूर्य : 06:20 – 07:20
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*🔮 आज का राशिफल🔮*

♈ मेष
आज कार्यक्षेत्र में मेहनत रंग लाएगी। अधिकारियों का सहयोग मिलेगा। जल्दबाज़ी में कोई निर्णय न लें।
♉ वृषभ
धन लाभ के योग बन रहे हैं। परिवार में सुख-शांति बनी रहेगी। पुराने अटके कार्य पूरे हो सकते हैं।
♊ मिथुन
वाणी और व्यवहार पर संयम रखें। किसी से विवाद हो सकता है। यात्रा या नया काम टालना हितकर रहेगा।
♋ कर्क
मन शांत रहेगा और धार्मिक कार्यों में रुचि बढ़ेगी। परिवार का सहयोग मिलेगा। दिन सामान्य से अच्छा रहेगा।
♌ सिंह
मान-सम्मान में वृद्धि होगी। जिम्मेदारियाँ बढ़ सकती हैं। आत्मविश्वास बनाए रखें, सफलता मिलेगी।
♍ कन्या
स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न करें। खर्चों पर नियंत्रण रखें। कार्यक्षेत्र में धैर्य से काम लें।
♎ तुला
रुके हुए कार्य पूर्ण होने के योग हैं। मित्रों का सहयोग मिलेगा। दिन लाभदायक रहेगा।
♏ वृश्चिक
भावनाओं में बहकर कोई निर्णय न लें। मानसिक तनाव रह सकता है। धैर्य और संयम से दिन निकालें।
♐ धनु
भाग्य का पूरा साथ मिलेगा। शुभ समाचार मिल सकता है। नए कार्य की योजना बना सकते हैं।
♑ मकर
मेहनत का अच्छा फल मिलेगा। वरिष्ठों से प्रशंसा मिलेगी। कार्यक्षेत्र में प्रगति के योग हैं।
♒ कुम्भ
चंद्र राशि होने से मन थोड़ा विचलित रह सकता है। सोच-समझकर निर्णय लें। जल्दबाज़ी से बचें।
♓ मीन
धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों में मन लगेगा। मानसिक शांति मिलेगी। दिन शुभ रहेगा।
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*🚩 जय श्री राम 🚩*
*🙏 आपका दिन मंगलमय हो 🙏*
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 #बोधकथा                             || तुम बहुत सुखी हो ||            एक समयकी बात है, एक कौवेकी भेंट एक हंससे हुई। उस ...
22/01/2026

#बोधकथा

|| तुम बहुत सुखी हो ||

एक समयकी बात है, एक कौवेकी भेंट एक हंससे हुई। उस कौवेने हंसके उज्वल रंगकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। हंसने उदास होकर कहा कि 'हम दोनोंमें क्या रखा है—हम दोनों तो एक-एक ही रंगके बने हैं, खूबसूरती तो तोतेमें है, जिसमें प्रकृतिने कितना सुन्दर रंग-संयोजन किया है। हरे रंगके शरीरपर गलेमें सुर्ख लाल रंगका छल्ला !

कौवेने तोतेसे उसकी प्रशंसा की तो वह उदास होकर बोला कि 'मैं भी तबतक अपनेको भाग्यवान् समझता था, जबतक मैंने मोरको नहीं देखा था।' अब तो कौवेके मनमें मोरसे मिलनेकी इच्छा जाग उठी, परंतु वनमें वह नहीं मिला। एक दिन उसे चिड़ियाघरमें मोर दीख गया। वह लोगोंके बीचमें घिरा हुआ सचमुच बहुत आकर्षक लग रहा था। कौवा मोरके पास आया और उसकी सराहना करने लगा कि कुदरतने तुम्हें फुर्सतसे बनाया है, तुम्हारे अंग-अंगमें सौन्दर्य भर दिया है। तुम्हारा कितना भाग्य है कि पृथ्वीके सबसे बुद्धिमान् प्राणी भी तुम्हें देखनेके लिये लालायित हैं। मोरने कहा कि 'मेरे भाई ! तुम यह क्यों नहीं सोचते कि मैं कैदमें हूँ और तुम स्वतन्त्र हो ? तुम जहाँ चाहो जा सकते हो, परंतु मैं नहीं जा सकता।'

कौवेके जीवनमें यह पहला अवसर था, जब किसीने उसके जीवनकी अहमियत उसे समझायी। वह जान गया कि वह बहुत सुखी प्राणी है।

कौवा तो समझ गया, परंतु हम कब समझेंगे कि 'हम सब अपने-आपमें सर्वोत्तम हैं। हमें किसीकी नकल नहीं करनी चाहिये। हमें अपनी तुलना किसी अन्यसे नहीं करनी चाहिये। विश्वास करो कि तुम बहुत सुखी हो। तुम्हारे 'तुम जैसे' होनेमें कोई ईश्वरीय प्रयोजन है।

