28/02/2025
दोस्तो,मेरा जन्म महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव पवनी में हुआ। यह गाँव छोटा हैं , पर यहाँ की मिट्टी में हमारे पूर्वजों की कहानियाँ बसी थीं। मैं आदिवासी परधान समाज से आता हूँ, एक ऐसा समाज जो वर्षों से संघर्ष कर रहा है—गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक उपेक्षा से। हमारे गाँव में स्कूल नहीं था, न ही पढ़ाई की कोई व्यवस्था। मेरे माता-पिता अनपढ़ थे, लेकिन उनके दिल में एक इच्छा थी—"हमारे बच्चे हमारे जैसे अनपढ़ न रहें!"
शिक्षा के लिए मुझे पाँच साल की उम्र के बाद दूसरे गाँव भेजा गया, क्योंकि हमारे गाँव में कोई स्कूल नहीं था। लेकिन वहाँ तक पहुँचने का सफर आसान नहीं था—न सड़कें थीं, न कोई साधन। हमें रोज़ पाँच किलोमीटर कीचड़ भरे रास्तों से पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता था। यह कठिन था, लेकिन हमें आदत हो गई थी, क्योंकि हमारे लिए यही एकमात्र रास्ता था।
संयुक्त परिवार और कहानियों की दुनिया
हमारे यहाँ संयुक्त परिवार (एकत्र कुटुंब पद्धति) थी। मेरे दादा-दादी हमारे साथ रहते थे। माता-पिता खेतों में काम करते और देर रात लौटते, इसलिए पढ़ाई का कोई मार्गदर्शन नहीं था। स्कूल का होमवर्क मुझे खुद ही करना पड़ता था। लेकिन मेरी दुनिया सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थी...
रात को दादा-दादी हमें कहानियाँ सुनाते थे। उनकी कहानियाँ अद्भुत होतीं—जादुई लोक, परियों की दुनिया, रहस्यमयी राजाओं की कहानियाँ... जिनका असलियत से कोई वास्ता नहीं था, पर हमारी कल्पना को पंख लगा देती थीं।
मुझे आज भी याद है—हम आँगन में खाना खाते, तारों भरे आसमान को निहारते और तारे गिनते हुए सोते थे। मेरे मामा के पास एक पुराना रेडियो था, जिस पर हर रात छत्रपति शिवाजी महाराज के पराक्रम के पोवाडे बजते थे। यह हमारी रातों को प्रेरणा से भर देता था।
जब हम खुले आकाश में खटिया डालकर सोते, तब कभी-कभी आसमान में टिमटिमाती रोशनी देख हमारी जिज्ञासा जाग उठती—
"दादी, ये चमकती हुई रोशनी क्या है?"
वे मुस्कुरातीं और कोई नई कहानी गढ़ देतीं, लेकिन असली जवाब उनके पास नहीं था।
शायद यही वह पल थे, जब मेरे मन में सवालों की दुनिया बसने लगी थी।
शायद यहीं से मेरी सोच बदलनी शुरू हुई थी...
क्रमशः...