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21/06/2026

Reliable Taxi & Tour Services in Vrindavan for the Last 10 Years

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वृंदावन जाकर अक्सर लोग 5 कोस की परिक्रमा लगाते हैं. लेकिन, क्या आपको पता है ये परिक्रमा क्यों लगाई जाती है. इसका महत्व क...
02/05/2026

वृंदावन जाकर अक्सर लोग 5 कोस की परिक्रमा लगाते हैं. लेकिन, क्या आपको पता है ये परिक्रमा क्यों लगाई जाती है. इसका महत्व क्या है और इसे किस दिन करना शुभ माना गया है. अगर नहीं, तो यहां पर परिक्रमा से संबंधित हर एक जानकारी दी गई है.

वृंदावन में हर दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान कृष्ण की लीला स्थल और मंदिरों के दर्शन करने आते हैं. इसके साथ ही कई श्रद्धालु वृंदावन की परिक्रमा भी लगाते हैं, जिसका ब्रज में बेहद महत्व माना जाता है. लेकिन, कई लोगों को इस बारे में पूरी जानकारी नहीं होती है कि वृंदावन की परिक्रमा कब और कैसे लगानी चाहिए.

वैसे तो हर कोई जब भी मंदिर जाता है, तो दर्शन करने के बाद यहां परिक्रमा जरुर लगाता है. लेकिन वृंदावन में सिर्फ मंदिरों की ही नहीं, बल्कि पूरे वृंदावन क्षेत्र की परिक्रमा लगाने का महत्व है. मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण ने वृंदावन की पावन धरती पर अपनी लीलाएं की और उनके चरणों का राज आज भी वृंदावन में मौजूद है. इस बारे में जानकारी देते हुए मथुरा के पंडित विकास शर्मा ने बताया कि वृंदावन की परिक्रमा लगाने से आप वृंदावन क्षेत्र में मौजूद हर मंदिर, वृक्ष और ब्रजवासियों को प्रणाम कर उनकी भी परिक्रमा लगाते हैं. क्योंकि कृष्ण की लीला में इन सभी का बेहद महत्व माना जाता है.

सभी तीर्थों की परिक्रमा का प्राप्त होता है फल
पंडित विकास शर्मा ने बताया कि परिक्रमा लगाते समय कई छोटी चीजों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. वैसे तो वृंदावन की परिक्रमा 5 कोस यानी करीब 15 किलोमीटर की मानी जाती है. वृंदावन की परिक्रमा को परिक्रमा परिधि से कही भी शुरू किया जा सकता है. जहां से भी इस परिक्रमा को शुरू किया जाता है. सबसे पहले उसी स्थान को प्रणाम कर ब्रज राज माथे पर लगा कर परिक्रमा शुरू की जाती है. उसी स्थान पर आकर समाप्त भी करनी होती है.

परिक्रमा लगाने से जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान
इसके साथ ही परिक्रमा को बिना जूते-चप्पल और बिना किसी वाहन की सहायता से ही लगाना चाहिए. वैसे तो वृंदावन की परिक्रमा लगाने कोई दिन या समय निर्धारित नहीं है. लेकिन, एकादशी के समय परिक्रमा लगाने से भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं. क्योंकि, एकादशी को भगवान विष्णु का सबसे प्रिय दिन भी माना जाता है. इसके साथ पूरे परिक्रमा में बाहर का खाना खाने से बचना चाहिए. परिक्रमा के दौरान अधिक भूख लगने पर सिर्फ फलों का सेवन करना चाहिए. हालांकि, परिक्रमा खत्म होने के बाद आप किसी भी प्रकार का भोजन ग्रहण कर सकते हैं

संतन के संग लाग रे तेरी अच्छी बनेगी

राधे कृष्ण राधे कृष्णा कृष्णा कृष्णा राधे राधे
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Jagadguru Nimbarkacharya
#जगद्गुरु_श्रीनिम्बार्काचार्य_श्री_श्रीजी_महाराज #श्रीहरिदास न #

गोपेश्वर महादेव मंदिर : जहाँ भगवान शिव कृष्ण-प्रेम में गोपी बन गयें।वृंदावन की पावन धरा पर स्थित  गोपेश्वर महादेव मंदिर ...
01/05/2026