ईश्वरने अपने अकेलेपनकी उदासीको दूर करनेके लिये विविध स्वरूपोंको धारण किया है। हमारा यह शरीर उसी ईश्वरका घर है। यदि सभी एक-समान हो जाते, तो उनको देख-देख करके ईश्वरके अन्दर पुनः नीरसता आ जाती है। हम अपने रंग, रूप, ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा, साधन, संसाधनकी विविधतासे उस ईश्वरको नीरसतामें जीनेसे बचा रहे हैं। हमें खुश होना चाहिये कि हम परमपिता परमात्माके काम आ रहे l
❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀

बलिहारी इन नैनन पेजहां बसते चारों धामएसी लगन लगी मोहे तोजीत देखूँ उत घनश्यामइन आँखों की तमन्ना है कन्हैयाबस दीदार..... त...
22/01/2026

बलिहारी इन नैनन पे
जहां बसते चारों धाम

एसी लगन लगी मोहे तो
जीत देखूँ उत घनश्याम

इन आँखों की तमन्ना है कन्हैया
बस दीदार..... तुम्हारा हो

मेरे दिल.... मे बसेरा हो तेरा
मेरी हर बात मे जीक्र तुम्हारा हो...

🙏🌹जय जय श्रीराधे 🌹🙏

🌞🍁🛕🌺👏🕉️👏🌺🛕🍁🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩🌈 *दिनांक - 11 जनवरी 2026*🌈 *दिन - रविवार*🌈 *विक्रम संवत 2082*🌈 *शक स...
11/01/2026

🌞🍁🛕🌺👏🕉️👏🌺🛕🍁
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🌈 *दिनांक - 11 जनवरी 2026*
🌈 *दिन - रविवार*
🌈 *विक्रम संवत 2082*
🌈 *शक संवत -1947*
🌈 *अयन - दक्षिणायन*
🌈 *ऋतु - शिशिर ॠतु*
🌈 *मास - माघ (गुजरात-महाराष्ट्र पौष)*
🌈 *पक्ष - कृष्ण*
🌈 *तिथि - अष्टमी सुबह 10:20 तक तत्पश्चात नवमी*
🌈 *नक्षत्र - चित्रा शाम 06:12 तक तत्पश्चात स्वाती*
🌈 *योग - सुकर्मा शाम 05:27 तक तत्पश्चात धृति*
🌈 *राहुकाल - शाम 04:53 से शाम 06:15 तक*
🌈 *सूर्योदय - 07:19*
🌈 *सूर्यास्त - 06:13*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
🕉️⏭️ *दिशाशूल - पश्चिम दिशा मे*
🚩 *व्रत पर्व विवरण-
✨ *विशेष - *अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है (ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्म खण्ड: 27,29,34)*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩

🍁 *मकर संक्रांति* 🍁
🙏🏻 *आत्मोद्धारक व जीवन-पथ प्रकाशक पर्व – मकर संक्रांति (14 जनवरी 2026 बुधवार को पुण्यकाल दोपहर 03:13 से सूर्यास्त तक )*
🌞 *जिस दिन भगवान सूर्यनारायण उत्तर दिशा की तरफ प्रयाण करते हैं, उस दिन उतरायण (मकर संक्रांति) का पर्व मनाया जाता है | इस दिन से अंधकारमयी रात्रि कम होती जाती है और प्रकाशमय दिवस बढ़ता जाता है | उत्तरायण का वाच्यार्थ है कि सूर्य उत्तर की तरफ, लक्ष्यार्थ है आकाश के देवता की कृपा से ह्दय में भी अनासक्ति करनी है | नीचे के केन्द्रों में वासनाएँ, आकर्षण होता है व ऊपर के केन्द्रों में निष्कामता, प्रीति और आनंद होता है | संक्रांति रास्ता बदलने की सम्यक सुव्यवस्था है | इस दिन आप सोच व कर्म की दिशा बदलें | जैसी सोच होगी वैसा विचार होगा, जैसा विचार होगा वैसा कर्म होगा | हाड-मांस के शरीर को सुविधाएँ दे के विकार भोगकर सुखी होने की पाश्चात्य सोच है और हाड-मांस के शरीर को संयत, जितेन्द्रिय रखकर सदभाव से विकट परिस्थितियों में भी सामनेवाले का मंगल चाहते हुए उसका मंगलमय स्वभाव प्रकट करना यह भारतीय सोच है |*
*सम्यक क्रांति.... ऐसे तो हर महिने संक्रांति आती है लेकिन मकर संक्रांति साल में एक बार आती है | उसीका इंतजार किया था भीष्म पितामह ने | उन्होंने उत्तरायण काल शुरू होने के बाद ही देह त्यागी थी |*
*पुण्यपुंज व आरोग्यता अर्जन का दिन*
🌞 *जो संक्रांति के दिन स्नान नहीं करता वह ७ जन्मों तक निर्धन और रोगी रहता है और जो संक्रांति का स्नान कर लेता है वह तेजस्वी और पुण्यात्मा हो जाता है | संक्रांति के दिन उबटन लगाये, जिसमे काले तिल का उपयोग हो |*
🌞 *भगवान सूर्य को भी तिलमिश्रित जल से अर्घ्य दें | इस दिन तिल का दान पापनाश करता है, तिल का भोजन आरोग्य देता है, तिल का हवन पुण्य देता है | पानी में भी थोड़े तिल डाल के पियें तो स्वास्थ्यलाभ होता है | तिल का उबटन भी आरोग्यप्रद होता है | इस दिन सुर्योद्रय से पूर्व स्नान करने से १० हजार गौदान करने का फल होता है | जो भी पुण्यकर्म उत्तरायण के दिन करते हैं वे अक्षय पुण्यदायी होते हैं | तिल और गुड के व्यंजन, चावल और चने की दाल की खिचड़ी आदि ऋतु-परिवर्तनजन्य रोगों से रक्षा करती है | तिलमिश्रित जल से स्नान आदि से भी ऋतु-परिवर्तन के प्रभाव से जो भी रोग-शोक होते हैं, उनसे आदमी भिड़ने में सफल होता है |*
🌞 *सूर्यदेव की विशेष प्रसन्नता हेतु मंत्र*
*ब्रम्हज्ञान सबसे पहले भगवान सूर्य को मिला था | उनके बाद रजा मनु को, यमराज को.... ऐसी परम्परा चली | भास्कर आत्मज्ञानी हैं, पक्के ब्रम्ह्वेत्ता हैं | बड़े निष्कलंक व निष्काम हैं | कर्तव्यनिष्ठ होने में और निष्कामता में भगवान सूर्य की बराबरी कौन कर सकता है ! कुछ भी लेना नहीं, न किसी से राग है न द्वेष है | अपनी सत्ता-समानता में प्रकाश बरसाते रहते हैं, देते रहते हैं |*
🌞 *‘पद्म पुराण’ में सूर्यदेवता का मूल मंत्र है : ॐ ह्रां ह्रीं स: सूर्याय नम: | अगर इस सूर्य मंत्र का ‘आत्मप्रीति व आत्मानंद की प्राप्ति हो’ – इस हेतु से भगवान भास्कर का प्रीतिपूर्वक चिंतन करते हुए जप करते हैं तो खूब प्रभु-प्यार बढेगा, आनंद बढेगा |*
🌞 *ओज-तेज-बल का स्त्रोत : सूर्यनमस्कार*
*सूर्यनमस्कार करने से ओज-तेज और बुद्धि की बढ़ोत्तरी होती है | ॐ सूर्याय नम: | ॐ भानवे नम: | ॐ खगाय नम: ॐ रवये नम: ॐ अर्काय नम: |..... आदि मंत्रो से सूर्यनमस्कार करने से आदमी ओजस्वी-तेजस्वी व बलवान बनता है | इसमें प्राणायाम भी हो जाता है, कसरत भी हो जाती है |*
*सूर्य की उपासना करने से, अर्घ्य देने से, सूर्यस्नान व सूर्य-ध्यान आदि करने से कामनापूर्ति होती है | सूर्य का ध्यान भ्रूमध्य में करने से बुद्धि बढती है और नाभि-केंद्र में करने से मन्दाग्नि दूर होती है, आरोग्य का विकास होता है |*
🌞 *आरोग्य व पुष्टि वर्धक : सूर्यस्नान*
*सूर्य की धूप में जो खाद्य पदार्थ, जैसे-घी, तेल आदि २ – ४ घंटे रखा रहे तो अधिक सुपाच्य हो जाता है | धूप में रखे हुए पानी से कभी –कभी स्नान कर सकते हैं | इससे सूखा रोग (Rickets) नहीं होता और रोगनाशिनी शक्ति बरक़रार रहती है |*
🕉️⏭️ *शेष कल...*
🌞~*आज का हिन्दू पंचांग*~🌞
🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩
☀🏯!! श्री हरि: शरणम् !!🏯☀
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🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

संस्कारों से ही बचेगी संस्कृति, पाश्चात्य अंधानुकरण छोड़ना जरूरी....आज जब पूरा विश्व सनातन संस्कृति की चर्चा कर रहा है, ...
10/01/2026

संस्कारों से ही बचेगी संस्कृति, पाश्चात्य अंधानुकरण छोड़ना जरूरी....

आज जब पूरा विश्व सनातन संस्कृति की चर्चा कर रहा है, तब यह समझना आवश्यक है कि व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व मानवता के लिए इससे अधिक शुभ और कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। जब हम सच्चे अर्थ में सनातनी बन जाएँ, तभी हम इस संस्कृति की महत्ता को समझ पाएँगे।

वैश्विक समस्याओं का समाधान
वास्तविकता यह है कि विनाश के मुहाने पर खड़ी वैश्विक समस्याओं का समाधान और विश्व मानवता का कल्याण केवल सनातन संस्कृति के आधार पर ही संभव है। यह वह संस्कृति है जो ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्’ की अवधारणा को जीने और आत्मसात करने के मूल्यों में निहित है।

सनातन धर्म या संस्कृति केवल शब्दोच्चार या नारा मात्र नहीं है। यह सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को धारण करने से ही संभव है। हमारे यहाँ मूल्य केवल शब्दों में ही वर्णित नहीं किए गए हैं, बल्कि उन शब्दों को व्यावहारिक जीवन में कसौटी पर परखा भी गया है।