गोपेश्वर महादेव मंदिर : जहाँ भगवान शिव कृष्ण-प्रेम में गोपी बन गयें।

वृंदावन की पावन धरा पर स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर केवल एक आस्था स्थल नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण की वह पराकाष्ठा है, जहाँ महादेव स्वयं कृष्ण-भक्ति में पूर्णतः लीन दिखाई देते हैं। मान्यता है कि श्रीकृष्ण की महारास लीला के दर्शन हेतु भगवान शिव ने गोपी स्वरूप धारण किया, और तभी से वे यहाँ गोपेश्वर महादेव के रूप में पूजित हुए।
यहाँ महादेव का गोपी भाव में किया गया श्रृंगार भक्त को एक अलौकिक अनुभूति से भर देता है। आज भी मंदिर में विराजमान उनका यह अद्वितीय स्वरूप मन को शांति, वैराग्य और भक्ति के गहरे भावों से सराबोर कर देता है।

मंदिर की प्राचीन स्थापत्य कला, शांत वातावरण और यहाँ प्रवाहित होती अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा सीधे हृदय से संवाद करती है, मानो आत्मा स्वयं वृंदावन के रस में विलीन हो गई हो।

ब्रज चौरासी कोस यात्रा का जो विधान है वह इस प्रकार है एक बार नंद बाबा और मैया यशोदा ने भगवान श्री कृष्णा अपने पुत्र को य...
24/04/2026

ब्रज चौरासी कोस यात्रा का जो विधान है वह इस प्रकार है एक बार नंद बाबा और मैया यशोदा ने भगवान श्री कृष्णा अपने पुत्र को यह बोला कि लाल अब हमारी वृद्धावस्था हो चुकी है हमको चारों धाम की यात्रा करनी है तब भगवान श्री कृष्ण ने मां यशोदा और नंद बाबा को अपने बचपन की लीला याद दिलाए जब उन्होंने अपने मुख में ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे और बोले की मैया इतना सब कुछ देखने और समझने के बाद भी आपको चार धाम यात्रा करनी है क्या तब यशोदा मैया बोली जो हमारे धर्म में अब तक चला आया है उसको हम कैसे विस्मृति कर दें तब भगवान श्री कृष्ण ने विचार करके सभी देवताओं का आवाहन किया और उनको आज्ञा दी कि आप सभी लोग ब्रज में विराजमान हो जाइए तब देवताओं ने भगवान से अनुरोध किया कि प्रभु हमें स्थान दीजिए तब भगवान ने अपने शरीर को विराट और विस्तार करके 84 कोश में फैला दिया प्रत्येक व्यक्ति का शरीर अपनी उंगली के अनुसार 84 अंगुल का होता है भगवान ने अपना शरीर 84 अंगल का 84 कोर्स में विस्तार करके देवताओं को स्थान दिया सभी देवता भगवान के शरीर में समाहित हो गए 84 कोस यात्रा का विधान जब देवता शयन करते हैं 4 महीने के लिए तब वह देवता चौरासी कोस में आकर विराजमान रहते हैं अतः 84 कोस यात्रा का फल देवशयनी एकादशी से लेकर देव उठान एकादशी तक रहता है देव उठान एकादशी के पश्चात सभी देवता अपने अपने स्थान पर विराजित हो जाते हैं उसे समय 84 कोस यात्रा का कोई फल नहीं मिलता अतः यह महत्वपूर्ण सूचना और जानकारी आप अधिक से अधिक लोगों पर पहुंचने का कष्ट करें जिससे समाज में जागरूकता फैली और 84 कोसिया यात्रा का महत्व एवं समय ज्ञात हो सके ब्रज चौरासी कोस यात्रा का महत्व विशेष रूप से देवशयन एकादशी से लेकर देव उठान एकादशी तक ही होना चाहिये।
राधे राधे

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24/03/2026

व्हीलचेयर आपके काम का हो न हो किसी के काम का होगा आप शेयर करे जरूरतमंद को सहायता आपके द्वारा ही होगी
वीडियो शेयर करे जरुरत मंद लोगों की वृंदावन पधारने पर सहायता के लिए
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कैसे  दर्शन होंगे 2 दिन है तो क्या दर्शन करे
24/03/2026

कैसे दर्शन होंगे 2 दिन है तो क्या दर्शन करे

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