जीवन मूल्यों की कसौटी
सतयुग काल में राजा हरिश्चंद्र को सत्य बोलने की कितनी बड़ी, कठिन, दुःसह, मृत्यु से भी अधिक पीड़ा देने वाली परीक्षा देनी पड़ी, यह जगविदित है। शासकों की संतानें भी उन्हीं ऋषि आश्रमों में शिक्षा प्राप्त करने जाती थीं, जहाँ सभी बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। सभी को एक समान नियम और अनुशासन का पालन करना होता था।

आज की तरह नहीं, जब शिक्षा के अलग स्तर, पाठ्यक्रम, सुविधाएँ और वर्ग-भेदित शिक्षा व्यवस्था है। संस्कार, अनुशासन और संयम शिक्षा से दूर हो गए हैं।

प्रयागराज: सनातन मूल्यों का जीवंत प्रतीक
3 जनवरी, पौष मास की पूर्णिमा से सनातन संस्कृति की अवधारणा ऋषि भरद्वाज की तपस्थली तीर्थराज प्रयागराज में त्रिवेणी के तट पर साकार होती है। इस कड़कड़ाती ठंड के बीच हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर नित्य त्रिवेणी में प्रातःकालीन स्नान, जप, तप, दान और ईश्वर चिंतन करते हुए ‘सिया राम मय सब जग जानी’ की अवधारणा को आत्मसात करने का अभ्यास करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का उद्घोष ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ और आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की अवधारणा का सजीव वर्णन यहाँ देखने को मिलता है।

सनातन संस्कृति की व्यापकता
गुरु नानकदेव, संत कबीर साहब जैसे सनातन संस्कृति के अनेक महान संतों और महात्माओं ने अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से परम सत्य को अपने-अपने तरीके से जाना। किसी ने वैष्णव मार्ग, किसी ने शाक्त, किसी ने तंत्र, किसी ने शक्ति उपासना, योग मार्ग, हठयोग, किसी ने भक्ति भाव, किसी ने प्रेम और सेवा, सद्गुरु भक्ति, तो किसी ने प्रकृति की उपासना-नदी, समुद्र, जलाशय, जंगल, जीव-जड़ प्रकृति- सब में उसी एक परम तत्त्व को विभिन्न साधना मार्गों से जानकर मानवता के विकास का मार्ग दिखाया।

उन्होंने मानव के कष्टों से निवारण के उपाय दिए, साथ ही समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था, न्याय व्यवस्था तथा अर्थ व्यवस्था का मार्गदर्शन किया है।

सनातन संस्कृति असीम और निस्सीम है। यह किसी सीमा में बँधी नहीं है। यह दुनिया की सबसे उदात्त, उदार संस्कृति है और अंतरिक्ष की तरह व्यापक है। इसे जाति, पंथ, संप्रदाय या पूजा पद्धति में आबद्ध नहीं किया जा सकता।

आत्ममंथन का समय
यदि हम अपने को सनातनी मानते हैं, तो हमें सनातन धर्म के मूल्यों को पहले अपने में आत्मसात करना होगा। जाति-पाति की संकीर्ण सोच और अहंकार से ऊपर उठकर सोचना होगा।

राजनीतिक निर्णय व नीतियाँ, राजनीतिक पद-प्रतिष्ठा, प्रशासनिक व्यवस्था, पद-प्रतिष्ठा और भरोसे का आधार यदि कार्य-कुशलता, कार्य-दक्षता, अनुशासन, ईमानदारी, निष्ठा और लोक कल्याण की भावना के बजाय जाति है, तो हम जनता-जनार्दन या राष्ट्र, किसी का भी भला नहीं कर सकते। न ही हम सनातन संस्कृति को सच्चे अर्थ में मानते हैं।

आज हम सभी की दोहरी जीवन शैली, कार्य प्रणाली और दोहरे जीवन मूल्य जगजाहिर हैं। इससे न हम अपना हित कर सकते हैं, न समाज का। आज जहाँ हम खड़े हैं- हमसे तात्पर्य हमारे पूरे विश्व परिवार से है- हमें बहुत सूक्ष्मता से, बिना जाति-पाति के पूर्वाग्रह के, समाज के नीति-नियंताओं, बुद्धिजीवी समाज, विचार जगत के लोगों, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था के लोगों की सोच, व्यवस्था और कार्यशैली का मूल्यांकन करना होगा। हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। क्या यही सनातन संस्कृति के मूल्य हैं?

समाज में बढ़ती विकृतियाँ
आज जिस प्रकार की घटनाएँ सामने आ रही हैं, यदि सनातन संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप सोचें, तो सहज ही हम निर्णय कर सकते हैं।

धन के लोभ की अराजक मानसिकता: समाचार माध्यमों से समाज में नित्य घटने वाली क्रूरतम हिंसक घटनाएँ और हत्याएँ सामने आ रही हैं। माँ-पिता, भाई-बहन की हत्याओं की घटनाएँ, नित्य निरंतर बढ़ती महिलाओं और बच्चों के साथ घटित होने वाली घटनाएँ चिंताजनक हैं।

राजनीतिक जीवन के मूल्य: आज हम कहाँ खड़े हैं? किस तरह के लोग और किन उद्देश्यों को लेकर आ रहे हैं? विभिन्न राजनीतिक दलों का नेतृत्व किन लोगों को संरक्षण दे रहा है, किन्हें आगे बढ़ा रहा है? यह सब सनातन मूल्यों के कितना अनुरूप है, यह विचारणीय विषय है।

शिक्षा और स्वास्थ्य: व्यवसायीकरण की त्रासदी
लोक कल्याणकारी सेवाएँ: स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल- उद्योग बन गए हैं। केजी से लेकर हजारों रुपए तक का शुल्क है। आउटसोर्सिंग की नौकरी करके 12, 15, 18, 20–22 हजार रुपए प्रतिमाह पर जीवन यापन करने वाले लोग क्या अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकते हैं? किसी ने विचार किया?

गुणवत्ता के नाम पर जो संस्कार युवा पीढ़ी में सामने आ रहे हैं, वे मूल्यांकन के लिए पर्याप्त हैं। वे माता-पिता बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके बच्चे माता-पिता और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अन्यथा, ओल्ड एज होम हैं। यहाँ तक कि माता-पिता के अंतिम संस्कार में भी अब लोग ऑनलाइन भाग लेने लगे हैं।

चिकित्सा व्यवस्था में तो व्यक्ति वस्तु बनकर रह गया है। मनुष्यता गौण है। केवल मनुष्य शोषण की वस्तु है। व्यापार का धर्म केवल लाभ और हानि है। कोई मानवता और संवेदना नहीं होती। यही अंतर भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में है।

पुनर्विचार की आवश्यकता
हमने पश्चिमी देशों- अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि से प्रभावित होकर जो मॉडल अपनाया, उसके व्यापक परिणाम सामने आ रहे हैं। हरिद्वार की हर की पौड़ी में, काशी में भगवती गंगा जी की आरती, अयोध्या में सरयू मैया सहित विभिन्न तीर्थों में स्नान, आरती और पूजन मन को अत्यंत आह्लादित करने वाला है। परंतु केवल बाह्य आडंबर से सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं हो सकती।

हम सभी को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि हमारी सनातन संस्कृति के मूल्य क्या यही हैं? क्या हम सच्चे अर्थ में सनातनी जीवन जी रहे हैं? यदि नहीं, तो अब समय आ गया है कि हम अपने मूल्यों की ओर लौटें, उन्हें अपने जीवन में उतारें और विश्व मानवता के लिए एक मार्गदर्शक बनें।

सनातन संस्कृति केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। आइए, हम इसे अपने आचरण में उतारें और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने का संकल्प लें।

#श्री__कृष्णः__शरणम्__मम् #श्री_हरि_शरणम् #शुभाशुभ_मुहूर्त #दिन_का_चौघड़िया #प्रथम__पूज्य__विघ्नहर्ता ्री_लक्ष्मीनारायण #गणपति_बप्पा_मोरिया

हमारा शरीर खेत की तरह है.....                                            ईसिलिए भगवान ने गीताजी मे  "क्षेत्र " कहा है !!...
10/01/2026

हमारा शरीर खेत की तरह है..... ईसिलिए भगवान ने गीताजी मे "क्षेत्र " कहा है !!
जो बोएंगे वही काटेंगे।
इसीलिए इस खेत में "शुभ कर्मों" के बीज ही डाले जाने चाहिए - गीताजी के अध्याय १३ में ........ भगवान ने अर्जुन को यही बताया हे की ,
मानव शरीर एक खेत हे , क्षेत्र हे !
और इस " क्षेत्र " को पूर्ण रूप से जाननेवाला.... मैं ही " क्षेत्रज्ञ हूँ !
"शुभ कर्म "करनेवाली इन्द्रियाँ भगवान से जुडी रहती हे !
भगवान की प्रेरणा से ही शुभ कर्मो करते रहते हे ! और तामसगुणवाली ईन्द्रिया भोगरोग और... आधिव्याधिउपाधि से भरी रहती है...!!! केवल शुभकर्म के बीज बोते हुए........ अपने ईष्टदेव से मिलना है !

जय श्री सियारामजी 🙏🙏

#श्री__कृष्णः__शरणम्__मम् #श्री_हरि_शरणम् ो_भगवते_वासुदेवाय_नमः ्री_लक्ष्मीनारायण #गणपति_बप्पा_मोरिया

*🕉️ सनातन पंचांग 🕉️*➤➤━━━━━━━➤➤*🌞 पञ्चाङ्ग 10 _ जनवरी _ 2026*⛅ दिन _ शनिवार⛅ विक्रम संवत _ 2082 सिद्धार्थी⛅ शाक संवत _ 1...
10/01/2026

*🕉️ सनातन पंचांग 🕉️*
➤➤━━━━━━━➤➤
*🌞 पञ्चाङ्ग 10 _ जनवरी _ 2026*
⛅ दिन _ शनिवार
⛅ विक्रम संवत _ 2082 सिद्धार्थी
⛅ शाक संवत _ 1947
⛅ सूर्यायन _ उत्तरायण
*⛅ ऋतु _ शिशिर*
⛅ मास _ माघ
🌑 पक्ष _ कृष्ण
⛅ तिथि _ सप्तमी 08:24 तक तत्पश्चात अष्टमी
🌟 नक्षत्र _ हस्त 03:39 तक तत्पश्चात चित्रा
⛅ योग _ अतिगण्ड 04:58 तक तत्पश्चात सुकर्मा
⛅ करण _ बव 08:24 तक तत्पश्चात बालव
*🌑 राहुकाल _ 09:54 से 11:11 तक*
🌞 सूर्योदय _ 07:20
🌒 सूर्यास्त _ 05:39
🌞 सूर्य राशि _ धनु
🌜 चन्द्र राशि _ कन्या
💫 दिशाशूल _ पूर्व दिशा में
*🦜 व्रत पर्व _ कालाष्टमी, श्री रामानंदाचार्य जयंती, यमघन्ट योग*

*1️⃣ शनिवार के शुभ-अशुभ मुहूर्त*

⛔ राहुकाल _ 09:54 - 11:11
⚠️ यमगण्ड _ 13:45 - 15:03
🚫 दूरमुहूर्त _ 18:34 - 18:37
⚫ गुलिक काल _ 07:19 - 08:36
✨ अभिजित _ 11:50 - 12:35

*2️⃣ दिन का चौघड़िया*

⛔ काल _ 07:20 - 08:35
✅ शुभ _ 08:35 - 09:53
⛔ रोग _ 09:53 - 11:11
⛔ उद्वेग _ 11:11 - 12:27
✅ चर _ 12:27 - 01:45
✅ लाभ _ 01:45 - 03:02
✨ अमृत _ 03:02 - 04:19
⛔ काल _ 04:19 - 05:36

*3️⃣ रात का चौघड़िया*

✅ लाभ _ 05:36 - 07:19
⛔ उद्वेग _ 07:19 - 09:02
✅ शुभ _ 09:02 - 10:45
✨ अमृत _ 10:45 - 12:27
✅ चर _ 12:27 - 02:11
⛔ रोग _ 02:11 - 03:53
⛔ काल _ 03:53 - 05:35
✅ लाभ _ 05:35 - 07:20

*🕉️ नोट*
*📌 दिन व रात्रि के चौघड़िया का आरंभ*
*क्रमशः सूर्योदय एवं सूर्यास्त से होता है।*
*⏳ प्रत्येक चौघड़िया की अवधि — डेढ़ घंटा होती है।*

*चर में चक्र चलाइये, उद्वेगे थलगार।*
*शुभ में स्त्री श्रृंगार करे, लाभ में करो व्यापार॥*
*रोग में रोगी स्नान करे, काल करो भण्डार।*
*अमृत में काम सभी करो, सहाय करो कर्तार॥*

*4️⃣ दिन का होरा*

🪐 शनि _ 07:20 - 08:20
🌕 गुरु _ 08:20 - 09:20
🔥 मंगल _ 09:20 - 10:20
☀️ सूर्य _ 10:20 - 11:20
💎 शुक्र _ 11:20 - 12:20
📘 बुध _ 12:20 - 13:20
🌙 चन्द्र _ 13:20 - 14:20
🪐 शनि _ 14:20 - 15:20
🌕 गुरु _ 15:20 - 16:20
🔥 मंगल _ 16:20 - 17:20
☀️ सूर्य _ 17:20 - 18:20
💎 शुक्र _ 18:20 - 19:20

*5️⃣ रात का होरा*

📘 बुध _ 19:20 - 20:20
🌙 चन्द्र _ 20:20 - 21:20
🪐 शनि _ 21:20 - 22:20
🌕 गुरु _ 22:20 - 23:20
🔥 मंगल _ 23:20 - 24:20
☀️ सूर्य _ 24:20 - 01:20
💎 शुक्र _ 01:20 - 02:20
📘 बुध _ 02:20 - 03:20
🌙 चन्द्र _ 03:20 - 04:20
🪐 शनि _ 04:20 - 05:20
🌕 गुरु _ 05:20 - 06:20
🔥 मंगल _ 06:20 - 07:20

*✨ दैनिक राशिफल ✨*

*देशे ग्रामे गृहे युद्धे*
*सेवायां व्यवहारके।*
*नामराशेः प्रधानत्वं*
*जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।*
*विवाहे सर्वमाङ्गल्ये*
*यात्रायां ग्रहगोचरे।*
*जन्मराशेः प्रधानत्वं*
*नामराशिं न चिन्तयेत्।।*

*🔮 आज का राशिफल*

♈ मेष _ कार्यों में सफलता, धैर्य रखें
♉ वृषभ _ धन लाभ के योग, वाणी संयमित रखें
♊ मिथुन _ नई योजनाओं पर काम शुरू होगा
♋ कर्क _ पारिवारिक सुख में वृद्धि
♌ सिंह _ मान-सम्मान प्राप्ति के योग
♍ कन्या _ स्वास्थ्य पर ध्यान दें
♎ तुला _ भाग्य का साथ मिलेगा
♏ वृश्चिक _ मेहनत का पूर्ण फल मिलेगा
♐ धनु _ यात्रा में सावधानी रखें
♑ मकर _ कार्यक्षेत्र में उन्नति
♒ कुम्भ _ मित्रों से लाभ होगा
♓ मीन _ मन शांत रहेगा, भक्ति बढ़ेगी
➤➤━━━━━━━➤➤
*🚩 जय श्री राम*
*🙏 आपका दिन शुभ हो*
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🙏बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार, तारा का विलाप!🙏  (रामचरित मानस किष्किन्धा  काण्ड)🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀प्रिय पाठकों, प्रसंग ...
10/01/2026

🙏बालि-सुग्रीव युद्ध, बालि उद्धार, तारा का विलाप!🙏
(रामचरित मानस किष्किन्धा काण्ड)
🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀
प्रिय पाठकों, प्रसंग उस समय का है जब माता सीता की खोज करते समय प्रभु श्रीराम और हनुमानजी का मिलन होता है। हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम की मित्रता सुग्रीव से करवाई। सुग्रीव ने अपना सारा दुख प्रभु श्रीराम को सुनाया।

मित्र का दुख देखकर प्रभु श्रीराम ने बालि वध की प्रतिज्ञा की,और सुग्रीव से कहा कि हे सुग्रीव तुम जाकर बालि को युद्ध के लिए ललकारो। सुग्रीव ऐसा ही करते हैं, सुग्रीव की ललकार सुनकर बालि युद्ध के लिये तैयार होकर घर से निकलता है, तब उसकी पत्नी तारा बाली को समझाती है कि,,,,,,,

सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा॥

भावार्थ:-बालि सुनते ही क्रोध में भरकर वेग से दौड़ा। उसकी स्त्री तारा ने चरण पकड़कर उसे समझाया कि हे नाथ! सुनिए, सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेज और बल की सीमा हैं॥

* कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा॥

भावार्थ:-वे कोसलाधीश दशरथजी के पुत्र राम और लक्ष्मण संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं॥

* कह बाली सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ॥

भावार्थ:-बालि ने कहा- हे भीरु! (डरपोक) प्रिये! सुनो, श्री रघुनाथजी समदर्शी हैं। जो कदाचित्‌ वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा (परमपद पा जाऊँगा)॥

* अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी॥
भिरे उभौ बाली अति तर्जा। मुठिका मारि महाधुनि गर्जा॥

भावार्थ:-ऐसा कहकर वह महान्‌ अभिमानी बालि सुग्रीव को तिनके के समान जानकर चला। दोनों भिड़ गए। बालि ने सुग्रीव को बहुत धमकाया और घूँसा मारकर बड़े जोर से गरजा॥

* तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा॥
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥

भावार्थ:-तब सुग्रीव व्याकुल होकर भागा। घूँसे की चोट उसे वज्र के समान लगी (सुग्रीव ने आकर कहा-) हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है॥

* एक रूप तुम्ह भ्राता दोऊ तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ॥
कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा॥

भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) तुम दोनों भाइयों का एक सा ही रूप है। इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्री रामजी ने सुग्रीव के शरीर को हाथ से स्पर्श किया, जिससे उसका शरीर वज्र के समान हो गया और सारी पीड़ा जाती रही॥

* मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला॥
पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई॥

भावार्थ:-तब श्री रामजी ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा। दोनों में पुनः अनेक प्रकार से युद्ध हुआ। श्री रघुनाथजी वृक्ष की आड़ से देख रहे थे॥

* बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि॥

भावार्थ:-सुग्रीव ने बहुत से छल-बल किए, किंतु (अंत में) भय मानकर हृदय से हार गया। तब श्री रामजी ने तानकर बालि के हृदय में बाण मारा॥

* परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगे॥
स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ॥

भावार्थ:-बाण के लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु प्रभु श्री रामचंद्रजी को आगे देखकर वह फिर उठ बैठा। भगवान्‌ का श्याम शरीर है, सिर पर जटा बनाए हैं, लाल नेत्र हैं, बाण लिए हैं और धनुष चढ़ाए हैं॥

* पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥

भावार्थ:-बालि ने बार-बार भगवान्‌ की ओर देखकर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। वह श्री रामजी की ओर देखकर बोला- ॥

* धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं॥
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥

भावार्थ:-हे गोसाईं। आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया है और मुझे व्याध की तरह (छिपकर) मारा? मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा?॥

* अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥

भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥

* मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना॥
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी॥

भावार्थ:-हे मूढ़! तुझे अत्यंत अभिमान है। तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी कान (ध्यान) नहीं दिया। सुग्रीव को मेरी भुजाओं के बल का आश्रित जानकर भी अरे अधम अभिमानी! तूने उसको मारना चाहा॥

* सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥

भावार्थ:-(बालि ने कहा-) हे श्री रामजी! सुनिए, स्वामी (आप) से मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अंतकाल में आपकी गति (शरण) पाकर मैं अब भी पापी ही रहा?॥

* सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी॥
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना॥

भावार्थ:-बालि की अत्यंत कोमल वाणी सुनकर श्री रामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया (और कहा-) मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूँ, तुम प्राणों को रखो। बालि ने कहा- हे कृपानिधान! सुनिए॥

* जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी॥

भावार्थ:-मुनिगण जन्म-जन्म में (प्रत्येक जन्म में) (अनेकों प्रकार का) साधन करते रहते हैं। फिर भी अंतकाल में उन्हें 'राम' नहीं कह आता (उनके मुख से राम नाम नहीं निकलता)। जिनके नाम के बल से शंकरजी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति (मुक्ति) देते हैं॥

* मम लोचन गोचर सोई आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा॥

भावार्थ:-वह श्री रामजी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने आ गए हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा॥

* सो नयन गोचर जासु गुन नित नेति कहि श्रुति गावहीं।
जिति पवन मन गो निरस करि मुनि ध्यान कबहुँक पावहीं॥
मोहि जानि अति अभिमान बस प्रभु कहेउ राखु सरीरही।
अस कवन सठ हठि काटि सुरतरु बारि करिहि बबूरही॥

भावार्थ:-श्रुतियाँ 'नेति-नेति' कहकर निरंतर जिनका गुणगान करती रहती हैं तथा प्राण और मन को जीतकर एवं इंद्रियों को (विषयों के रस से सर्वथा) नीरस बनाकर मुनिगण ध्यान में जिनकी कभी क्वचित्‌ ही झलक पाते हैं, वे ही प्रभु (आप) साक्षात्‌ मेरे सामने प्रकट हैं। आपने मुझे अत्यंत अभिमानवश जानकर यह कहा कि तुम शरीर रख लो, परंतु ऐसा मूर्ख कौन होगा जो हठपूर्वक कल्पवृक्ष को काटकर उससे बबूर के बाड़ लगाएगा (अर्थात्‌ पूर्णकाम बना देने वाले आपको छोड़कर आपसे इस नश्वर शरीर की रक्षा चाहेगा?)॥

* अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो बर मागऊँ।
जेहि जोनि जन्मौं कर्म बस तहँ राम पद अनुरागऊँ॥
यह तनय मम सम बिनय बल कल्यानप्रद प्रभु लीजिये।
गहि बाँह सुर नर नाह आपन दास अंगद कीजिये॥

भावार्थ:-हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिए और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिए। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्री रामजी (आप) के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद विनय और बल में मेरे ही समान है, इसे स्वीकार कीजिए और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बनाइए ॥

* राम चरन दृढ़ प्रीति करि बालि कीन्ह तनु त्याग।
सुमन माल जिमि कंठ ते गिरत न जानइ नाग॥

भावार्थ:-श्री रामजी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर को वैसे ही (आसानी से) त्याग दिया जैसे हाथी अपने गले से फूलों की माला का गिरना न जाने॥

* राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब व्याकुल धावा॥
नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा॥

भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। नगर के सब लोग व्याकुल होकर दौड़े। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है॥

* तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥

भावार्थ:-तारा को व्याकुल देखकर श्री रघुनाथजी ने उसे ज्ञान दिया और उसकी माया (अज्ञान) हर ली। (उन्होंने कहा-) पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- इन पाँच तत्वों से यह अत्यंत अधम शरीर रचा गया है॥

* प्रगट सो तनु तव आगे सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी॥

भावार्थ:-वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिए रो रही हो? जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह भगवान्‌ के चरणों लगी और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया॥

* उमा दारु जोषित की नाईं। सबहि नचावत रामु गोसाईं॥

भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा! स्वामी श्री रामजी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं।

🙏🌹। जय श्री राम, जय महावीर हनुमानजी ।🌹🙏
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जय श्री कृष्णा 🙏🏻🚩हे_प्रभु आप अनंत है ,आप ही सच्चिदानन्दस्वरूप निर्विकार परब्रह्म परमात्मा हैआप हम पर दया करें मेरे नाथ ...
10/01/2026

जय श्री कृष्णा 🙏🏻🚩
हे_प्रभु आप अनंत है ,
आप ही सच्चिदानन्दस्वरूप
निर्विकार परब्रह्म परमात्मा है
आप हम पर दया करें मेरे नाथ ।
आपकी भक्ति और कृपा सदैव इस दास
पर बनी रहे प्रभु 🙏🪷

🌺🙏🏻 #श्री__कृष्णः__शरणम्__मम् 🙏🏻🌺

*🌺शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन...
08/01/2026

*🌺शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।*
* #अर्थ:-* जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान-श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ ।
*🌺 ्री_लक्ष्मीनारायण!!🌺*
*🔥 ो_भगवते_वासुदेवाय_नमः🔥*
*आपका_हर_पल_मंगलमय_हो🌹*
*☀️ #श्री_हरि_शरणम् ☀️*

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Varanasi
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